Saturday, 23 May 2015

प्राकृतिक चीनी - स्टीविया

स्टीविया अर्थात आयुर्वेदिक चीनी - स्टीविया से आप सब अनजान तो होंगे नहीं । स्टीविया रिबाऊदियाना मूल रूप से पेरूग्वे का पौधा है । वहाँ ये बेहया की तरह अपने आप उग जाता है । यह पौधा सामान्यतः शक्कर से 30 गुना मीठा होता है । यही नहीं इसका एक्सट्रेक्ट चीनी से 300 गुना मीठा होता है । इसके गुणों को जानना तो जैसे आम मानव के लिए वरदान बन गया । आज के समय में जब मधुमेह की बीमारी 1 महामारी का रूप लेती जा रही है । और शुगर फ्री, ईकुअल, टोटल जैसी दवाएं हर दसवें घर में प्रयोग की जा रही हैं । तो सावधानियां नितांत आवश्यक हो गयी हैं । विश्व की मधुमेह आबादी में हर पांचवा व्यक्ति भारतीय देखा गया है । अब आप सभी चीनी छोड़ कर स्टीविया का प्रयोग शुरू कर दीजिये ।
स्टीविया की व्यवसायिक खेती जापान, पेरूग्वे, कोरिया, ताईवान, अमेरिका तथा एशिया में हो रही है । भारतवर्ष में पंजाब ,मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्णाटक, आंध्रप्रदेश, और थोड़ी मात्रा में उत्तर प्रदेश में भी हो रही है । आप भी चाहें । तो अपनी गृह वाटिका में इसके 5-10 पौधे लगा सकते हैं  । क्योंकि बुजुर्गों ने कहा है - सावधानी हमेशा अच्छी होती है । 
स्टीविया का पौधा 70 सेमी ऊंचा पौधा है । यह बहुवर्षीय झाडीनुमा पौधा है । जिसे पनपने के लिए 12 से 45 डिग्री तापमान चाहिए । 
स्टीविया के पत्ते का स्वाद मीठा होता है । इसके पत्तों में स्टीवियोसाइड, रीबाऊदिस, रीबाऊदिसाइदसी, डुल्कोसाइड, जैसे यौगिक पाये जाते हैं । जिनके कारण पत्तों में इंसुलिन बैलेंस करने की शक्ति आ जाती है । स्टीवियोसाइड इसके पत्तों में 5 से 20% तक पायी जाती है । 10% स्टीवियोसाइड वाले पत्ते अच्छे माने जाते हैं ।

इन पत्तों का उपयोग आसान सा है । इसके पत्तों को छाये में 3 दिन सुखा लीजिये । फ़िर उन्हें मिक्सर में महीन पीस लीजिये । एक कप काफी या चाय में इस चूर्ण की आधे से 1 ग्राम मात्रा काफी होगी । इस चूर्ण को आवश्यकता के अनुसार आप हर मीठी चीज को मीठा करने के लिए डाल सकते हैं । तैयार सामान पूरी तरह कैलोरी शून्य होगा । अब शुगर के रोगी जितनी चाहें मिठाई खाएं । वो भी धड़ल्ले से । यह पूरी तरह से हर्बल है । जबकि आज तक जो भी कैलोरी फ्री शुगर फ्री दवाएं प्रयोग हो रही थी । सबमें कोई न कोई साइड इफेक्ट का ख़तरा था । और स्टीविया हर तरह के साइड इफेक्ट से मुक्त है । इसके अलावा यह हाई ब्लड प्रेशर एवं ब्लड शुगर का भी नियमितीकरण करता है । यह चर्म रोगों में भी फायदेमंद है । यह एंटी वायरल तथा एंटी बैक्टीरियल का भी काम करता है ।
भारतीय भोजन का जरूरी हिस्सा मिठाई होती है । खीर, हलुआ, शरबत तो प्रतिदिन की एक डिश है । पर हम अब शारीरिक श्रम कम करते हैं । तो अनावश्यक कैलोरी के साथ मोटापा बढ़ने के डर से मीठा खा नहीं पाते । अब मन मसोसने की जरूरत नहीं । जी भर कर मीठा खाएं । पर गन्ने की चीनी नहीं - स्टीविया का प्रयोग करें ।
हमारे यहां आश्रम में स्टीविया के पौधे, ताजे पते,व स्टीविया के पत्तों का शोधित चूर्ण उपलब्ध है ।

वैध बाबा जी । गुरुकृपा आयुर्वेद आश्रम । नजदीक काहलो डेयरी डी ए वी स्कूल ।
रूपनगर पंजाब । 09417166756, 09915335687
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साभार - वैद्य धर्मपाल जी 

खरबूजा और न दूजा

कब्ज - कब्ज से पीड़ित रोगी को पक्का खरबूजा खाना चाहिए । इससे कब्ज नष्ट होती है ।
गुर्दे का रोग - खरबूजे के बीजों को छीलकर पीस लें । और पानी में मिलाकर हल्का सा गर्म करके पीएं । इसका प्रयोग कुछ दिनों तक करने से गुर्दों का रोग ठीक हो जाता है ।
जिगर का रोग - खरबूजा सेवन करने से जिगर की सूजन दूर होती है ।
सिर का दर्द - खरबूजे के बीजों को गाय के घी व मिश्री में मिला लें । और इसे बर्फी की तरह जमाकर सुबह शाम लगभग 50-50 ग्राम की मात्रा में सेवन करें । इसके बाद गाय के दूध में गाय का घी मिलाकर पीएं । इससे सिर दर्द ठीक होता है ।
पथरी - 1 चम्मच खरबूजे का छीला हुआ बीज, 15 दाने बड़ी इलायची तथा 2 चम्मच मिश्री के साथ पीस लें । और इसे 1 कप पानी में मिलाकर प्रतिदिन सुबह शाम पीएं । इससे गुर्दे की पथरी गल जाती है ।
मूत्रकृच्छ्र ( पेशाब करने में परेशानी ) - खरबूजा के बीजों को खाने से मूत्रकृच्छ रोग ठीक होता है ।
नाक बंद होना - जिनकी नाक अधिक गर्मियों में सूख जाती है । वो रोजाना 1 खरबूजा 3 माह तक खाएं । यह परीक्षित अनुभव है ।

