Friday, 28 September 2012

हूँ तो मुगलानी पर रहूँगी हिन्दुआनी


ब्लागर परिचय की श्रंखला में आज " हिन्दू राष्ट्र " ब्लाग के ब्लागर - आर के शर्मा का परिचय ।
लेखक R K शर्मा द्वारा कुरआन द्वारा प्रचलित मान्यताओं की असलियत सबके सामने लाने का 1 प्रयास । ॐ नमो: नारायण: । मेरा मकसद है । लोगों के बीच इस्लाम और कुरआन के लिए ग़लतफ़हमी दूर करना । कृपया इस ब्लाग पर आने वाले सभी आगंतुको से अनुरोध । इस ब्लाग पर दिये गये सभी पोस्ट सत्य हैं । और ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है । पर इस ब्लाग का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस न पंहुँचा कर सत्य को उजागर करना है । अत: किसी भी प्रकार की दुर्भावना को मन में न रख कर केवल ब्लाग को पढ़ें । अगर किसी पोस्ट पर आपत्ति है । या पोस्ट के गलत होने का प्रमाण है । तो इस पेज पर आप आपत्ति व्यक्त कर सकते हैं । परन्तु बिना प्रमाण के कृपया अपना समय नष्ट न करें । और न ही सत्य को असत्य सिद्ध करने का प्रयत्न करें । मैं सभी को दिखाना चाहता हूँ कि - जो कुरआन में है । वो असलियत में क्या है ? और उसे क्या दिखा कर दुनियां और मुसलमानों

को भृमित किया जाता है । इस ब्लाग के जरिये मैं इस्लाम और कुरआन के हर 1 राज से पर्दाफाश करके उसे बेनकाब करूँगा और इनका ब्लाग है - कुरआन और मुहम्मद की नापाक असलियत । ब्लाग नाम पर क्लिक करें ।
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आज पूरी दुनियां में इस्लाम के नाम पर आतंक मचाया जा रहा है । कुछ लोग कहते हैं कि - मुसलमानों को बहकाया जाता है । उनके साथ ज़बरदस्ती होती है..आदि । तरह तरह की बातें । पर मैं दिखाऊँगा कि - क्यों 1 मुसलमान ऐसा करता है ? क्या है इस्लाम का असली मकसद ? और क्यों इस्लाम आज शैतानी मजहब बन गया है ?
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नीचे जिन किताबों के नाम शीर्षक  दिये हैं । उनके लिंक संकलित करना मेरे लिये संभव नहीं था । अतः निम्न सभी लिंको को प्राप्त करने हेतु इसी ब्लाग के इस पेज लिंक पर क्लिक करें - राजीव ।
http://hindurashtra.wordpress.com/books/
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जिहाद के प्रलोभन । सेक्स व लूट - अनवर शेख

इस्लाम अरब साम्राज्यवाद - अनवर शेख
इस्लाम ही आतंकवाद - पं महेन्द्र पाल आर्य ( पूर्व मौलवी - महबूब अली )
इस्लामिक आतंकवाद का इतिहास - लक्ष्मी शंकराचार्य
भारतीय मुसलमानों के हिन्दू पूर्वज मुसलमान कैसे बने ? पुरुषोत्तम
चौदहवी का चाँद - चमूपति एम ए - Saffron Hindurashtra ( रोहित शर्मा )
रंगीला रसूल - चमूपति एम ए  - रोहित शर्मा
हिन्दुस्तान में मदरसे - देवेन्द्र मित्तल
जिहाद और गैर मुसलमान - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
जिहादियों को जन्नत केवल कयामत बाद - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल
भारतीय इतिहास का विकृतीकरण - रघुनंदन प्रसाद शर्मा
तालिबान - इस्लाम व शांति ।
मुझे लोगों से तब तक युद्ध करने का आदेश मिला है । जब तक वे यह न सत्यापित करने लगे कि - अल्लाह के अतिरिक्त कोई और उपास्य नहीं है ।

क्या गैर मुसलमानों पर इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है ? शेख मुहम्मद बिन सालेह अल - उसैमीन रहिमहुल्लाह
islamhouse.com से साभार
इस्लाम कामवासना और हिंसा - अनवर शेख
कोई भी ईश्वर अपने अनुयायी बनाने हेतु कामवासना पूर्ति और हिंसा का मार्ग नहीं अपनायेगा । दैवत्व की अवधारणा के प्रति घातक हॊने के कारण यह ईश निंदा है । यह तो केवल अरब साम्राज्य बनाने के लिये मुहम्मदी योजना का अंग है ।
कुरआन की आयतों पर अदालत का निर्णय
कुरआन मजीद की पवित्र पुस्तक के प्रति आदर रखते हुए उक्त आयतों के सूक्ष्म अध्ययन से स्पष्ट होता है कि - ये आयतें बहुत हानिकारक हैं । और घृणा की शिक्षा देती हैं ।
अयोध्या विवाद का हल - डा. सुरेन्द्र
इस पुस्तक का उद्देश्य है । न्यायालय की मनमानी से भारत की विशाल जनता को छुटकारा दिलाना । और

अयोध्या में विवादित स्थल पर श्री राम मंदिर का निर्माण करना ।
दी गीता आन मैनेजमैंट - डा. मोहन खुराना
हमारी आदरणीय पुस्तक गीता जो संसार में व्यापक रूप से पढ़ी जाती है । ने जीवन के हर पहलू को छुआ है ।
सूफियों द्वारा भारत का इस्लामीकरण - पुरुषोत्तम
इस लिहाज से मैं सूफियों और पीरों को इस्लाम में भर्ती कराने वाली संस्था ही मानता हूँ । और मेरी चुनौती है कि - कोई इसके विपरीत तथ्य नहीं ला सकता है ।
इस्लाम - अरब राष्ट्रीयता का साधन - अनवर शेख
इस विचार धारा का आधार मुसलमानों के इस अँधविश्वास पर है कि - मुहम्मद उन्हें स्वर्ग दिलवा सकता है ।
मुस्लिम राजनीतिक चिंतन और आकांक्षायें - ले. ज. पुरुषोत्तम

पृथ्वी तो अल्लाह और उसके रसूल की है । इसीलिये अपनी छिनी हुई वस्तु की पुनः प्राप्ति के लिए निरंतर जिहाद करना विधि सम्मत है ।
आज इस्लाम के मसले - इरशाद मांजी
मुझे मुस्लिम होने से इनकार नहीं है । पर मैं उस यंत्र मानव की तरह नहीं बनना चाहती । जो अल्लाह के नाम पर चुपचाप चलते जाते हैं ।
इस्लाम के सैनिक - ले. ज. पुरुषोत्तम
Minorities and Social Justice: Problems & Policy Options -  B. P. Singhal
Why Muslims Destroy Hindu Temples - अनवर शेख
ISLAMISATION OF INDIA BY SUFIS - पुरुषोत्तम
इस लिहाज से मैं सूफियों और पीरों को इस्लाम में भर्ती कराने वाली संस्था ही मानता हूँ । और मेरी चुनौती है

कि - कोई इसके विपरीत तथ्य नहीं ला सकता है ।
Jihad In the Way of Allah - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल  ( हिन्दू राइटर्स फोरम )
Two Faces of jihad - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल ( हिन्दू राइटर्स फोरम )
The Meaning of jihad - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल ( हिन्दू राइटर्स फोरम )
Jihad & Jannt in Hadis - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल ( हिन्दू राइटर्स फोरम )
CristmaS – Fact or Fiction - डा. कृष्ण वल्लभ पालीवाल ( हिन्दू राइटर्स फोरम )
ISLAM THE ARAB IMPERIALISM - अनवर शेख

The Condition Of a Non Muslim In a Islamic State - Samuel Shahid
THE GLORY THAT IS HINDUTVA - B. P. Singhal
क्या हिन्दू मिट जायेंगे ? भारत की संत परम्परा । और सामाजिक समरसता ।
हिन्दू समाज में अनेक कुरीतियां रही होंगी । अथवा विद्यमान भी होंगी । परंतु साथ ही साथ उनके सुधारने के आंदोलन भी चलते ही रहे हैं । इसी प्रकार से हिन्दू समाज के भीतर छुआछूत व जाति पांति की समस्या भी है । परंतु साथ ही साथ यह भी देखने में आया है कि - भगवान बुद्ध के समय ( लगभग 2500 ) वर्ष पूर्व से ही संतो ने जन्मना जाति भेद भाव के विरुद्ध आंदोलन खड़ा किया । इन हजारों वर्षों में संतों ने छुआछूत को मिटाने के क्या प्रयत्न किए ?
गाथांयें पंजाब की भाग – 3
उसने यह कहा ही था कि - दुनिया ने 1 चमत्कार देखा । जिसकी आज भी लोग कल्पना करके दांतों तले उंगली दबा लेते हैं । बाबाजी का सिर धड़ से अलग हो चुका था । फतेह सिंह के शब्दों ने जादू का सा असर किया । उन्होंने अपने बांयें हाथ से अपने सिर को पकड़ लिया । अपने दांयें हाथ से वे अपना भारी खंडा चलाते रहे ।
हूँ तो मुगलानी हिन्दुआनी रहूंगी मैं - वचनेश त्रिपाठी
भारत के वे मुस्लिम संत । जो भारतीयता की भावनाओं से परिपूर्ण थे ।
- सभी जानकारी साभार आर के शर्मा के ब्लाग - कुरआन और मुहम्मद की नापाक असलियत.. से । क्लिक करें 

Wednesday, 19 September 2012

मेरे 2 बङे गुनाह - शाहजहाँ की कैद और सरमद का क़त्ल


किसी जंगल में 1 लोमड़ी रहती थी । जो बहुत ही धूर्त और चालाक थी । जंगल के छोटे मोटे जानवरों को वह अपनी मीठी बातों में फंसा कर उन पर शिकार करने का प्रयत्न करती । कभी कभी तो उसकी चालाकी समझकर कुछ जानवर भाग निकलते । और कभी कभी कुछ बेचारे उसका शिकार बनते । 1 दिन 1 गदहा कहीं से घूमता फिरता उस जंगल में पहुँचा । लोमड़ी ने सोचा कि - कहीं ऐसा न हो । यह गदहा जंगल के छोटे मोटे जानवरों को मेरी चालाकियाँ समझा दे । तो हम कहीं के भी नहीं रहेंगे । अतः उसने सोचा कि - क्यों न गदहा से भी दोस्ती का हाथ बढ़ा कर फिर उसका शिकार कर दिया जाय । वह बहुत ही विनमृ भाव में बोली - भाई तुम्हारा नाम क्या है ? और कहाँ से । और किस प्रयोजन से यहाँ आना हुआ ? गदहे ने अपना परिचय बता दिया । लोमड़ी ने कहा - बड़ा अच्छा हुआ । तुम आ गए । अब हम तुम 1 मित्र की भांति रहेंगे । गधा बिचारा सीधा सादा था । उसे छल प्रपंच की बातें आती नहीं थी । वह क्या समझता कि - लोमड़ी के मन में क्या पक रहा है ? 
1 दिन लोमड़ी कुछ उदास होकर बैठी । गदहे ने उसे चिन्तित देखा । तो पूछा - लोमड़ी बहन ! तुम इतनी उदास क्यों हो ? लोमड़ी ने और भी उदास मुद्रा बनाकर कहा - क्या बताऊं भाई !  मैंने 1 पाप किया है । उसी की याद करके मुझे पश्चाताप हो रहा है ।

लोमड़ी ने आंखों में आंसू भरकर कहा - कुछ दिन पहले मैं और मेरा लोमड़ सुख से रहते थे । 1 दिन हम दोनों में 1 बात को लेकर बड़ी जोर से झगड़ा हो गया । लोमड़ क्रोध में घर से बाहर निकल गया । कुछ देर तो मैं घर में रही । मैंने सोचा कि क्रोध शांत होने पर लोमड़ घर लौट आएगा । किंतु वह तो नहीं लौटा । लेकिन शेर की दहाड़ सुनाई पड़ने लगी । मैं भाग कर गई कि - कहीं शेर मेरे लोमड़ को मार न डाले । किंतु मेरे जाते जाते शेर मेरे लोमड़ का शिकार कर चुका था । मुझे भी घर जाने की इच्छा नहीं हुई । तब से मैं यहीं पड़ी रहती हूँ । इतना कहकर लोमड़ी रोने लगी । मैं यही सोचती हूँ कि - मैंने लड़ाई क्यों की ? गदहे ने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया । और बोला - मत दुखी हो बहन । गलती हो ही जाया करती है । तुमने जान बूझ कर तो कुछ किया नहीं ।
लोमड़ी ने कहा – भाई ! तुमने भी कोई पाप किया है कभी । तो मुझे बताओ ।
गदहे ने कहा – हाँ बहन ! 1 बार मुझसे भी गलती हो गई थी । मैं भी 1 धोबी का नौकर था । धोबी रोज कपड़ों की लादी मुझ पर लादता था । और घर से घाट । और घाट से घर ले जाया करता था । उसके एवज में मुझे घांस पानी मिलता था । 1 दिन धोबी के लड़के ने मुझ पर लादी लाद दी । और खुद भी बैठकर चला घात की ओर । उस दिन मेरी इच्छा चलने की नहीं हो

रही थी । मैं अड़ गया । लड़के ने पुचकारा । किंतु मैं अड़ा रहा । वह गुस्से में उतर कर मुझे मारने चला । मैंने वह पैर फटकारा कि - उसकी लादी भी गिर गई । और उसे भी चोट आ गई । और मैं वहां से चल दिया । मैं भी यही सोचता हूँ कि - मैंने वह गलती क्यों की ? लोमड़ी ने गुस्से में भर कर कहा - नमक हराम जिसका खाता रहा । उसी का काम करने में आनाकानी की । तेरी शक्ल भी देखना पाप है । कह कर वह झपटने को हुई । पहले तो गदहा यह न समझ पाया कि - लोमड़ी क्यों एकदम बदल गई । वह रेंकता हुआ भागा । लोमड़ी ने उसका पीछा किया ।
गदहे का रेंकना सुनकर जंगल के और जानवर आए । जब लोमड़ी और उसको भागते देखा । तो यह कहते हुए भागे कि - अरे ! आज लोमड़ी ने अपने लोमड़ की मनगढ़ंत कहानी सुना कर गदहे को अपना शिकार बना लिया ।

गदहे का क्या हुआ ? यह तो याद नहीं है । किंतु लोमड़ी पर से सभी जानवरों का विश्वास उठ गया । वह 1 अकेली और निरीह सी घूमने लगी । कहानी समझने की है । झूठ बोलकर धोखा दिया जा सकता है । किंतु यदि झूठ खुल गया । तो उस पर से सबका विश्वास सदा के लिए उठ जाता है ।
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घटना अकबर बादशाह के समय की है । 1 बार उसने बीरबल से कहा - बीरबल ! तुम कहते हो कि - तुम्हारा भगवान भक्तों की पुकार पर खुद दुनिया में चला आता है । तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि - वह खुद क्यों आता है । उसके यहां तमाम नौकर चाकर होंगे । क्यों नहीं उनको भेज देता । बीरबल ने कहा - जहाँपनाह ! इसका जवाब मैं आपको दूँगा । जहांगीर अकबर का सबसे बड़ा पुत्र था । और बड़ी मन्नतें और पूजा के बाद वह पैदा हुआ था । इसलिए अकबर उसे बहुत प्यार करता था । वह उस समय गोद में था । बीरबल ने जहांगीर की शक्ल का 1 पुतला बनाया । और उसे वैसे ही वस्त्र पहनाए । जैसा

कि जहाँगीर पहनता था । दूर से देखने पर लगता था कि - वह सलीम ही है । बीरबल ने शाही बाग में तालाब के किनारे उस पुतले को रख दिया । और अपने 2-4 आदमियों को उस पुतले के पास नियुक्त किया । जिससे ऐसा मालुम होता था कि - वे लोग बच्चे को खिला रहे हैं । पुतले के नीचे से 1 पतले तार को जोड़कर कुछ दूर तक फैला दिया । जिससे तार के हिलते ही पुतला कूद कर तालाब में गिर पड़े ।
सब प्रबन्ध करने के बाद बीरबल अकबर के पास पहुँचा । और बोला - जहांपनाह ! बहुत दिनों से आपने शाही बाग की सैर नहीं की । चलिये । आज टहल आईये । अकबर तैयार हो गया । और दोनों शाही बाग में पहुँचे । अकबर ने तालाब के किनारे बैठे पुतले को देखा । उसने समझा कि - सलीम खेल रहा है । खैर.. कोई बात नहीं । वह घूमता रहा । इतने में बीरबल ने धीरे से तार को खींच लिया । और पुतला पानी में  उछल कर 

गिर पड़ा । उसके पास खड़े कर्मचारी चीख पड़े । अकबर बादशाह ने भी न आव देखा न ताव । और पानी में कूद पड़ा । उसके मुख से चीख निकल पड़ी - हाय सलीम ।
पानी में उसके हाथ वही पुतला लगा । उसे देखकर वह क्रोधित हो गया । और बोला - बीरबल ! यह कैसा मज़ाक तुमने मेरे साथ किया है ? बीरबल ने शांत स्वर में जवाब दिया - जहाँपनाह ! तमाम नौकर चाकरों के रहते हुये आपको पानी में कूदने की क्या जरुरत थी ? अकबर को अपनी बातों का जवाब मिल चुका था । उसका क्रोध शाँत था । उसने कहा कि - बीरबल ठीक है । भक्तों की पुकार पर खुदा को खुद आना पड़ता है ।
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त्रेता के समय में सदन कसाई था । माँस बेचकर परिवार का पालन पोषण करता था । उसका नियम था कि - 1