Friday, 22 May 2015

अगर किसी को कैंसर हो

मेघा शाह ( 40 साल ) एक अकाउंटेंट हैं । और अमेरिका में रहती हैं । उन्हें उस समय झटका लगा । जब डाक्टर्स ने बताया कि - उन्हें कैंसर है । मेघा को लगा कि अचानक उनकी जिंदगी तहस नहस हो गई । इसके बाद कुछ ऐसा चमत्कार हुआ । जिसकी मेघा को उम्मीद नहीं थी । सात हफ्तों के अंदर ही मेघा के ट्यूमर का साइज छोटा होने लगा । अभी डाक्टर्स का कहना है कि उनका कैंसर धीरे धीरे ठीक हो रहा है । क्या आपको पता है कि किस जादुई दवा से मेघा का कैंसर ठीक हो रहा है ? वह जादुई दवा हैृ - हल्दी ।
जी हां, हल्दी में कैंसर को खत्म करने के चमत्कारिक गुण हैं । मेघा को 10 हफ्तों तक हर रोज 10 ग्राम हल्दी अपने खाने में इस्तेमाल करने की सलाह दी गई । इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी हेल्थ में बहुत जल्द सुधार आने लगा । यहां तक कि उन्हें कीमोथेरेपी की जरूरत भी नहीं पड़ी । इस
समय वह एक खुशहाल और हेल्दी जिंदगी जी रही हैं ।
इंडियन ओरिजिन के डॉ. भरत अग्रवाल ने कैंसर के इलाज के लिए एक Lessons to be learnt about curcumin from clinical trials नाम से एक स्टडी की है ।
मेघा शाह भी उस स्टडी का हिस्सा बनीं । डॉ. अग्रवाल ने अपने रिसर्च के नतीजों को गुजरात कैंसर एण्ड रिसर्च इंस्टीटयूट ( GCRI ) में पेश किया । उन्होंने बताया कि अमेरिका में रह रहे 100 लोगों पर यह स्टडी की गई ।
इलाज के दौरान उन्हें अपने खाने में हल्दी का ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह दी । डॉ. अग्रवाल ने कहा कि - रिसर्च में यह बात सामने आई कि हल्दी के इस्तेमाल से कैंसर के रोगियों को काफी फायदा पहुंचाया जा सकता है ।
source- http://navbharattimes.indiatimes.com/…/article…/45348056.cms
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कैंसर बहुत तेज़ी से बढ रहा है इस देश में । हर साल बीस लाख लोग कैंसर से मर रहे हैं । और हर साल नए Cases आ रहे हैं । और सभी डाक्टर्स हाथ पैर डाल चुके हैं ।
राजीव भाई की एक छोटी सी विनती है - याद रखना कि.. कैंसर के patient को कैंसर से death नहीं होती है । जो treatment दिया जाता है । उससे death होती है । 
माने कैंसर से जादा खतरनाक कैंसर का treatment है । Treatment कैसा है ? आप सभी जानते है । Chemotherapy दे दिया, Radiotherapy दे दिया, Cobalt-therapy दे दिया ।

इसमें क्या होता है कि शरीर की जो प्रतिरक्षक शक्ति है Resistance वो बिलकुल ख़त्म हो जाते हैं । जब Chemotherapy दिए जाते हैं । ये बोल कर कि हम कैंसर के सेल को मारना चाहते हैं । तो अच्छे सेल भी उसी के साथ मर जाते हैं । राजीव भाई के पास कोई भी रोगी जो आया Chemotherapy लेने के बाद । वे उनको बचा नहीं पाए । लेकिन इसका उल्टा भी रिकार्ड है । राजीव भाई के पास बिना Chemotherapy लिए हुए कोई भी रोगी आया Second & third Stage तक वो एक भी नही मर पाया अभी तक ।

मतलब क्या है Treatment लेने के बाद । जो खर्च आपने कर दिया वो तो गया ही । और रोगी भी आपके हाथ से गया । डॉक्टर आपको भूलभुलैया में रखता है । अभी 6 महीने में ठीक हो जायेगा 8 महीने में ठीक हो जायेगा । लेकिन अंत में वो जाता ही है । कभी हुआ नही है कि Chemotherapy लेने के बाद कोई बच पाया हो । आपके घर परिवार में अगर किसी को कैंसर हो जाये । तो ज्यादा खर्चा मत करिए । क्योंकि जो खर्च आप करेंगे । उससे मरीज का तो भला नहीं होगा । उसको इतना कष्ट होता है कि आप कल्पना नहीं कर सकते ।

उसको जो injections दिए जाते हैं । जो Tablets खिलाई जाती है । उसको जो Chemotherapy दी जाती है । उससे सारे बाल उड़ जाते है । भ्रू के बाल उड़ जाते है । चेहरा इतना डरावना लगता है कि पहचान में नहीं आता - ये अपना ही आदमी है । इतना कष्ट क्यों दे रहे हो उसको ? सिर्फ इसलिए कि आपको एक अहंकार है कि आपके पास बहुत पैसा है । तो Treatment करा के ही मानूंगा । होता ही नही है वो । और आप अपनी आस पड़ोस की बातें ज्यादा मत सुनिए । क्योंकि आजकल हमारे Relatives बहुत Emotionally Exploit करते हैं । घर में किसी को गंभीर बीमारी हो गयी । तो जो रिश्तेदार हैं । वो पहले आके कहते हैं - अरे All India नही ले जा रहे हो ? PGI नही ले जा रहे हो ? Tata Institute बम्बई नही ले जा रहे हो ? आप कहोगे नही ले जा रहा हूँ । मेरे घर में ही चिकित्सा .... अरे तुम बड़े कंजूस आदमी हो । बाप के लिए इतना भी नहीं कर सकते । माँ के लिए इतना नहीं कर सकते ।
ये बहुत खतरनाक लोग होते हैं । हो सकता है कई बार वो Innocently कहते हों । उनका intention ख़राब नही होता हो । लेकिन उनको Knowledge कुछ भी नही है । बिना Knowledge के वो suggestions पे suggestions देते जाते हैं  । और कई बार अच्छा खासा पड़ा लिखा आदमी फंसता है । उसी में .. रोगी को भी गंवाता है । पैसा भी जाता है ।

कैंसर के लिए क्या करे ? हमारे घर में कैंसर के लिए एक बहुत अच्छी दवा है । अब डॉक्टर ने मान लिया है । पहले तो वे मानते भी नहीं थे ।
एक ही दुनिया में दवा है Anti-Cancerous उसका नाम है - हल्दी । हल्दी कैंसर ठीक करने की ताकत रखता है । हल्दी में एक केमिकल है । उसका नाम है - कर्कुमिन ( Carcumin ) और ये ही कैंसर cells को मार सकता है । बाकि कोई केमिकल बना नहीं दुनिया में । और ये भी आदमी ने नहीं भगवान ने बनाया है । हल्दी जैसा ही कर्कुमिन और एक चीज में है । वो है - देशी गाय के मूत्र में । गोमूत्र माने देशी गाय के शरीर से निकला हुआ सीधा सीधा मूत्र । जिसे सूती के आट परत की कपड़ों से छान कर लिया गया हो । तो देशी गाय का मूत्र अगर आपको मिल जाये । और हल्दी आपके पास हो । तो आप कैंसर का इलाज आसानी से कर पायेंगे । अब देशी गाय का मूत्र आधा कप और आधा चम्मच हल्दी दोनों मिला के गरम करना । जिससे उबाल आ जाये । फिर उसको ठंडा कर लेना । Room Temperature में आने के बाद रोगी को चाय की तरह पिलाना है । चुस्किया ले ले के सिप कर कर । 
एक और आयुर्वेदिक दवा है - पुनर्नवा । जिसको अगर आधा चम्मच इसमें मिलायेंगे । तो और अच्छा result आयेगा । ये Complementary है । जो आयुर्वेद के दुकान में पाउडर या छोटे छोटे पीसेस में मिलती है ।

इस दवा में सिर्फ देशी गाय का मूत्र ही काम में आता है । जर्सी का मूत्र कुछ काम नहीं आता । और जो देशी गाय काले रंग का हो । उसका मूत्र सबसे अच्छा परिणाम देता है इन सबमें । इस दवा को ( देशी गाय की मूत्र, हल्दी, पुनर्नवा ) सही अनुपात में मिला के उबाल के ठंडा करके कांच की पात्र में स्टोर करके रखिये । पर बोतल को कभी फ्रिज में मत रखिये । धूप में मत रखिये । ये दवा कैंसर के सेकंड स्टेज में । और कभी कभी थर्ड स्टेज में भी, बहुत अच्छे परिणाम देते हैं । जब स्टेज थर्ड क्रोस करके फोर्थ में पहुंच गया । तब रिजल्ट में प्रॉब्लम आती है । और अगर अपने किसी रोगी को Chemotherapy वगैरह दे दिया । तो फिर इसका कोई असर नहीं आता । कितना भी पिला दो । कोई रिजल्ट नहीं आता । रोगी मरता ही है । आप अगर किसी रोगी को ये दवा दे रहे हैं । तो उसे पूछ लीजिये । जान लीजिये । कहीं Chemotherapy शुरु तो नहीं हो गयी ? अगर शुरु हो गयी है । तो आप उसमें हाथ मत डालिए । जैसा डॉक्टर करता है । करने दीजिये । आप भगवान से प्रार्थना कीजिये उसके लिए .. इतना ही करें । और अगर Chemotherapy स्टार्ट नही हुई है । और उसने कोई ऐलोपैथी treatment शुरु नहीं किया । तो आप देखेंगे इसके Miraculous रिजल्ट आते हैं । ये सारी दवाई काम करती है बॉडी के resistance पर । हमारी जो vitality है । उसको improve करता है । हल्दी को छोड़कर गोमूत्र और पुनर्नवा शरीर के vitality को improve करती है । और vitality improve होने के बाद कैंसर cells को control करते हैं ।

तो कैंसर के लिए आप अपने जीवन में इस तरह से काम कर सकते हैं । इसके अलावा भी बहुत सारी मेडिसिन्स हैं । जो थोड़ी complicated हैं । वो कोई बहुत अच्छा डॉक्टर या वैद्य उसको हैंडल करे । तभी होगा । आपसे अपने घर में नहीं होगा । इसमें एक सावधानी रखनी है कि गाय के मूत्र लेते समय वो गर्भवती नहीं होनी चाहिए । गाय की जो बछड़ी है । जो माँ नही बनी है । उसका मूत्र आप कभी भी use कर सकते हैं ।

ये तो बात हुई कैंसर के चिकित्सा की । पर जिन्दगी में कैंसर हो ही न । ये और भी अच्छा है जानना । तो जिन्दगी में आपको कभी कैंसर न हो । उसके लिए एक चीज याद रखिये कि हमेशा जो खाना खाए । उसमें डालडा तो नहीं है ? उसमे refined oil तो नहीं है ? ये देख लीजिये । दूसरा जो भी खाना खा रहे हैं । उसमे रसेदार हिस्सा ज्यादा होना चाहिए । जैसे छिलके वाली दालें, छिलके वाली सब्जियां खा रहे हैं । चावल भी छिलके वाली खा रहे हैं । तो बिलकुल निश्चिन्त रहिये कैंसर होने का कोई चान्स नहीं है ।
और कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से दो तीन कारण हैं । एक तो कारण है - तम्बाकू । दूसरा है - बीड़ी और सिगरेट और गुटका । ये चार चीजों को तो कभी भी हाथ मत लगाईए । क्योंकि कैंसर के maximum cases इन्ही के कारण है पुरे देश में ।
कैंसर के बारे में सारी दुनिया एक ही बात कहती है । चाहे वो डॉक्टर हो experts हो Scientist हो कि इससे बचाव ही इसका उपाय है ।

महिलाओं को आजकल बहुत कैंसर है uterus में गर्भाशय में, स्तनों में । और ये काफी तेजी से बढ रहा है .. Tumour होता है । फिर कैंसर में convert हो जाता है । तो माताओं को बहनों को क्या करना चाहिए । जिससे जिन्दगी में कभी Tumour न आये ? आपके लिए सबसे अच्छा prevention है कि जैसे ही आपको आपके शरीर के किसी भी हिस्से में unwanted growth ( रसोली, गांठ ) का पता चले । तो जल्द ही आप सावधान हो जाईये । हालांकि सभी गांठ और सभी रसोली कैंसर नहीं होती है 2-3% ही कैंसर में convert होती है । लेकिन आपको सावधान होना तो पड़ेगा । माताओं को अगर कहीं भी गांठ या रसोली हो गयी । जो non-cancerous है । तो जल्दी से जल्दी इसे गलाना । और घोल देने का दुनिया में सबसे अच्छी दवा है - चूना । 
चूना वही जो पान में खाया जाता है । जो पुताई में इस्तेमाल होता है । पान वाले की दुकान से चूना ले आइये । उस चूने को कनक के दाने के बराबर रोज खाइये । इसको खाने का तरीका है - पानी में घोल के पानी पी लीजिये । दही में घोल के दही पी लीजिये । लस्सी में घोल के लस्सी पी लीजिये । दाल में मिला के दाल खा लीजिये । सब्जी में डाल के सब्जी खा लीजिये । पर ध्यान रहे पथरी के रोगी के लिए चूना वर्जित है ।
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अगर किसी को कैंसर हो । तो उसकी जो भी दवाएं कैंसर की चल रही हैं । चलने दें । और वह साथ में शीशम के पेड के पत्तों का जूस भी दस से पंद्रह दिनों तक लें । और उसके बाद शीशम के पत्ते को चबाना हर रोज शुरू करें । देखते देखते ही आपको कैंसर के मरीज के अंदर शानदार बदलाव आने दिखने लगेगें । और यह बीमारी खत्म हो जाती है । 

घुटनों के दर्द के 5 उपाय

घुटनों के दर्द के आसान घरेलू उपाय  KNEE PAIN HOME REMEDIES 
घुटनों का दर्द बहुत ही पीड़ादायक होता है । यह चलने फिरने तक में असमर्थ कर देता है । अधिक वजन या वृद्धावस्था में दर्द और भी तकलीफदेह होता है । कुछ आसान घरेलू उपायों से दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है ।
यदि आप निम्नलिखित कारणों से घुटनों के दर्द से पीड़ित है -
घुटनों की माँसपेशियों में खून का दौरा सही नहीं होना । घुटनों की माँसपेशियों में खिंचाव या तनाव होना । माँसपेशियों में किसी भी तरह की चोट का प्रभाव । वृद्धावस्था ।
 ये 5 घरेलू उपाय आपको घुटनों के दर्द से छुटकारा दिला सकते हैं ।
उपाय 1 - 1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर, 1 छोटा चम्मच पिसी चीनी, या बूरा या शहद, 1 चुटकी चूना ( जो पान में लगाकर खाया जाता है ) आवश्यकतानुसार पानी, इन सभी को अच्छी तरह मिला लें । लाल रंग का गाढ़ा पेस्ट बन जाएगा ।
प्रयोग - सोने से पहले यह पेस्ट अपने घुटनों पे लगायें । सारी रात घुटनों पे लगा रहने दीजिये । सुबह साधारण पानी से धो लीजिये । कुछ दिनों तक प्रतिदिन इसका इस्तेमाल करने से सूजन, खिंचाव, चोट आदि के कारण होने वाला घुटनों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाएगा ।

उपाय 2 - 1 छोटा चम्मच सोंठ का पाउडर लीजिये । और इसमें थोडा सरसों का तेल मिलाईए । इसे अच्छी तरह मिलाकर गाड़ा पेस्ट बना लीजिये । इसे अपने घुटनों पर मलिए । इसका प्रयोग आप दिन या रात कभी भी कर सकते हैं । कुछ घंटों बाद इसे धो लीजिये । यह प्रयोग करने से आपको घुटनों के दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलेगा ।

उपाय 3 - 4-5 बादाम  5-6 साबुत काली मिर्च 10 मुनक्का 6-7 अखरोट
प्रयोग - इन सभी चीज़ों को एक साथ मिलाकर खाएं । और साथ में गर्म दूध पीयें । कुछ दिन तक यह प्रयोग रोजाना करने से आपको घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा ।

उपाय 4 - खजूर विटामिन A B C आयरन व फोस्फोरस का 1 अच्छा प्राकृतिक स्रोत है । इसलिए खजूर घुटनों के दर्द सहित सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द के लिए बहुत असरकारक है ।
प्रयोग - 1 कप पानी में 7-8 खजूर रात भर भिगोयें । सुबह खाली पेट ये खजूर खाएं । और जिस पानी में खजूर भिगोये थे । वो पानी भी पीयें । ऐसा करने से घुटनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं । और घुटनों के दर्द में बहुत लाभ मिलता है ।