बकरा रोज काटा जाय । और उसके माँस को बेचने पर जो कुछ पैसा मिलता था । उसमें उसे संतोष था । 1 दिन उसके नगर में 1 सरकारी अधिकारी आया । उसके सिपाही मांस लेने आये । शाम का समय था । सदन कसाई अपनी बिक्री समाप्त कर चुका था । और अपने नियम के अनुसार रोज 1 ही बकरा काटता है । सिपाही इस बात को सुनकर नाराज हुआ । सदन कसाई सोचने लगा कि - क्या किया जाय ? अंत में उसने सोचा कि - सामने जो बकरा कल के लिए बंधा रखा है । उसकी 1 टांग काट ली जाय । तो बात बन जायेगी । और हमारा उसूल भी नहीं बदलेगा । मांस पाकर सिपाही खुश हो जायेंगे । और बकरे को कल काट दूंगा ।
यह निर्णय करने के बाद सदन कसाई हाथ में गंडासा लेकर उठा । और बकरे के पास पहुंचा । ज्यों ही उसने बकरे की टांग का निशाना बनाया । त्यों ही बकरा हंस पड़ा । सदन कसाई का गंडासा रुक गया । और बकरे से पूछने लगा कि - भाई तुम हँसे क्यों ? बकरे ने जवाब दिया कि - तुम अपना काम करो ।

यह जानने से तुम्हें क्या काम ? सदन कसाई बोला कि - नहीं तुम्हें बताना पड़ेगा ।
बकरे ने हंस जवाब दिया कि - अब तक हम तुमको काटते रहे । और तुम हमको काटते रहे । यह अदला बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है । अब तुम यह नई रीति कैसी निकाल रहे हो कि मेरी 1 टांग काट दोगे । और मैं रात भर तड़पता रहूंगा । क्योंकि जिस तरह तुम मुझे तड़पाओगे । उसी तरह मैं भी तुमको तड़पाऊंगा ।
सदन कसाई ने हथियार रख दिया । और ये शब्द उसके मस्तिष्क में गूंजने लगे - यह अदला बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है । अंत में परेशान होकर उसने निश्चय किया कि - आज से यह काम बंद कर दूंगा । बकरे को उसने छोड़ दिया । और महात्माओं की तलाश में निकल पड़ा । ताकि उनसे क्षमा मांग कर अपने सारे पापों से मुक्त हो सके । भटकते भटकते अंत में राम भगवान का वह कृपा पात्र बना ।
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घटना बड़े स्वामी जी महाराज के समय की है । उनको लोग पंडित जी कहा करते थे । अलीगढ़ जिले में चिरौली गाँव में उनका घर था । हमारे बाबा जी ( जिनको लोग बाबा जय गुरुदेव के नाम से जानते हैं ) ने नामदान चिरौली में ही लिया था । उस समय उनकी 

अवस्था 17 वर्ष की थी । नामदान लेने के 1 वर्ष के अन्दर ही उन्होंने परमात्मा को प्राप्त कर लिया ?
खैर.. पंडित जी का जीवन बहुत सादा था । गांव वाले भी उन्हें न समझ सके कि - यह महापुरुष अपने अन्दर इतनी बड़ी दौलत को छिपाये हुये हैं । पंडित जी के पास दूर दूर से लोग मिलने आते थे । और दर्शन करके अपने जीवन को धन्य समझते थे । गाँव का जमींदार हैरान रहता था कि - इस गरीब पंडित के पास कौन सी चीज है कि अंग्रेज भी आते हैं । और पढ़े लिखे लोग भी आते हैं ।
1 दिन उसने अपने नाई से कहा कि - पंडित जी के घर जाना । तो इस बात का पता लगाना कि उनके पास लोग क्यों जाते हैं ? और क्या बात होती है । नाई ने कहा - सरकार अच्छी बात है । मैं पूरा पता लगाऊँगा ।
दूसरे दिन नाई पंडित जी के घर गया । और साबुन लगा कर दाढ़ी बनाने लगा । बातचीत के दौरान में उसने पूछा - पंडित जी ! आप क्या धर्म की बात बताते हैं ? मुझे भी कुछ सुनाईये । पंडित जी की 1 तरफ की दाढ़ी नाई बना चुका था । और दूसरी तरफ बनाना

बाकी था । पंडित जी ने नाई से कहा - रुक जाओ । और बोले - क्या जानना चाहते हो ? नाई ने बड़ी खुशी से कहा - हाँ पंडित जी ।
पंडित जी ने नाई को बैठकर परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बता दिया । उसने आँख बंद करके दिव्य लोकों का जलवा देखा । तो अपने को धन्य धन्य समझने लगा । लाख लाख शुकराना वह पंडित जी का करने लगा ।
दूसरे दिन प्रातः काल जब वह जमींदार के घर गया । तो जमींदार ने पूछा - क्यों भाई कुछ पता लगा ? यह सुनकर नाई ने कहा - ऐ जमींदार साहब ! जमींदार होंगे । आप अपने घर के । अगर आपको कुछ जानना हो । तो आप वहीं चले जाईये । मैं कुछ न बता पाऊँगा ।
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जिस समय दिल्ली की गद्दी पर औरंगजेब बैठा था । उसी समय में 1 सूफी फकीर सरमद । अपनी फकीरी मस्ती में दिल्ली की सड़कों पर आया जाया करते थे । जब और जहाँ उनकी इच्छा हुई । वहीं वो बैठ जाते । लोग उन्हें

देखते । तो कोई हँसता । कोई उन पर फिकरे कसता । परन्तु उन पर किसी के कहने सुनने का कोई असर नहीं था ।          
औरंगजेब के दरबारियों ने औरंगजेब से इस मस्त फकीर की चर्चा की । दरबारियों  ने कहा - जहाँपनाह ! वह इतना गरीब है कि उसके पास कपडे भी ठीक नहीं हैं । और वह ऐसे ही पड़ा रहता है । औरंगजेब ने आदेश दिया कि - उस गरीब फकीर को कपडे दिए जायें । दरबार का 1 कर्मचारी वस्त्र लेकर सरमद साहब के पास पहुंचा । उस समय वे मोती मस्जिद के फाटक के पास बैठे हुए थे । दरबारी ने जाकर कहा - ऐ  फकीर ! इन कपड़ों को कबूल करो । शहंशाह औरंगजेब ने तुम्हारी मुफलिसी पर रहम  खाकर इसे भेजा है । सरमद साहब सुनी अनसुनी कर गए । दरबारी ने पुनः अपने  वाक्य को दुहराया । सरमद ने कहा - ले जा उस कपडे को । औरंगजेब को दे दे । उससे कहना कि - पहले अपनी मुफलिसी दूर करे । फिर रहम करे । दरबारी वापस लौट गया ।

औरंगजेब का क्रोध प्रसिद्ध था । सब जानते थे । उसके तलवार की धार बराबर पैनी  रहती है । दरबारी डर गया कि - कहीं फकीर की बात सुनकर औरंगजेब क्रोधित न हो उठे । वह दरबार में वस्त्रों को लेकर हाज़िर हुआ । औरंगजेब ने पूछा - फकीर  ने कपडे नहीं लिए । उत्तर मिला - नहीं । क्यों क्या कहा उसने ? औरंगजेब का दूसरा प्रश्न था । दरबारी ने कहा - लेने से इंकार कर दिया । फकीर की बात कहने का साहस वह न कर सका ।    
औरंगजेब ने सोचा । अजीब फकीर है । नंगे रहना पसंद करता है । किन्तु कपडे नहीं लेता । उसने निश्चय किया कि - वह खुद जाकर उसे कपडे देगा । वह जानता था कि - फकीर निडर होते हैं । और जो चाहे वह कर भी सकते 

हैं । दुसरे दिन औरंगजेब खुद ही कपडे लेकर सरमद साहब के पास चला गया । मोती  मस्जिद के पास ही सरमद लेटे हुए थे । औरंगजेब ने कहा - फकीर साहब ! तुमने कपड़ों को क्यों लौटा दिया ? मैं हिन्दुस्तान का बादशाह औरंगजेब । खुद तुम्हारी खिदमत में आया हूँ । कपडे ले लो । सरमद ने बगल में इशारा करते हुए कहा - औरंगजेब ! पहले इसको ढँक दे । जो मुझसे भी अधिक शर्मनाक है । औरंगजेब सरमद की बात न समझ सका । उसने चादर जमीन पर फैला दिया । फिर बोला - और कपडे न लो । अपने ऊपर चादर ही डाल लो । फकीर ने कहा - चादर उठाने की बात मत कह । बादशाह तू लौट जा । चादर के नीचे तुने क्या ढका है ? उसे देख नहीं सकेगा ।
औरंगजेब के लिए फकीर की बातें 1 पहेली बन रही थी । वह कुछ न समझा । तो उसका  क्रोध भड़कने लगा । उसने गुस्से में कहा - सरमद तुझे चादर ओढनी ही पड़ेगी । तू नहीं समझ रहा है कि - तेरे सामने बादशाह औरंगजेब खड़ा है ।  सरमद मुस्करा कर 

बोले - तू नहीं मानता है । तो उठा ले चादर । और मुझे ढक दे । औरंगजेब ने ज्यों ही चादर उठाया । तो एकदम घबरा गया । चादर उठाते ही उसे लगा कि - दारा की भोली आँखे उसे घूर रही है । शुजा और मुराद का खून से लथपथ धड तड़प रहा है । शाहजहाँ की आह उठकर उसके कानों को परेशान करने लगी । ये वही लोग थे । जिन्हें औरंगजेब ने पहले क़त्ल कर दिया था । 
आखिर में घबरा कर उसने चादर छोड़ दिया । सरमद ने कहा - बता औरंगजेब ! तेरे पापों को ढकना अधिक जरुरी है । या  इस शरीर को ? औरंगजेब की बहुत बड़ी पराजय हुई थी । वह चुपचाप किला वापस लौट आया । कुछ दिन तो उसे वह भयानक दृश्य और वे आवाजें बेचैन करती रहीं । अपने ही कर्मों से और अन्दर की आवाज से औरंगजेब घबरा उठा । और उसने सरमद का क़त्ल करवा दिया । कहते हैं । औरंगजेब अंतिम दिनों में अपनी डायरी लिख रहा था । तो उसने लिखा कि - मैंने जीवन में बहुत से गुनाह किये हैं ।  किन्तु उन सबमें सबसे बड़े 2 गुनाह हैं । जिसके लिए मैं अपने को माफ़ नहीं कर सकूँगा । 1 शाहजहाँ की कैद । 2 सरमद का क़त्ल ।

Sunday, 16 September 2012

मैं अपनी सास का बलि का बकरा कैसे बना ?