उपाय 5 - नारियल भी घुटनों के दर्द के लिए बहुत अच्छी औषधि है । रोजाना सूखा नारियल खाएं । नारियल का दूध पीयें । घुटनों पर दिन में 2 बार नारियल के तेल की मालिश करें । इससे घुटनों के दर्द में अदभुत लाभ होता है ।

कब्ज रोग - कारण निवारण

कब्ज CONSTIPATION का स्थायी इलाज । पुरानी कब्ज से हमेशा के लिये छुटकारा । 
( पढ़िए पढ़ाईये । शेयर कीजिये सबको बताईये । लाभ उठाईये )
कब्ज । मलावरोध । मलबन्ध । कोष्ठबद्धता और कांसटीपेशन इत्यादि नामों से जानी जाने वाली यह बीमारी आमाशय की स्वाभाविक परिवर्तन की वह अवस्था है । जिसमें मल निष्कासन की मात्रा कम हो जाती है । या मलक्रिया में कठिनाई होती है । मल कड़ा हो जाता है । उसकी आवृति घट जाती है । मल निष्कासन के समय बल का प्रयोग करना पड़ता है । पेट में गैस बनती है । मल विसर्जन कर्म या रिफ्लेक्स 24 घण्टे या 48 घण्टों में नियमित रुप से एक बार न हो । तो उसे मलावरोध कहा जाता है । सामान्य आवृति और आमाशय की गति व्यक्ति विशेष पर निर्भर करती है । एक सप्ताह में 3 से 12 बार मल निष्कासन की प्रक्रिया सामान्य मानी जाती है ।

कब्ज आज के समय का आम रोग है । यह रोग व्यक्ति के खानपान में असावधानी रखने का ही परिणाम है । अधिक मिर्च मसाले वाला भोजन करना । कब्ज बनाने वाले पदार्थों का सेवन करना । भोजन के बाद अधिक देर तक बैठना । तेल चिकनाई वाले पदार्थों का अधिक सेवन करना आदि । शारीरिक श्रम न करने से मल का त्याग अल्प मात्रा में तथा अनियमित होता है । कभी कभी अत्यधिक कुंथन करने अथवा घण्टों शौच के लिए बैठने पर थोड़ा बहुत बाहर आता है । किसी किसी को तो कई कई दिनों तक मल विसर्जन ही नहीं होता ।

कब्ज होने की असली जड़ भोजन का ठीक प्रकार से न पचना है । यदि पेट रोगों का घर होता है । तो आंत विषैले तत्वों की उत्पत्ति का स्थान होता है । यह बहुत से रोगों को जन्म देता है । जिनमें कब्ज प्रमुख है । कब्ज में अधिक मात्रा में मल का बड़ी आंत में जमा हो जाना । कब्ज के कारण अवरोही आंतों में तरल पदार्थो के अवशोषण में अधिक समय लगने के कारण उनमे शुष्क ( ठंडा ) व कठोर मल अधिक एकत्रित होने लगता है । कब्ज उत्पन्न होने का एक आम कारण है - जीवन में मल त्याग की साधारण क्रिया का रुकना ।

कब्ज पाचनशक्ति के कार्य में किसी बाधा उत्पन्न होने के कारण होता है । इसके होने पर शारीरिक व्यवस्था बिगड़ जाती है । जिसके कारण पेट के कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं । इस रोग के कारण शरीर में कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है । शरीर के अन्दर ज़हर भी बन जाता है । जिसके कारण शरीर में अनेक बीमारी पैदा हो सकती है । जैसे - मुंह में घाव । छाले । अफारा । थकान । उदरशूल या पेट मे दर्द । गैस बनना । सिर में दर्द । हाथ पैरों में दर्द । अपच तथा बवासीर आदि । कब्ज बनने पर शौच खुलकर नहीं आती । जिससे पेट में दर्द होता रहता है ।

यदि कब्ज का इलाज जल्दी से न कराया जाए । तो यह फैलकर अन्य रोग उत्पन्न करने का कारण बन सकता है । जब कब्ज काफ़ी बिगड़ जाता है । तो मनुष्य के मलद्वार पर दरारें तक पड़ जाती हैं । और घाव बन जाते हैं । रोग का इलाज जल्दी नहीं कराया गया । तो यह रोग आगे चल कर बवासीर, मधुमेह तथा मिर्गी जैसे रोग को जन्म दे सकता हैं ।

कभी कभी छोटे बच्चे को होने वाले मल में गेंद जैसे गोल गोल तथा छोटे छोटे ढेले होते हैं । इस अवस्था को संस्थम्भी कब्ज कहते हैं । बच्चों को इस अवस्था में बहुत तेज दर्द होता है । जिसके कारण वह मल को रोक लेते हैं । और उन्हें कब्ज की शिकायत हो जाती है । किसी नवजात शिशु को शायद ही कभी कब्ज होती है । परन्तु उसके विकास के पहले वर्ष में उसे मल त्याग क्रिया सिखाई जाती है । जिससे वह मल त्याग क्रिया को प्रतिदिन होने वाली क्रिया के रूप में मानने लगता है ।

रोग का लक्षण - रोगी को शौच साफ़ नहीं होता । मल सूखा और कम मात्रा में निकलता है । मल कुंथन करने या घण्टों बैठे रहने पर निकलता है ।
कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को रोजाना मल त्याग नहीं होता है । कब्ज रोग से पीड़ित रोगी जब मल त्याग करता है । तो उसे बहुत अधिक परेशानी होती है । कभी कभी मल में गांठे बनने लगती हैं । मल त्याग के बाद उसे थोड़ा हल्कापन महसूस होता है ।
रोगी के पेट में गैस अधिक बनती है । पाद में बहुत तेज बदबू आती है । रोगी की जीभ सफेद तथा मटमैली हो जाती है । जीभ मलावृत रहती है । मुँह का स्वाद ख़राब हो जाता है । मुँह से दुर्गन्ध आती है । आंखों के नीचे कालापन हो जाता है । तथा जी मिचलाता रहता है । भूख मर जाती है । पेट भारी रहता है । मीठा मीठा दर्द बना रहता है । शरीर तथा सिर भारी रहता है ।
सिर तथा कमर में दर्द रहता है । शरीर में आलस्य एवं सुस्ती । चिड़चिड़ापन तथा मानसिक तनाव सम्बन्धी लक्षण भी मिलते हैं । बहुत दिनों तक मलावरोध की शिकायत रहने से रोगी को बवासीर इत्यादि रोग भी हो जाता हैं ।
कब्ज रोगी को कई प्रकार के और भी रोग हो जाते हैं । जैसे - पेट में सूजन हो जाना । मुंहासे निकलना । मुंह के छाले । अम्लता । गठिया । आंखों का मोतियाबिन्द तथा उच्च रक्तचाप आदि ।
इन लक्षणों के अतिरिक्त मलावरोध के सम्बन्ध में कुछ प्राचीन बातें भी प्रचलन में है । जैसे मस्तिष्क तथा नाड़ी मण्डल में अवसाद रहता है । मानसिक तथा शारिरिक कार्य शक्ति घट जाती है । अर्थात उसमें स्वाभाविक स्फूर्ति नहीं रहती है । रक्त पर इसका दुष्प्रभाव होने से रक्त दाब बढ जाता है । पाण्डुता नामक रोग होने से शरीर का रंग फीका पड़ जाता है । आंतों में गैस बनने से रोगी को अनिद्रा की भी शिकायत हो जाती है । आंतों में अधिक समय तक मल रुका रहने से अर्श रोग हो जाता है ।
यदि कोष्ठबद्धता किसी अन्य रोग विशेष के कारण नहीं है । तो जीवन शैली में थोड़ा सा परिवर्तन करके बचाव की पद्धति अपनाई जा सकती है । इसके विपरीत यदि मलावरोध का कारण कोई अन्य बीमारी है । तो सर्वप्रथम उस मूल बीमारी का उपचार कराना चाहिए ।