यात्रा वृतांत- श्री अमरनाथ गुफा की यात्रा
जब से मैंने अमरनाथ यात्रा के बारे में सुना । वहॉं के छाया चित्रों को देखा । त‍बसे अमरनाथ यात्रा जाने का मैंने मन में निश्‍चय कर लिया । मई 2011 में अमरनाथ श्राइन बोर्ड के तरफ से यह सूचना आम भारतीयों को दी गई कि - 29 जून से लेकर 13 अगस्‍त तक अमरनाथ के पवित्र गुफा में बाबा बर्फानी के दर्शन का मार्ग खुलेगा । अर्थात दर्शन सुलभ हो पाएगा ।
यात्रा से पहले श्राइन बोर्ड के तरफ से कुछ औपचारिकताएँ पूरी करनी होती है । जिसमें श्राइन बोर्ड के तरफ से 2 फार्म भर कर J & K बैंक अथवा अन्‍य बैंकों में जमा करना होता है । पहला फार्म - A एक आवेदन के रूप में होता है । जिस पर 1 पासपोर्ट आकार का रंगीन फोटो लगाना होता है । और दूसरा फार्म यात्रा परमिट का होता है । जिसमें 3 भाग होते हैं । उन तीनों पर भी पासपोर्ट आकार के फोटो लगाने होते हैं । इसका 1 भाग चंदनवारी प्रवेश द्वार पर । दूसरा पवित्र गुफा के प्रवेश द्वार पर । तथा तीसरा भाग पूरी यात्रा के दौरान अपने पास पहचान पत्र के रूप में रखना होता है । आजकल इंटरनेट की सुविधा होने के कारण ये औपचारिकताएं भी ऑन 

लाइन संभव है । औपचारिकताएं पूरी होने के बाद मैं सफर की तैयारी में लगा । सर्वप्रथम 1 जोड़ी जूता खरीदा । 4 से 5 किमी चलने का अभ्‍यास रोजाना शुरू किया । तथा कुछ आवश्‍यक सामाग्री की व्‍यवस्‍था भी करनी शुरू की । जिनकी जरूरत यात्रा के दौरान पड़नी थी । जैसे - टार्च । चश्‍मा । बरसाती । गर्म ट्रैक शूट । पैजामी । बनियान । 1 जोड़ी कपड़ा दर्शन हेतु । दस्‍ताना । सनस्‍क्रीन लोशन । वैसलीन । कोल्‍ड क्रीम । ग्‍लूकोज । काली मिर्च पाउडर । काला नमक । भूने चने । ड्राई फ्रुट । चाकलेट । नींबू । कुछ जरूरी दवाएं । जैसे - बुखार । उल्‍टी । दस्‍त । चक्‍कर । घबराहट आदि के उपचार हेतु ।
यह मेरा सौभाग्‍य था कि रेल कोच फैक्‍टरी कपूरथला से यात्रियों का 1 जत्‍था 9 july को बस से जाने का तय हुआ । और इस जत्‍थे का 1 सदस्‍य मैं भी बना । यात्रा की शुरूआत यहॉं के शिव मंदिर में पूजा अर्चना के बाद 

कारखाने के मुख्‍य यांत्रिक अभियंता श्री आलोक दवे जी के हाथों यात्रियों को माला पहना कर व लड्डू खिलाकर रात के 8 बजे हुई । हर हर महादेव के जयघोष के साथ मैं अपने सहयात्रियों के साथ यहॉं से रवाना हुआ ।
यात्रियों के लिए लंगरों की व्‍यवस्‍था पंजाब से ही शुरू थी । हम लोग रात्रि 10.15 बजे दसुहा के 1 मंदिर पर रूके । जहॉं लंगर की व्‍यवस्‍था थी । वहीं हम सब यात्रियों ने भोजन किया । व अल्‍प विराम लेकर यात्रा के लिए बस में सवार हो गए ।
बस जम्‍मू । उधमपुर । पटनीटॉप । रामबन । बनीहाल । काजीकुंड । अनंतनाग होते हुए पहलगाम से 3 किमी

पहले नुनवान पहुँचे । रास्‍ते में प्राकृतिक दृश्‍यों का आनंद उठाते हुए जब जवाहर सुरंग पहुँचे । तो सभी यात्रियों का मन पुलकित हो उठा । और सभी ने जयकारा लगाना शुरू कर दिया । जवाहर सुरंग की लम्‍बाई 2.5 किमी है । यह सुरंग कश्‍मीर का प्रवेश द्वार है । यहॉं 1 नहीं बल्कि 2 सुरंग बराबर लम्‍बाई के है । जो जर्मन इंजीनियर के सहयोग से 22 dec 1956 में शुरू हुआ । उस समय यह सुरंग एशिया का सबसे लम्‍बा सुरंग था । पीर पुंजाल के पहाड़ों के तलहटी में बना सुरंग बनिहाल को काजीगुंड से जोड़ता है । यहीं सुरंग कश्‍मीर को पूरे भारत से जोड़ता है ।
ऐसे तो यात्रा शुरू से आनंदमय थी । पर जैसे जैसे बस पटनीटॉप से होते हुए आगे को बढ़ रही थी । मौसम के मिजाज भी बदल रहे थे । मौसम के ठंडी और खुशनुमा एहसास ने यात्रियों को गर्मी से निजात दिलाई । रास्‍ते में जगह जगह पर सुरक्षा के कड़े प्रबंध थे । सैनिक गश्‍त लगा रहे थे । नुनवान पहुँचने

पर तो हम यात्रियों के मन में आनंद की जो लहर दौड़ रही थी । वो पहाड़ों की तलहटी पर लिद्दर नदी की बलखाती चाल को देख और भी अधिक हो गई । सभी की थकान भी प्रसन्‍नता के कारण मिट चुकी थी ।
नुनवान में हम सभी यात्रियों ने अपने अपने सामानों के साथ चेक पोस्‍ट से गुजर कर अमरनाथ के श्राइन बोर्ड के कैंप के भी चेक पोस्‍ट से होते हुए रात के 11 बजे कैंप पहुँचे । जहॉं हम सभी ने हट किराए पर लिया । वैसे वहॉं हटों के अलावा टेंट भी किराए पर मिलते हैं । हम सभी ने सामान वहीं रखा । और लंगर में खाना खाने पहुँचे ।
मैंने पंजाब के बहुत से लंगरों में खाना खाया था । परंतु वहॉं का नजारा अदभुत था । कतार में करीब लंगर के 20 खेमे लगे थे । जो अलग अलग शहरों के थे । सभी खेमों में तरह तरह के पकवान सजे हुए थे । और वहॉं के सेवादार भाई बड़े प्‍यार और आदर भाव से सभी को भोजन करा रहे थे । वहॉं समयानुसार चाय  नाश्ते एवं खाने का प्रबंध रहता है । देश के लगभग सभी व्‍यंजन यहॉं पर अमरनाथ यात्रा के दौरान 