कारण
खानपान में असावधानी - कब्ज व्यक्तियों में ग़लत खानपान के कारण होता है । भोजन में ऐसे पदार्थों का प्रयोग करना, जिन्हें पाचन तंत्र आसानी से नहीं पचा पाता । जिससे आंत से मल पूर्ण रूप से साफ़ नहीं होता । और अन्दर ही सङने लगता है । मिर्च मसालेदार तथा गरिष्ठ भोजन करने से भी कब्ज बनता है । अधिकतर व्यक्तियों में कब्ज के ऐसे लक्षण होते हैं । जिसमें आंतों की अपने आप क्रियाशीलता तथा कब्ज के रचनात्मक असामान्यताओं की कमियों को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता । वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिदिन भोजन में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थो की जांच से पता चला है कि व्यक्ति अपने भोजन में रेशेदार व तरल पदार्थो का प्रयोग नहीं करते । जिससे मिलने वाली प्रोटीन व विटामिन लोगों को नहीं मिल पाता । और जिससे कब्ज उत्पन्न होता है । वैज्ञानिकों के अनुसार सभी व्यक्तियों को प्रतिदिन 10 से 12 ग्राम रेशेदार शाक सब्जियां तथा 1 से 2 गिलास तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए । साथ ही खाने के बाद या किसी भी समय मल त्याग करने का अनुभव हो । तो आलस्य के कारण उसे टालना नहीं चाहिए । मलत्याग की इच्छा होने पर मल त्याग जरुर करें ।

संरचनात्मक असामान्यताएं - आंतों में उत्पन्न घाव आदि के कारण मल त्याग के मार्ग में रुकावट उत्पन्न होती है । जिससे मल त्यागते समय ज़ोर लगाने से दर्द उत्पन्न होता है । दर्द के कारण मल का त्याग न करने से मल आंतों में सड़कर कब्ज पैदा करता है ।

व्यवस्थाग्रस्त बीमारी - आंत्रिक नली की तंत्रिकाओं की कुप्रणाली । पेशियों की ख़राबी । इंडोक्राइन विसंगतियों तथा विद्युत अपघटय की असामान्यतायें आदि उत्पन्न होकर आंतों में कब्ज बनाते हैं ।

मनुष्य की पाचन क्रिया मन्द पड़ना । कम मात्रा में मल आना । सुबह के समय में मल करने में आलस्य करना । कम मात्रा में भोजन करने से मल न बनना । भूख न लगना आदि कारणों से यह रोग मनुष्य को हो जाता है ।
मल तथा पेशाब के वेग को रोकने । व्यायाम तथा शारीरिक श्रम न करने के कारण । घर में बैठे रहना । शैय्या पर बहुत समय तक विश्राम करना । शरीर में ख़ून की कमी तथा अधिक सोने के कारण भी कब्ज रोग हो जाता है ।
मल त्याग की प्रेरणा की अवहेलना करने से मलाशय में मल के आ जाने पर भी मल त्याग के लिए नहीं जाना । इससे धीरे धीरे मालाशय में मल के प्रवेश से उत्पन्न होने वाली संवेदना या बेचैनी की प्रतीत उत्तरोत्तर हल्की पड़ती है । जिससे मलाशय में मल जमा होकर खुश्क हो जाता है ।
महिलाओं में गर्भावस्था के कारण । चिन्ता । भय । शोक इत्यादि उद्दीपनों के कारण । यकृत के रोग । मलाशय की वातिक निर्बलता ।
कम रेशायुक्त भोजन का सेवन करना । बासी भोजन का सेवन करने और समय पर भोजन न करने के कारण भी कब्ज रोग हो सकता है ।
तली हुई चीजों का अधिक सेवन करने । ग़लत तरीके से खानपान के कारण और मैदा तथा चोकर के बिना भोजन खाने के कारण कब्ज का रोग हो सकता है । उच्च प्रकार की रिफाइण्ड अथवा निम्न कोटि के फाइवर युक्त भोजन तथा द्रव पदार्थों के अधिक सेवन से ।
ठंडी चीजें जैसे - आइसक्रीम । पेस्ट्री । चाकलेट तथा ठंडे पेय पदार्थ खाने । कम पानी पीने के कारण और तरल पदार्थों का सेवन अधिक करने के कारण भी कब्ज रोग हो सकता है ।
दर्दनाशक दवाइयों का अधिक सेवन और अधिक धूम्रपान तथा नशीली दवाइयों का प्रयोग करने के कारण भी कब्ज रोग हो सकता है । रात्रि जागरण । तेज काफी । चाय और विभिन्न नशीले पदार्थों का सेवन करने से ।
विटामिन B की न्यूनता से आंत की प्रेरक शक्ति मन्द पड़ जाती है । जिससे मल बन्ध हो जाता है ।
थॉयरायड का कम बनना । कैल्सियम और पोटैशियम की कम मात्रा होना । कंपवाद ( पार्किंसन बीमारी ) होना ।
शरीर में मेद वृद्धि हो जाने पर अथवा पाण्डु रोग होने पर या किसी तेज ज्वर के बाद अथवा क्षय रोग में या मधुमेह में तथा वृद्घावस्था के कारण भी आँतों का निर्बल हो जाना स्वाभाविक है । जिससे रोगी को मल बन्ध रहता है । इसे एटानिक या कोलोनिक कांस्टीपेशन कहते हैं ।
पित्ताशय । एपेण्डिक्स । गुदा तथा गर्भाशय में शोथ होने पर बड़ी आंत में स्तम्भ होकर मलबन्ध हो जाता है । बवासीर के मस्सों के सूज जाने तथा प्रोस्टेट ग्रन्थि में शोथ होने पर भी बड़ी आंत में स्तम्भ होकर मल बन्ध हो जाता है । बड़ी आंत में घाव या चोट के कारण यानि बड़ी आंत में कैंसर होना पर बारबार शौच जाने की आदत पड़ जाती है । परन्तु मल त्याग अधूरा ही रहता है ।
पथरीली चट्टानों अथवा पथरीली मैदानी भूमि का जिसमें चूने का पानी रहता है । जल पीने से आंतो में कैल्शियम काबोर्नेट अधिक मात्रा में पहुँच जाता है । जिसके शोषक होने से भी मल बन्ध हो जाता है । इसके अतिरिक्त जिस स्थान का पानी भारी होता है । वहाँ भी लोगों में अधिकांशतः मलबन्ध की शिकायत बनी रहती है ।

कब्ज रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार - रोग का उपचार करने के लिए कभी भी दस्त लाने वाली औषधि का सेवन नहीं करना चाहिए । बल्कि रोग होने के कारणों को दूर करना चाहिए । और फिर प्राकृतिक चिकित्सा से इसका उपचार कराना चाहिए ।

कब्ज से बचने के लिए जब व्यक्ति को भूख लगे । तभी खाना खाना चाहिए । रोग को ठीक करने के लिए चोकर सहित आटे की रोटी तथा हरी पत्तेदार सब्जियां चबा चबाकर खानी चाहिए । रेशे वाली ( उच्च सेलूलोज ) जैसे भूसी । फल । शाक इत्यादि का नियमित प्रयोग करें । प्रतिदिन कम से कम आठ दस गिलास पानी पियें । अधिक से अधिक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए । अंकुरित अन्न का अधिक सेवन करने से रोगी व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है । गेहूं का रस अधिक मात्रा में पीने से कब्ज से पीड़ित रोगी का रोग बहुत जल्दी ठीक हो जाता है । कब्ज न बनने देने के लिए भोजन को अच्छी तरह से चबाकर खाएं । तथा ऐसा भोजन करें । जिसे पचाने में आसानी हो । रोगी व्यक्ति को मैदा । बेसन । तली भुनी तथा मिर्च मसालेदार चीजों आदि का सेवन नहीं करना चाहिए । कोष्ठबद्धता के रोगी को कम चिकनाई वाले आहार जैसे गाय का दूध । पनीर । सूखा फुल्का लेना चाहिए ।

रोगी व्यक्ति को अधिक से अधिक फलों का सेवन करना चाहिए । ये फल इस प्रकार है - पपीता । संतरा । मौसम्मी । खजूर । नारियल । अमरूद । अंगूर । सेब । खीरा । गाजर । चुकन्दर । बेल । अखरोट । अंजीर आदि । नींबू पानी । नारियल पानी । फल तथा सब्जियों का रस पीने से कब्ज से पीड़ित रोगी को बहुत फ़ायदा मिलता है । कच्चे पालक का रस प्रतिदिन सुबह तथा शाम पीने से कब्ज रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है । नींबू का रस गर्म पानी में मिलाकर रात के समय पीने से शौच साफ़ आती है । भोजन में दाल की अपेक्षा सब्जी । बथुआ । पालक आदि शाक का अधिक से अधिक सेवन करना चाहिए । उबली हुई गाजर तथा पके हुए अमरुद का सेवन सर्वोत्तम होता है ।

रोगी व्यक्ति को रात के समय में 25 ग्राम किशमिश को पानी में भिगोने के लिए रख देना चाहिए । रोजाना सुबह के समय इस किशमिश को खाने से पुराने से पुराना कब्ज रोग ठीक हो जाता है । कब्ज से पीड़ित रोगी को सुबह तथा शाम 10-12 मुनक्का खाने से बहुत लाभ होता है ।
कब्ज के रोग को ठीक करने के लिए त्रिफला चूर्ण को प्रतिदिन सेवन करना चाहिए ।
शौच लगने पर शौच न जाने अथवा शौच के वेग को रोकने से भी कब्ज बनती है । अधिक काम करने तथा मानसिक थकान के कारण भी कब्ज बनता है ।
ऐसे रोगी जिनका मेदा बहुत सख्त होता है । उन्हें शौच बहुत कठिनाई से आता है । उन्हें रात्रि में एक बड़ा गिलास गर्म दूध में 50-60 ग्राम देशी गुड़ मिलाकार पी लेने से चमत्कारी लाभ होता है । यह कोष्ठबद्ध रोगी के लिए लिक्विड थेरापी का कार्य करता है ।
कब्ज का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर 20 से 25 मिनट तक मिट्टी की या कपड़े की पट्टी करनी चाहिए । यह क्रिया प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है । इसके बाद रोगी व्यक्ति को कटिस्नान करना चाहिए । तथा एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए ।

कब्ज दूर करने के लिए सुबह सूर्य निकलने से पहले उठकर खुली हवा में प्रतिदिन टहलना चाहिए । इससे शरीर स्फूर्तिदायक और तरोताजा रहता है । और कब्ज आदि से भी बचाता है ।
कब्ज को दूर करने के लिए रात को सोते समय एक बर्तन में पानी रख दें । और सुबह सूर्य निकलने से पहले उठकर उस पानी को 2-4 गिलास पी लें । फिर टहलने के बाद शौच जाने से शौच खुलकर आती है । और कब्ज दूर होता है । कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में तांबे के बर्तन में पानी को रखकर सुबह के समय में पीने से शौच खुलकर आती है । और कब्ज नहीं बनती है । आंतों में खुश्की न हो । इसके लिए रोगी को आहार के अतिरिक्त 3-4 लीटर जल प्रतिदिन लेना चाहिए ।
कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को शाम के समय में हरे रंग की बोतल का सूर्यतप्त पानी पीना चाहिए । इसके बाद ईसबगोल की भूसी ली जा सकती है । लेकिन इसमें कोई खाद्य पदार्थ नहीं होना चाहिए ।
कोष्ठबद्धता के रोगी को दोनों समय नियमित रुप से मल त्याग के लिए जाना चाहिए । मल त्याग के पूर्व एक प्याला चाय या दूध लेने से सुविधा होगी । मल त्याग का समय कभी बदलना नहीं चाहिए । शीर्षासन या सर्वांगासन करने से पेल्विक कोलन में हरकत होकर मल त्याग की संवेदना होती है । प्रातःकाल पेट तथा मूलाधार की मांसपेशियों का गति प्रदान करने वाली व्यायाम करने चाहिए ।

कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को भोजन करने के बाद लगभग 5 मिनट तक व्रजासन करना चाहिए । यदि सुबह के समय में उठते ही व्रजासन करें । तो शौच जल्दी आ जाती है ।

कब्ज रोग को ठीक करने के लिए पानी पीकर कई प्रकार के आसन करने से कब्ज रोग ठीक हो जाता हैं - सर्पासन । कटि-चक्रासन । उर्ध्वहस्तोत्तोनासन । उदराकर्षासन तथा पादहस्तासन आदि ।

यदि किसी व्यक्ति को बहुत समय से कब्ज हो । तो उसे सुबह तथा शाम को कटिस्नान करना चाहिए और सोते समय पेट पर गर्म सिंकाई करनी चाहिए । और प्रतिदिन कम से कम 6 गिलास पानी पीना चाहिए ।

कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच आंवले की चटनी गुनगुने दूध में मिलाकर लेने तथा रात को सोते समय एक गिलास गुनगुना पानी पीने से बहुत अधिक लाभ मिलता है ।

कब्ज रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सुबह के समय में 2 सेब दांतों से काटकर छिलके समेत चबा चबाकर खाना चाहिए । इससे रोगी का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है ।

सप्ताह में 1 बार गर्म दूध में 1 चम्मच एरण्डी का तेल मिलाकर पीने से कब्ज का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है ।

कब्ज दूर करने की चिकित्सा - कब्ज को दूर करने के लिए विभिन्न नियमों का पालन करना चाहिए । तथा कब्ज को दूर करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा चिकित्सा करनी चाहिए । कब्ज को दूर करने के लिए व्यक्ति को सबसे पहले ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । इसके लिए प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोग करना चाहिए । इससे शारीरिक शक्ति बनी रहता है । और कब्ज जल्दी दूर होता है । साथ ही प्राकृतिक चिकित्सा का शरीर पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता ।

शास्त्रों में कहा गया है - मरणं बिन्दुपातेनजीवनं बिन्दु धारणत । अर्थात अधिक वीर्य स्खलन से शरीर की ऊर्जा शक्ति । तेज । ओजस धीरे धीरे समाप्त हो जाते हैं । इससे सभी स्नायुओं में कमज़ोरी और चिड़चिड़ापन उत्पन्न होता है । वीर्य स्खलन से पाचन क्रिया ख़राब होती है । और जठराग्नि मन्द पड़ जाती है । जिससे भोजन ठीक से पच नहीं पाता । और अपच हुआ पदार्थ मल के रूप में आतों में ही सड़ता रहता है । आतों में मल सड़ने से पेट में गैस पैदा होती है । और ख़ून दूषित होता है । अत: अपने आप पर संयम रखे बिना उपचार से कोई लाभ नहीं होता ।

एनिमा ( डूस ) क्रिया - विभिन्न कारणों से जब मल आंतों में जम जाता है । तो वह धीरे धीरे सूखकर कब्ज को पैदा करता है । अत: कब्ज को दूर करने के लिए आंतों को साफ़ करना आवश्यक होता है । आंतों को साफ़ करने के लिए जल चिकित्सा में बतायी गई विधि से ठंडे पानी का एनिमा लें । यदि कब्ज अधिक बन गई हो । तो रोगी को हल्के गर्म पानी का एनिमा दिया जा सकता है । यदि एनिमा गर्म पानी का दिया जा रहा हो । तो गर्म पानी का एनिमा देने के बाद ठंडे पानी का भी एनिमा दें । इससे कब्ज में जल्द लाभ मिलता है ।