उपलब्‍ध होते है । वृत के लिए फलाहार एवं मधुमेह के रोगियों के लिए भी शुगर फ्री खाने का प्रबंध वहॉं पर था । हम सब लोग स्‍वेच्‍छा पूर्वक भोजन कर अपने हटों में गए । और रात्रि विश्राम किया । 
सुबह 4 बजे से हमारे सहयात्री भाई बहन चंदनबारी जाने को तैयार होने लगे । एवं 5 बजे तक वो सभी हमें एवं हमारे साथ के लगभग 10 यात्रियों को छोड़कर पहलगाम से रवाना हो गए । पहलगाम से चंदनवारी 16 किमी है । वहॉं तक की यात्रा जम्‍मू कश्मीर ट्रांसपोर्ट के मिनी बसों से की जाती है ।
अब चंदनवारी से आगे का रास्‍ता यात्री अपने इच्‍छानुसार पैदल । घोड़ा । पिट्ठू । पालकी आदि से करते है । चंदवारी से पिस्‍सु टॉप की चढ़ाई बहुत खड़ी है । जो कि लगभग 3 किमी है । इसके आगे की चढ़ाई थोड़ी सुगम परन्तु लंबी है । पिस्‍सु टॉप से जोजीबल फिर नागकोटी अंत में पहला पड़ाव शेषनाग है । जिसकी कुल दूरी 9 किमी  है । शेषनाग जो कि यात्रियों के पहले दिन का पड़ाव स्‍थल है । जो चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा है । जिसके कारण यहॉं पर ऑक्‍सीजन की कमी होती है । और यात्रियों को थोड़ी बहुत परेशानी सॉंस लेने में आती है । जो सामान्‍यत: प्राथमिक उपचार से दूर हो जाती है । रास्‍ते में मेडीकल की सुविधाएं उपलब्‍ध हैं ।
शेषनाग में 7 पहाड़ों की चोटियॉं हैं । यहॉं पर शेषनाग झील भी है । यहॉं से यात्रियों का जत्‍था दूसरे दिन खड़ी 

ढलान को पार करते हुए वारबल एवं महागुनास टॉप की खड़ी चढ़ाई भी चढ़ते हैं ( जो कि इस सफर का सबसे ऊँचा स्‍थान है । जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से करीब 14500 फीट है ) फिर पविबल होते हुए दूसरे दिन के पड़ाव स्‍थल पंचतरणी पहुँचते है । रास्‍ते के मनोरम प्राकृतिक दृश्‍यों । झरनों । झील व पहाड़ आदि यात्रियों की थकान मिटाने में सहायक होते हैं । शेषनाग से पंचतरिणी की दूरी लगभग 14 किमी है । पंचतरिणी में रात्रि विश्राम कर श्रद्धालु सुबह से ही पवित्र गुफा की ओर बाबा बर्फानी के दर्शनों को चल देते हैं । जो कि लगभग 6 किमी का रास्‍ता है । बर्फ के बने रास्‍तों पर डंडे के सहारे चलना एक अलग ही आनंद का एहसास कराता है । पवित्र गुफा के दर्शन के पश्‍चात श्रद्धालु वापिस बालटाल के लिए रवाना होते हैं । जो कि लगभग 14 किमी है ।
नुनवान । शेषनाग व पंचतरिणी में रात्रि विश्राम के लिए टेंट भाड़े पर मिलता है । जिसका किराया 100 रू से लेकर 250 रू प्रति व्‍यक्ति तक लेते हैं । जिसमें कंबल एवं विछावन का भी किराया शामिल होता है । रास्‍ते में छोटी मोटी जरूरत का सामान जैसे - मिनरल वाटर । चाकलेट । जूस । कोल्‍ड ड्रिंक्‍स । नमकीन । बिस्‍कुट । नीबू पानी आदि थोड़ी थोड़ी दूरी पर छोटी छोटी दुकानों में उपलब्‍ध होती है । जिनकी कीमत अधिकतम खुदरा मुल्‍य से 2 

गुनी होती है । लंगरों में खाने पीने की वस्‍तुएं व रास्‍तें में मेडिकल की सुविधाएं दी जाती है । जो कि निशुल्‍क होती है ।
मेरे साथ मेरी बेटी जो कि छोटी है । बेटा व पत्‍नी भी थे । अत: मैंने अपने मित्र व उसकी पत्‍नी एवं एक मित्र के भाई के साथ बालटाल के रास्‍ते पवित्र गुफा के दर्शन करने का निश्‍चय किया था । हम लोगों ने अपने सहयात्रियों को नुनवान से विदा करने के बाद पहलगाम घूमने निकल पड़े । चारों तरफ पहाड़ों से घिरा एवं सड़क के किनारे लिद्दर नदी बलखाती हुई पहलगाम के सुंदरता में चार चांद लगाती है । यहॉं के बाजारों में बहुत रौनक थी । एवं अच्‍छे अच्‍छे होटल भी थे । हम लोगों ने प्राकृतिक नजारों का भरपूर आनंद उठाते हुए वहॉं के पार्कों में जाकर फोटोग्राफी की । एवं बाजारों में घूमते हुए वापस नुनवान पहुँचे । दिन का खाना लंगरों में खाने के पश्‍चात बालटाल के लिए अपने बस में बैठ गए । अनमने मन से हम लोगों ने यात्रा शुरू की । लेकिन जब बस श्रीनगर पहुँची । तो वहॉं के स्‍थानीय पुलिस ने बस को सुरक्षा की दृष्टि से आगे जाने से रोक दिया । 3 घंटों के इंतजार के बाद बस बालटाल के लिए फिर रवाना हुई । करीब 15 मिनट पश्‍चात मुगल गार्डेन । निशांत बाग का चलती बस से दर्शन हुए । हम सब उत्‍सुकता से देखे जा रहे थे । और हमारी बस डल झील के 

किनारे से होती हुई आगे बढ़ रही थी । शाम होने वाली थी । जिससे की सूर्यास्‍त का नजारा डल झील में देखते ही बन रही थी । डल झील के सतह पर सूर्यास्‍त की लालिमा । डल झील को अदभूत सौंदर्य प्रदान कर रही थी ।
रास्‍ते में सोनमर्ग होते हुए करीब रात्रि 11 बजे हम लोग बालटाल पहुँचे । वहॉं 2 बस स्‍टैंड है । 1 तो हेलीपैड के पास है । जहॉं से थोड़ी दूर पर गेट नं. 1 है । जहॉं लंगर एवं यात्रियों के रहने के लिए टेंट व क्‍लाक रूम की व्‍यवस्‍था है । दूसरा बस स्‍टैंड गेट नं 1 से 2 किमी दूरी पर है ।
हम सभी यात्रियों ने रात्रि विश्राम के पश्‍चात सुबह नित्‍य क्रिया से निवृत हो पैदल यात्रा शुरू की । बालटाल में भी सुबह का नाजारा बड़ा ही मनोरम था । हेलीकॉप्‍टर सुबह से ही उड़ाने भरने लगे थे । हेलीकॉप्‍टर बालटाल से पंचतरिणी के लिए है । फिर पंचतरिणी से 6 किमी पवित्र गुफा है । जिसका जिक्र ऊपर कर चुका हूँ ।
हम लोग बालटाल से 2 किमी चलने के बाद दो मेल पहुँचे । जहॉं की यात्रा परमिट चेक होते है । फिर आगे की

यात्रा बरारी टॉप तक खड़ी चढ़ाई है । जिसकी दूरी करीब 5 किमी है । यह रास्‍ता धूल भरा है । पोनी वालों के कारण धूल ज्‍यादा उड़ती है । अत: नाक पर मास्‍क लगाना जरूरी होता है । दो मेल से पवित्र गुफा तक पोनीवाले 1200 से 2000 रू तक लेते हैं । हम लोग सपरिवार अपने सहयोगियों के साथ पैदल चले । 2 किमी चलने पर पहला लंगर मिला । वहॉं पर थोड़ा विश्राम कर खाना खाया । फिर यात्रा आगे बढ़ी । कुछ दूर चलने पर ऑक्‍सीजन की कमी व धूल से परेशान हो बेटी घबराने लगी । अत: बरारी टॉप तक के लिए पोनी रु 700 में किया । बेटा पैदल जाने की जिद पर था । अत: पत्‍नी व मेरे मित्र सभी पैदल चलने लगे । जब हम लोग बरारी टॉप की ओर बढ़ रहे थे । तो बाबा बर्फानी की कृपा मानों रिमझिम फुहार के रूप में यात्रियों पर बरस रही थी । जिसके कारण धूल उड़ना बंद हो गया । और सफर सुहाना हो गया । रास्‍ते का सौंदर्य बयान करना शब्‍दों से परे है

। हॉं इतना कह सकते हैं कि प्राकृतिक नजारा देखकर हृदय के अंदर आनन्‍द का संचार हो रहा था ।
जब मैं बरारी टॉप पहुँचा । तो वहॉं का नजारा अव्‍यवस्‍थाओं से भरा था । रास्‍ता सकरा होने के कारण आने जाने वाले श्रद्वालुओं की भीड़ जमा हो चुकी थी । भीड़ अनियंत्रित थी । जिसके कारण ऐसा लग रहा था कि मानों कोई दुर्घटना हो जाएगी । कुछ समय बाद सुरक्षा कर्मी आये । और व्‍यवस्‍था को संभालने की कोशिश करने लगे । फलस्‍वरूप थोड़े समय के पश्‍चात भीड़ छँटने लगी । और भोलेनाथ की कृपा से कोई दुर्घटना नहीं हुई । मैं वही पर बेटी के साथ अपने सहयात्रियों एवं पत्‍नी व बेटे का इंतजार कर रहा था । कुछ समय बाद मित्र उनकी पत्‍नी व मित्र का छोटा भाई तो मिले । पर पत्‍नी व मेरे बेटे दोनों कब आगे निकल गये । पता ही नहीं चला । इंतजार करते करते शाम होने लगी । और ठंड बढ़ने के कारण हम लोगों ने यात्रा आगे बढ़ाने का निश्‍चय लिया । बरारी से संगम की दूरी 4 किमी है । रास्‍ता ढलान वाला था । अभी थोड़ी दूर ही बढ़े थे कि दर्शन कर वापस आ रहे हमारे 1 मित्र जो हमारे साथ कोच फैक्‍टरी से आये थे । वो मिल गए । और उन्‍हीं के द्वारा हमें अपनी पत्‍नी व बेटा की कुशलता की सूचना मिली । उन्‍होंने बताया कि अगले लंगर पर वो हम लोगों का इंतजार कर रहे हैं । तब जाकर मन को राहत मिली । रास्‍ते में ग्‍लेशियर मिला । और आगे मार्ग में थोड़ी दूरी पर ग्‍लेशियर फटने के कारण रास्‍ता काफी दुर्गम हो गया था । परन्‍तु मिलन की आस में बेटी और हमारे साथी आराम से रास्‍ता पार कर गए ।