पेड़ू पर ठंडे पानी की पट्टी - एनिमा क्रिया करने के बाद रोगी को अपने पेडू पर ठंडे पानी में भिगोया तौलिया कम से कम 8 मिनट तक रखना चाहिए । जिसके फलस्वरूप कब्ज में लाभ मिलता है । और आंतों को शक्ति मिलती है ।

गीली मिट्टी की पुल्टिश - रोगी के पेड़ू पर नाभि के 4 अंगुली नीचे मिट्टी की 1 इंच मोटी लेप करने से कब्ज दूर होता है । इससे आंतें शक्तिशाली होती है । और कब्ज के कारण उत्पन्न होने वाले अन्य रोग अपने आप समाप्त हो जाते हैं ।

व्यायाम द्वारा चिकित्सा - कब्ज दूर करने के लिए व्यायाम करना भी लाभकारी होता है । व्यायाम से पेट की क्रिया सुधरती है । और कब्ज दूर होता है । व्यायाम के लिए पहले पीठ के बल लेट जाएं । और दोनों पैरों को उठाकर शरीर के समकोण तक लाकर धीरे धीरे पुन: नीचे लाएं । इस तरह प्रतिदिन व्यायाम करने से आंत और पेट की स्नायु क्रिया ठीक होती है । और कब्ज आदि रोग दूर होते हैं ।

सावधानी - ऊपर बताई गई सारी चिकित्सा करने के साथ भोजन आदि पर ध्यान दें । अधिक तली हुई चीजें । मिर्च मसालेदार । अधिक गर्म भोजन न करें । भोजन में सावधानी रखने पर कब्ज रोग में लाभ जल्द मिलता है । कब्ज बनने पर कामवासना आदि पर नियंत्रण रखें ।

विशेष - कब्ज होने पर बताए गए नियमों को पालन करें । इन नियमों का पालन करने से कब्ज दूर हो जाती है । और इसके नियम बनाए रखने से कभी कब्ज नहीं होती है । यदि कब्ज तब भी उत्पन्न हो जाए । तो सावधानी पूर्वक प्राकृतिक चिकित्सा से कब्ज दूर करें ।
यौगिक क्रिया के द्वारा रोग की चिकित्सा - कब्ज को खत्म करने के लिए प्रतिदिन योग क्रिया का अभ्यास करना चाहिए । इससे किसी भी कारण से उत्पन्न होने वाली कब्ज समाप्त हो जाता है ।
षटक्रिया ( हठयोग क्रिया ) - अग्निसार क्रिया या नौली व वस्ति क्रिया का अभ्यास करें ।
पेट से सम्बंधित सभी कारणों तथा पेट की मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाने के लिए यौगिक क्रिया -
आसन - सूर्य नमस्कार । पवन मुक्तासन । त्रिकोणासन । हलासन । ताड़ासन । कटि चक्रासन । मत्स्यासन और अर्ध मत्स्यासन का अभ्यास करें
प्राणायाम - भस्त्रिका प्राणायाम के साथ कुंभक करें । अर्थात सांस को रोकने का अभ्यास करें ।
बंध - इस रोग में उडि्डया बन्ध व महाबंध का अभ्यास करें ।
समय - इस यौगिक क्रियाओ का अभ्यास प्रतिदिन 20 मिनट तक करें ।
प्रेक्षा - प्राणायाम व बंध के बाद दीर्घ श्वास प्रेक्षा का अभ्यास करें ।
अनुप्रेक्षा ( मन की भावना ) - सांस क्रिया करते हुए मन में विचार करें - मेरे अन्दर का कब्ज रोग दूर हो गया है । और मैं स्वस्थ हो रहा हूं । मेरा मन और मस्तिष्क शुद्ध हो गया है ।
 मन में ऐसी भावना करनी चाहिए ।
भोजन - इस रोग में हल्का तथा आसानी से पचने वाला भोजन करें । सलाद व सब्जियां रोजाना खायें । पर्याप्त मात्रा में पानी व फलों का रस पीना चाहिए । आधे से ज़्यादा चोकर मिलाकर गेहूँ तथा जौ की रोटी खाएं ।

परहेज - स्टार्च युक्त पदार्थो का सेवन न करें । तथा नमक कम मात्रा में उपयोग करें । ऐसे पदार्थ का सेवन न करें । जो कब्ज पैदा करें ।

विशेष - सभी योग क्रियाओं का अभ्यास सावधानी पूर्वक करें । षटक्रिया का अभ्यास योग चिकित्सक के कहे अनुसार जरूरत पड़ने पर करें । अन्य योग क्रियाओं का अभ्यास प्रतिदिन करें । अभ्यास हमेशा ख़ाली पेट ही करें ।

चुम्बक द्वारा उपचार - रोगी को दिन में 3 बार अपने पैर के तलुओं पर शक्तिशाली चुम्बकों को लगाना चाहिए । तथा दिन में 3 बार चुम्बकित जल दवाई की मात्रानुसार लेना चाहिए ।

अन्य उपाय - कब्ज से बचने के लिए छोटे बच्चों को सुबह के समय में मल करने की आदत डालनी चाहिए । इससे बच्चों में मल क्रिया का स्वस्थ विकास होता है । बड़े लोगों को भी रोजाना सुबह के समय में मल करने की आदत डालनी चाहिए । इस क्रिया में कभी भी लापरवाही नहीं करनी चाहिए । क्योंकि शरीर की अधिकतर बीमारी पेट की पाचन क्रिया की गड़बड़ी के कारण ही होती है । भोजन में गूदेदार पदार्थो का अधिक प्रयोग करना चाहिए । जल तथा अन्य तरल पदाथों का भी सेवन करना चाहिए । सुबह के समय में उठकर एक गिलास पानी पीना चाहिए । इससे मल साफ़ आता है । ज़्यादा समस्या आने पर चिकित्सक से सलाह लेना चाहिए ।
नोट - चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है.