हम लोग जैसे जैसे आगे बढ़े । तो उधर से आ रहे अजनबी यात्री लोग भी मुझसे मेरी पत्‍नी की कुशलता के बारे में बताते जा रहे थे । क्‍योंकि पत्‍नी ने मेरी एवं बेटी का हुलिया बता कर संदेश देने की मिन्‍नत सबसे की थी । मेरा मन रामायण काल में विचरने लगा था । दुर्गम रास्‍ता एवं राम की तरह व्‍याकुल मन से पत्‍नी रूपी सीता को ढूढ़ रहा था । और रास्‍ते में जैसे जैसे पत्‍नी की कुशल क्षेम का पता चला । मिलन के लिए मन और व्‍याकुल हो रहा था । खैर..आखिरकार वो पल भी आ गया । जब हम सब रात 10 बजे आपस में मिलें । वहॉं रहने का उचित प्रबंध नहीं था । अत: हम सब आगे संगम की ओर बढ़ने लगे । संगम पर सी आर पी एफ का बेस कैंप है । जहॉं दो सैनिक सुरक्षा के लिए गस्‍त लगा रहे थे । उन्‍होंने हमें रोककर पूछताछ की । और आगे रात्रि में यात्रा न करने की सलाह देते हुए हम सबको रात्रि विश्राम वहीं करने को कहा ।
महिलाओं का कैंप अलग और पुरुषों का अलग कैंप था । जहॉं उन्‍होंने हमें स्‍लीप बैग लाकर दिया । और हम

सबने रात्रि विश्राम कर सुबह 4:30 बजे अपनी शेष यात्रा गुफा तक की शुरू की । संगम में अमरावती एवं पंचतरणी नदी का संगम है । पंचतरणी में भैरव पहाड़ी के तलहटी में 5 नदियॉं बहती हैं । जो भगवान शिव के जटाओं से निकलती है । ऐसी मान्‍यता है । पूरे रास्‍ते छोटे झरने । जल प्रपात का दृश्‍य नयनाभिराम लगते हैं । संगम से गुफा का रास्‍ता भी काफी खड़ी चढ़ाई है । जो कि लगभग 1 कि‍मी है । उसके बाद ढलान है । जिसमें बर्फ का रास्‍ता शुरू हो जाता है । बर्फ पर डंडो के सहारे चलने का मेरा पहला अनुभव था । जो कि बेहद रोमांचकारी रहा । 1.5 किमी चलने के बाद छोटे छोटे रंग बिरंगे टेंटों में दुकानें सजी हुई थी । और दुकानदार प्‍यार से यात्रियों को बुला रहे थे । वहॉं नहाने के लिए नदी के पानी को गर्म कर दुकानदार प्रति बाल्‍टी 50 रुपये में दे रहे थे । रुकने व सामान रखने के लिए कोई शुल्‍क नहीं लगता है । एक दुकान जो कि अमरावती नदी के किनारे पर था । हम सभी वहॉं रुके । सुबह के 7 बजे थे । हम सभी ने वहीं नदी के गर्म पानी से स्‍नान किया । और बड़े उत्‍साह के साथ पवित्र गुफा के दर्शन हेतु निकल पड़े । जब हम सबने बाबा बर्फानी के दर्शन के साथ 

साथ वहॉं विराजमान 2 कबूतरों को जिन्‍हें अमर कबूतर कहा गया है । देखा तो दिल में उमंग उल्‍लास की जो लहर दौड़ी । उसका वर्णन शब्‍दों में बयान करना नामुमकिन सा लग रहा है । ये अनुभव तो आप वहॉं जाकर महसूस कर सकते हैं । बर्फ से बने शिव लिंग का दर्शन बड़े सुकून के साथ हुआ । फिर प्रसाद प्राप्‍त कर हर्षित मन से भोले की अदभुत शिवलिंग की छवि मन में लिए वापस बालटाल आने को चल दिये । दर्शन के पश्‍चात सफर की सारी थकान मानों गायब सी हो गई ।
रात्रि बालटाल में श्री मणी महेश सेवा मण्‍डल कपूरथला द्वारा लगाया गये पंडाल में विश्राम एवं शयन किया । और सुबह वहीं लंगर में नाश्ता चाय कर वापस अपने बसों में रेल कोच फैक्‍टरी आने के लिए सवार हो गये ।
वापसी रास्‍ते में सोनमर्ग में सुबह का नजारा बहुत ही खूबसूरत लग रहा था । पूरे रास्‍ते नदी । पहाड़ एवं झरनों का अद्भुत नजारा था । श्री नगर में भी कुछ घंटे के लिए रुके । वहॉं निशात बाग एवं डल झील में शिकारें में सैर किया । कश्‍मीर दर्शन करने पर पता चला कि यूं ही लोग कश्‍मीर को दूसरा स्‍वर्ग नहीं कहते । यह सच है कि - अगर 

धरती पर स्‍वर्ग कहीं है । तो वह कश्‍मीर में ही है ।
स्‍थानीय प्रशासन के सुरक्षा कारणों से हम लोगों को एक रात मीर बाजार में गुजारनी पड़ी । और दूसरे रात यानि 16.07.2011 को सुबह 2 बजे हम सब रेल कोच फैक्‍टरी कपूरथला पहुँचे । जहॉं के शिव मंदिर से हमारी यात्रा प्रारम्‍भ हुई थी ।
हमारी यात्रा का समापन अगले रविवार को भगवान भोले के रुद्राभिषेक के साथ आर सी एफ के शिव मंदिर में ही हुई । जहॉं सभी यात्रियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्‍सा लिया ।
अंत में अमरनाथ की अमर कथा संक्षेप में - जब पार्वती ने शंकर से अमरत्‍व का रहस्‍य बताने को कहा । तो शिव ने अपना नंदी बैल को पहलगाम ( बैलग्राम ) में । चंदनवाड़ी में चॉंद । शेषनाग में गले का सर्प । महागुनाश में अपने बेटे गणेश को । और पंचतत्‍व ( पृथ्‍वी । आकाश । पानी । हवा और अग्‍नि ) जिससे मानव बना है को पंचतरणी में छोड़ा । और पवित्र गुफा में विराज कर कालाग्‍नी के द्वारा सभी जीवित जीव को नष्‍ट कर मॉं पार्वती को अमर कथा सुनायी । जो सौभाग्‍य से अंडे से बना कबूतर ने सुना । और अमर हो गया । आज भी वह अमर कबूतर भक्‍तों को दर्शन देता है ।
♥♥♥♥
सास पुराण
सास का ख्‍याल आते ही मैं कॉंपने लगता था । मेरी सॉंसें उखड़ने लगती थीं । हालांकि मैं अपनी पत्‍नी से डरता नहीं हूँ । फिर भी आपसे अनुरोध है कि कृपया इस रचना को मेरी पत्‍नी को पढ़ने के लिए नहीं दीजियेगा । क्‍योंकि इस रचना को अगर मेरी पत्‍नी ने पढ़ लिया । तो वह मेरी ऐसी हालत कर देगी कि मैं आपके लिए दूसरी

रचना पेश करुँ । ऐसी स्थिति नहीं रहेगी । तो आईये । मैं बजरंग बली का नाम लेकर आपको यह बताऊँ कि - मैं अपनी सास का बलि का बकरा कैसे बना ?
यह मेरा दुर्भाग्‍य है कि मेरे कुंआरे जीवन की कोई भी रात ऐसी नहीं बीती । जिसमें एक भयानक चेहरा मेरे सपनों में न आया हो । और वह भयानक चेहरा किसका हो सकता है ? यह आप अनुमान लगा लें । वैसे मैं बजरंग बली का भक्‍त हूँ । और भूत प्रेत से डरता नहीं हूँ ।
बात उन दिनों की है । जब मैं कुंआरा था । और मेरी नई नई नौकरी भी लगी थी । मेरे मित्र जो शादीशुदा थे । वे अक्‍सर मेरे यहॉं बैठ कर गप्‍पें मारते । और अपनी अपनी सास पुराण सुनाते । मित्रों की बातें सुन कर मेरी आत्‍मा कांप उठती । कुंआरे जीवन में जो काल्‍पनिक रंगीन स्‍वपनों वाली रातें होनी चाहिए थी । वे इन मित्रों की वजह से भयानक स्‍वपनों वाली रातों में बदलने लगी । रामसे प्रोडक्शन फिल्‍म की तरह मेरे सपने भी भयानक हो गए । सपने की प्रथम दो रीलों में प्रेमिका के साथ छेड़छाड़ । फिर शादी । और शादी के बाद सास से मुलाकात । पहले तो मेरी सास सौम्‍य लगती । परन्‍तु हारर फिल्‍म की तरह कुछ ही देर में उनके चेहरे पर दो दॉंत उग आते । उनका चेहरा कुरुप हो जाता । और वे मुझे तरह तरह की यातनाएं देती । यह यातना भरी स्‍वपन 15 रील चलती । आप समझ सकते हैं कि - मेरी रातें फिर कैसे घुटन भरी हो गई । इस स्‍वपन से छुटकारा पाने की मैंने बहुत कोशिश की । मगर 

कामयाब न हो सका । आप यकीन नहीं करेंगे कि मेरी उमृ 24 साल से 30 साल की हो गई । मगर यह स्‍वपन बिना नागा किए प्रत्‍येक रात आता । और जब चीख मार मैं सुबह उठता । तो पसीने से अपने आपको तर पाता । शुरु शुरु में पड़ोसी दौड़ पड़ते । और मुझे तरह तरह सांत्‍वना देते । मगर मेरी चीख बाद में उन लोगों के लिए मुर्गे की बॉंग की तरह हो गई । अब मेरे पड़ोस में अलार्म घड़ी लगा कर कोई न सोता । अब वे लोग मेरी चीख सुन कर उठते ।
जिसकी कल्‍पना मात्र से ही इतना डर लगता हो । वह हकीकत में कितनी मुश्किल करेगी । यह सोचकर मैंने फ़ैसला कर लिया कि - अब मैं शादी नहीं करुँगा । मगर हाय रे समाज ! वह कब किसी को चैन से मरने देता है । सभी मुझे सलाह देने लगे । शादी कर लो । अब नहीं करोगे । तो कब करोगे ? जब किसी पार्टी में जाता । तो सभी मित्र सपत्‍नीक होते । तो उनके लिए मैं ही आकर्षण का केंद्र होता । वह मुझे ऐसे घूरते । मानो वे किसी पार्टी में नहीं । वरन किसी चिडि़याघर में मुझ जैसे निराले अविवाहित लाचार प्राणी को देखने आए हों । अपने मित्रों को अपनी अपनी पत्‍नी के साथ मुस्‍कराते देख मेरे दिल में कोमल भावनाओं का प्रबल आवेश आया । और मैंने शादी करने का फैसला कर लिया । मगर अब शादी का पता चलता है कि पति पत्‍नी के साथ खास कर पार्टियों में पति क्‍यों मुस्‍कराता रहता है । क्‍योंकि मेरी पत्‍नी 

किसी भी पार्टी में जाने से पहले । एक हिदायत मुझे अवश्‍य देती है - देखो जी ! पार्टी में मुँह लटका कर मत बैठना । 
खैर.. तो मैंने शादी के लिए लड़की तलाशना शरु कर दिया । मगर सास का खौफ अभी भी मेरे दिलो दिमाग में छाया हुआ था । अत: मैंने फैसला किया कि लड़की चाहे कैसी भी हो । चलेगा । लेकिन उसकी मॉं नहीं होनी चाहिए । अर्थात ऐसी लड़की जिसके पिता विधुर हों । बहुत खोजबीन की । परन्‍तु ऐसा कोई पुरुष न मिला । जो शाति पूर्वक बिना पत्‍नी के जीवन बिता रहा हो । अलबत्ता ऐसी कितनी ही औरतें मिली । जो बिना पति के मजे से जिंदगी बसर कर रही थी । तब मुझे पता चला कि - ससुर बिना सास का मिलना कठिन ही नहीं । बल्कि असंभव सा है । इधर मित्रों की पत्नियॉं मुझ पर दबाव डालने लगी कि ये क्‍या शर्त हुई । और अंत में मुझे नारी दबाव के आगे झुकना पड़ा । एवं उन्‍हीं लोंगों की पसंद

से मेरी शादी मेरी श्रीमती जी से हो गई । दुर्भाग्‍य से या सौभाग्‍य से कह लीजिए कि - मेरी पत्‍नी की एक मात्र संबंधी उनकी मॉं ही थीं । सुनकर थोड़ा सुकून मिला कि - चलो साला । साली । एवं ससुर से तो छुट्टी मिली । तो साहब ! धड़कते दिल से शादी के लिए घोड़ी पर बैठा । और अपनी भावी सास की कल्‍पना करता रहा । फरवरी का महीना । और मैं पसीने से लथपथ । सभी दोस्‍त नाच करते हुए लड़की वालों के दरवाजे पर पहँचे । पहुँचते ही मेरी सास से परिचय करावाया गया । लगा स्‍वपन हकीकत बन गई । वही चेहरा । मैंने मन ही मन कहा – भगवान ! अब तुम ही बचाना ।
जब विदाई की घड़ी आई । तो मेरी सासु जी ने कहा – बेटा जब भी तुम्‍हें मेरी जरूरत हो । तो पत्र लिख देना । मैं आ जाऊँगी । मैंने मन ही मन में कहा – वाह री बुढि़या । मुझे चारा डाल रही है । पर मैं कच्चा खिलाड़ी नहीं था । मैंने भी कहा - क्‍यों नहीं मॉं जी ! जरुर खत लिखूँगा । मेरी तो इच्‍छा थी कि आप भी मेरे साथ चलती । लेकिन क्‍या करुँ । जहॉं मैं रहता हूँ । व मकान एक कमरे का ही सेट है । अत: आपको बुला नहीं सकता । जैसे ही बड़े मकान की

व्‍यवस्‍था हो जाएगी । वैसे ही आपको बुला लूँगा । यह सुन कर उसका चेहरा थोड़ा लटक सा गया । परन्‍तु थोड़ा संभलते हुए बोली - कोई बात नहीं बेटा । मुझे बुढि़या को यात्रा करने में भी बहुत तकलीफ होती है । किसी तरह से हमेशा के लिए बला टली । मैं अपनी पत्‍नी के साथ मधुर जीवन व्‍यतीत करने लगा । इसी बीच मुझे पुत्र रत्‍न की प्राप्ति भी हुई । सास ने पत्र के द्वारा अपने आने की मंशा जाहिर की । ताकि नाती का मुंह देख सके । लेकिन मैंने तुरन्‍त सूचना भेज दी कि - जब भी फुरसत मिलेगी । हम लोग मिलने जरुर आऍंगे ।
एक दिन मैं अपने पूरे परिवार के साथ स्‍कूटर से बाजार जा रहा था कि - रास्‍ते में मेरे स्‍कूटर की टक्‍कर सामने से आ रही कार से हो गई । सपरिवार हम लोग अस्‍पताल कब पहुँच गए । पता ही नहीं चला । जब होश आया । तो अपनी सास को अपने सामने बैठा पाया । 

शादी के बाद दूसरी बार अपनी सास को देख रहा था । परन्‍तु आज सासू मॉं कल्‍पना वाली नहीं थी । उनके चहने पर ममता से ओत प्रोत भाव थे । मेरी ऑंखें उनसे मिलते ही । वे फफक कर रो पड़ी । और ममता भरा एक ही शब्‍द उनके मुँह से निकला - बेटा ! और मेरे सीने पर सर रखकर सुबकने लगी । मैं भी अपने ऑंसुओं को रोक न सका । उस स्‍नेहमयी सास की हकीकत से वाकिफ होने लगा । असल में मेरे मॉं बाप बचपन में ही गुजर गए थे । मन उस ममता भरी आवाज बेटा के स्‍वर लहरी में हिलोरों लेने लगा ।
हम लोग अस्‍पताल से अपने एक कमरे के सेट वाले मकान में आ गए । मेरी पत्‍नी को एक महीने का बेड रेस्‍ट था । एक महीना मेरी सास हम लोगों के साथ रहीं । उन्‍होंने हम लोगों को मानसिक शारीरिक एवं आर्थिक सभी तरह से मदद की । जब मैं ऑफिस जाने लायक हुआ । तो उन्‍होंने अपने घर जाने की तैयारी कर ली । मैंने उन्‍हें बहुत रोकने की कोशिश की । मगर उन्‍होंने मुस्‍कराते हुए कहा - बेटा ! यहॉं तुम्‍हारे पास मात्र एक ही कमरा है । यह सुन कर मैं पानी पानी हो गया ।
खैर.. मेरी सासू मॉं की मधुर याद हमेशा ही आती है । अब समस्‍या यह है कि स्‍वपन में सास से छुटकारा पा तो लिया । परन्‍तु उनकी उत्तराधिकारी अर्थात मेरी पत्‍नी ने मेरे स्‍वप्‍नों में प्रवेश कर लिया । अब मेरे सपने में मेरी पत्‍नी का चेहरा ही भयानक लगता है । पहले चीखें मार

कर उठ जाता था । परन्तु अब चीख हलक के अंदर ही रह जाती है । मैं बिस्‍तर पर छटपटाता रहता हूँ । ऑंखें तभी खुलती हैं । जब मेरी धर्म पत्‍नी साक्षात दुर्गा का रूप लिए हाथ में झाडू लेकर झकझोर कर बोलती है - क्‍या बंदरों की तरह बिस्‍तर पर पलटी मार रहे हो ?
तो अपने पढ़ा कि - किस तरह एक निर्मूल समस्‍या को लेकर मैं परेशान था । मगर जो वास्‍तविक समस्‍या थी । उसे - प्रेम । प्‍यार । विश्‍वास और पता नहीं । मन में क्‍या क्‍या सोच रहा था । मौका मिला । तो मैं अपनी पत्‍नी पुराण । जो हकीकत है । उसको बयान करुँगा । आज्ञा दें ।
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नेट पर ब्लागिंग की दुनियाँ में ब्लाग बारबार मिलते हैं । एक खोजो हजार मिलते हैं । कुछ बेकार मिलते हैं । तो कुछ खुशगवार मिलते हैं । ये दुनियाँ है लिखने वालों की । कोशिश इनकी है । भीङ से अलग दिखने वालों की । इसलिये नेट पर हर रोज कुछ नया दिखता है । और बंधुओ ! जो दिखता है । वही तो बिकता है । खैर..कविताओं के ब्लाग पढ पढकर मेरे अन्दर भी कवित्व प्रवाह उमङने लगा । कवियों का परिचय कराते कराते । अब मैं भी कविता लिखने लगा । तो चलिये आज मिलते हैं । कवि ह्रदय श्री राकेश कुमार जी से । इन्होंने भी अपने परिचय में बस इतना ही बताया है - मैं Works at Indian Railways में करता हूँ । और Attended जिला स्कूल मोतिहारी हूँ । और अभी Lives in KAPURTHALA हूँ । राकेश जी ने अपनी कविताओं में एक अतिरिक्त सुविधा दी है । यदि आप कविता का मूल भाव न समझ पायें । तो उन्होंने " पृष्ठभूमि " शीर्षक से उसके मर्म का खुलासा कर दिया । फ़िर भी आप न समझ पाओ । तब इससे ज्यादा भी कोई क्या कर सकता है ? और इनके ब्लाग का नाम है -  राकेश की रचनायें । ब्लाग पर जाने हेतु इसी नाम पर क्लिक कर दें ।



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तुम
तुमको इतना याद किये कि खुद को भूले हम । तेरी हँसी में मेरी ख़ुशी । आँसू में मेरे ग़म ।
दिया मुश्किलों में साथ ऐसा कि आँखें हो गई नम । तूने प्यार से नजरें झुकाई फासले हो गए कम ।
तेरी साँसों की सरगम ऐसी कि भूले खुद को हम । बाँहें ऐसे फैलाई कि दूरियाँ हो गई कम ।
तुमको इतना याद...                       
पृष्ठभूमि - ये जीवन की त्रासदी है कि पति या पत्नी एक ही घर के छत के नीचे रहते हुए अलग अलग सपनों के साथ जीते है । और ता उमृ एक दुसरे से असंतुष्ट रहते हुए तनहाई का जीवन जीते है ।
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ख्वाहिश
गुनगुनाने की चाह अपने घर में और । रोने को मुझको एक कोना न मिला ।
कई सपनें देखे अपने मन में और । सपनों को सच करने का आसरा न मिला ।

मातम से घिरा रहता हूँ अपने ही घर में और । महफ़िल ए रंग जमाते हुए मैं सबको मिला ।
अपनापन ढूंढ़ने लगा बेगानों में और । खुल कर हँस सकूँ ऐसा मौका न मिला ।
कोई मुझे अपने घर में जिन्दा कर दो । मुर्दा पड़ा हूँ मुझे सुपुर्द ए खाक न मिला ।
पृष्ठभूमि - लड़का एवं लड़की के परिवारों के बीच मधुर संबंधो के कारण वे एक दुसरे प्रति अपना  प्यार या भावनाएं प्रगट नहीं कर पाते । और अलग अलग जीवन  जीने को मजबूर होते हैं ।
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प्रेम गीत   
काश हम अजनबी तेरे लिए होते । इजहारे मोहब्बत सरेआम किये होते ।
काश तुम ..
जब से ये जाना मोहब्बत का नाम । मोहब्बत को दे दिया तेरा ही नाम ।
मोहब्बत का पैगाम कब का पेश कर दिए होते । काश तुम ...
मेरे होठ सिले के सिले रह गए । इजहारे मोहब्बत न हम कर सके ।
मोहब्बत है तुझसे हम तुमको बता देते । काश तुम ......

तेरा नाम लेके मै जीती रही । तेरा नाम लेके मैं मरती रही ।
तुम करते हो प्यार मुझसे । काश पहले  ही बता देते ।
काश हम दोनों एक दुसरे को बता देते । काश हम अजनबी तेरे लिए होते ।
इजहारे मोहब्बत सरेआम किये होते ।
पृष्ठभूमि - स्त्री पुरुष परस्पर पति पत्नी के संबंध में जीवन के बहुमूल्य समय व्यतीत करते है । पत्नी अपनी पुराने सभी संबंधो को भुलाकर । नए संबंधो को आत्मसात करने में शेष जीवन गुजार देती है । विडंबना  यह है कि उसके जीवन के अंतिम समय में केवल उसका पति ही उसके होने या खोने का अर्थ जान पाता है ।
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जीवन साथी
मेरे अंधेरे जीवन में । तुम हो सूरज की पहली किरण ।
जब भी गमों ने घेरा है । तुम ही लाई हो ख़ुशी के क्षण ।
मैं भटका हूँ पथ से कभी । तुमने दिखाया है मुझको दर्पण ।
जब भी माँगा साथ तुम्हारा । सदा दिया है मुझको समर्थन ।
मेरे जीवन में खुशियों की खातिर । तुमने किया है जीवन अर्पण ।
अब तुम नहीं हो नश्वर जगत में । कैसे आओगी खुश करने मेरा मन ।
मैं तो कठोर अभिमानी था । तेरा मर्म न जान  सका ।
मुझको तुम तो माफ ही करना । मैं तो हूँ अब तेरी शरण ।
पृष्ठभूमि - नायक अपनी नायिका को छोड़ कर किसी विशेष कार्य हेतु रेलगाड़ी से लम्बी यात्रा पर निकलता है । 

और विरह की आग में जल रहा है । इस जलन को कम करने लिए नायक नायिका को याद करते  हुए अपने मनोभाव को व्यक्त करता है ।
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सफ़र 
तुझे छोड़ कर मै । सफ़र कर रहा हूँ । मगर मेरे साथ । सदा चल रही है ।
सुबह मै चला था । तू मेरे संग थी । तेरी यादों में खोया । दिन भर चला हूँ ।
शाम हो रही है । सूरज ढल चुका है । मगर तू मेरे संग । चली जा रही है ।
तेरे ख्यालों में । जिए जा रहा हूँ । कभी हँस रहा हूँ । कभी मुस्करांऊँ ।
मुझे देख कर । लोग कर रहे इशारे । मैं हो गया दीवाना । ये समझा रहे हैं ।
चाँद आ गया । मगर तू वहीं है । चाँद में भी बस । तुम्ही नजर आ रही हो ।
तुझे भूलने की । जतन मैंने की है । सम्पूर्ण क्षितिज पर । तू छा गई है ।
आँखें मूंदकर मैं । अब सोने लगा हूँ । तेरी याद और भी । गहरा गई है ।
अब मैं सो रहा हूँ । नींद आ गई है । सपनों  में । तुम्हारी याद आ रही है ।
सुबह हो गई है । मैं जग गया हूँ । चादर के सलवटों पे । तुझे ढूंढ़ रहा हूँ ।

अभी तू कहीं है । मगर मेरे दिल में । मेरे साथ तू भी । सफ़र कर रही है ।
तेरी याद न जाएगी । तू कहीं भी चली जा । तेरी याद के बगैर । मैं जी न सकूँगा ।
तुझे भूलाने का अब । जतन  न करूँगा । तुझे छोड़ कर । अब सफ़र न करूँगा ।
पृष्ठभूमि - नायक अपनी नायिका को ग्रीष्म ऋतु में याद कर रहा  है । और विरह की आग में जल रहा है ।
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तपिश
तपिश दे रहा है । सूरज अभी भी । तू आ जाए तो । चैन आ जाए ।
तेरी राह में मैं हूँ । पलकें बिछाए । मगर तू न आए । जिया भी न जाए ।
कैसे जिऊँ अब । तेरे बगैर मैं । चाँद आ जाए तो । चैन आ जाए ।
शान ए फलक पे । तू मुस्कुराए । तू आ जाए तो । चैन आ जाए ।
जिए जा रहा हूँ  । पर तू तो न  आए । चाँद आ जाए तो । चैन आ जाए ।
डूबने की चाहत है । तेरी चांदनी में । तू आ जाए तो । चैन आ जाए ।
-  सभी जानकारी और रचनायें राकेश जी के ब्लाग से साभार । ब्लाग पर जाने हेतु क्लिक करें ।
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