साभार -  घरेलू नुस्खे सरल उपचार 

Wednesday, 20 May 2015

धन्यवाद..बाबा रामदेव जी

इस परिवर्तन की शुरूआत गत फ़रवरी में बङे सामान्य और सहज ढंग से ही हो गयी । जब फ़िनलेंड प्रवासी अविनाश जी ने बाबा रामदेव द्वारा स्थापित पंतजलि के उत्पाद ‘दिव्य पेय’ ( कीमत 35-100 gm ) का एक फ़ोटो अपनी फ़ेसबुक पर डाला । और इससे पूर्व वह अपने रूसी मित्र की बेटी द्वारा दन्त कांति टूथपेस्ट का भी फ़ोटो पोस्ट कर चुके थे ।
यद्यपि अविनाश जी मुझसे काफ़ी समय से फ़ेसबुक पर जुङे हैं । और स्वदेशी विचारधारा आन्दोलन, भृष्टाचार आदि मुद्दों पर उनके कुछ पेज हैं । पर मेरा अविनाश जी से कोई खास वास्ता नहीं था ।
तब बात यह हुयी कि मैं सर्दियों में बारबार चाय पीने की आदत पर ‘गुरुकुल कांगङी’ चाय जैसे या किसी हर्बल टी जैसे विकल्प की तलाश में था कि तभी संयोग से मुझे अविनाश की वह पोस्ट दिखी । और मैंने उसके बारे में कुछ जानकारी निकाल कर उसे स्थानीय पतंजलि स्टोर से मंगा लिया ।
यद्यपि उसके चाय जैसे ही निर्माण विधि के बारे में दिव्य पेय के पैकेट पर ही लिखा था । फ़िर भी पूर्णतया सुनिश्चित करने हेतु मैंने अविनाश जी से मैसेज द्वारा और भी पक्का कर लिया । क्योंकि वह इसे काफ़ी समय से प्रयोग करते रहे हैं । विधि वही थी - सिर्फ़ चाय पत्ती की जगह दिव्य पेय घटक डालना । और थोङी चाय पत्ती भी डाल लें । तो भी कोई हर्ज नहीं ।
फ़िर ऐसा हुआ कि मैंने हरिद्वार के हमारे मंडल के एक शिष्य से कुछ दिव्य पेय के पैकेट मंगाये । तो साथ में कुछ ‘दिव्यधारा’ भी मंगा लीं । जो शरीर में कैसे भी दर्द के साथ सर्दी खांसी जुकाम में इंहेलर की भांति प्रयोग की जा सकती है ।
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अब यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि - ऐसा नहीं, मुझे इस सबकी जानकारी नहीं थी । जानकारी थी । मगर उङती उङती मोटी सी जानकारी थी । और मैंने कभी व्यस्ततावश या आवश्यक न लगने पर ध्यान नहीं दिया था ।
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दिव्य पेय और दिव्यधारा को आजमाने के बाद मैंने अविनाश जी से कोई अच्छा लिंक मांगा । जिससे पतंजलि उत्पादों की प्रमाणिक और स्पष्ट जानकारी मिल सके । तब उन्होंने एक फ़ेसबुक पेज का ही लिंक दिया । और वह पेज इसी साइट का था । जो पतंजलि उत्पादों के आर्डर विक्रय आदि हेतु सबसे विश्वसनीय भारतीय साइट है ।
इस साइट पर जाकर मैंने सभी पतंजलि उत्पादों का विवरण मूल्य आदि बारीकी से निरीक्षण किया । तो जैसा कि मैंने ऊपर ही कहा, मुझे हैरानी हुयी । पतंजलि आयुर्वेदिक दवाईयों के साथ साथ तमाम घरेलू आवश्यकता वाले उत्पादों का भी निर्माण कर रही है । हैरानी की बात यह थी कि वे उत्पाद भारतीय बाजार में उपलब्ध 

उत्पादों के मूल्य वाले और कई उत्पाद उससे कम मूल्य पर थे । जबकि शुद्धता, गुणवत्ता और मिलावट रहित की गारंटी अलग से थी । यह सब पढकर नहीं । बल्कि इतने ही कम समय में लगभग दस हजार के विभिन्न उत्पादों को आजमाने के बाद कह रहा हूँ । जिनमें से मैंने तमाम इसी बेवसाइट से आनलाइन आर्डर द्वारा मंगवाये हैं ।
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अब जिस लिये मैंने यह लेख लिखा -
वैसे तो पतंजलि के स्टोर लगभग सभी प्रमुख शहरों स्थानों में हैं ही । परन्तु आज के जीवन में और ना जानकारी होने पर हम उस तरह से मनवांछित तरीके से खरीदारी नहीं कर पाते । जो आनलाइन शापिंग द्वारा हो जाती है । इसमें हम वस्तु का चित्र, मूल्य, उपयोग, मात्रा आदि आदि सब कुछ सहज देख पाते हैं ।
अब आपको यहाँ एक हल्का संकोच हो सकता है कि - शायद आर्डर करने पर, मूल्य के अतिरिक्त भेजने का कोई अतिरिक्त खर्चा आता हो ।
जी नहीं, यही इस साइट की सबसे बङी खासियत है । 499 से ऊपर यानी आप 500 का भी आर्डर करते हैं । तो free shiping यानी आपकी वांछित वस्तुयें आपकी डोर डिलीवरी तक कोई अतिरिक्त खर्च नहीं लगता ।
और यदि आप 999 से ऊपर यानी 1000 का भी आर्डर करते हैं । तो cash on delivery यानी पार्सल आपके हाथ में आने पर मूल्य दें । और इसमें भी वस्तु मूल्य के अतिरिक्त कोई अन्य पैसा नहीं लगता ।
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आर्डर करने के लिये इस साइट पर जाकर आपको रजिस्ट्रेशन करना होगा । इसके बाद आप वस्तु के नीचे लिखे buy पर क्लिक करें । वह वस्तु आपके कार्ट में जुङती जायेगी । इस तरह जब आप सभी वस्तुओं को कार्ट में पहुंचा देते हैं । तब my cart पर क्लिक करके उसे चैक कर सकते हैं । और यहीं पर क्वान्टिटी को भी बढा सकते हैं । इसके बाद साधारण से कार्ट के नीचे ही लिखे एक दो आप्शन और कम्पलीट करना होता है । और आपका आर्डर प्लांट हो जाता है ।
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सामान्यतया आर्डर के 6 से 10 दिन में डिलीवरी आ जाती है । तो मेरी सलाह है कि स्वदेशी विश्वसनीय और बेहतरीन गुणवत्ता वाले पतंजलि उत्पाद खरीद कर स्वयं को रोगमुक्त और समृद्ध बनायें । साथ में स्वदेशी कम्पनी की खरीद से देश को भी समृद्ध बनाने में अपना बहुमूल्य योगदान करें ।
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चेचक रोग और उपचार

चेचक मानव में पाया जाने वाला एक प्रमुख रोग है । इस रोग से अधिकांशत: छोटे बच्चे ग्रसित होते हैं । यह रोग जब किसी व्यक्ति को होता है । तब इसे ठीक होने में 10 से 15 दिन लग जाते हैं । किन्तु रोग के कारण चेहरे आदि पर जो दाग़ पड़ जाते हैं । उन्हें ठीक होने में लगभग 5 या 6 महीने का समय लग जाता है । यह रोग अधिकतर बसन्त ऋतु या फिर ग्रीष्मकाल में होता है । यदि इस रोग का उपचार जल्दी ही न किया जाए । तो रोग से पीड़ित व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है ।
लक्षण - इस रोग के हो जाने पर शरीर का तापमान बढ़ जाता है । बुखार 104 डिग्री फारेनहाइट तक हो जाता है । रोगी को बेचैनी होने लगती है । उसे बहुत ज़्यादा प्यास लगती है । और पूरे शरीर में दर्द होने लगता है । हृदय की धड़कन तेज हो जाती है । और साथ में जुकाम भी हो जाता है । 2-3 दिन के बाद बुखार तेज होने लगता है । शरीर पर लाल रंग के दाने निकलने लगते हैं । दानों में पानी जैसा मवाद पैदा हो जाता है । सात दिनों में दाने पकने लगते हैं । जो कि धीरे धीरे सूख जाते हैं । दानों पर खुरण्ट ( पपड़ी ) सी जम जाती है । कुछ दिनों के बाद खुरण्ट तो निकल जाती है । लेकिन उसके दाग़ रह जाते हैं ।
कारण - चेचक के रोग को घरेलू भाषा में ‘माता’ या ‘शीतला’ भी कहते हैं । यह रोग अक्सर उन बच्चों को होता है । जिनके शरीर में शुरू से ही गर्मी अधिक होती है । तथा उनकी उम्र 2 से 4 वर्ष तक की होती है । कभी कभी यह रोग औरतों और बड़ों में भी हो जाता है । इस रोग के फैलने का कारण वायरस ( जीवाणु ) है । इस रोग के जीवाणु थूक, मलमूत्र और नाखूनों आदि में पाये जाते हैं । सूक्ष्म छोटे छोटे जीवाणु हवा में घुल जाते हैं । और श्वसन के समय ये जीवाणु शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाते हैं । इस रोग को आयुर्वेद में ‘मसूरिका’ के नाम से जाना जाता है ।
सावधानियाँ - चेचक के रोग से ग्रस्त रोगी के घर वालों को खाना बनाते समय सब्जी आदि में छोंका नहीं लगाना चाहिए ।
दरवाज़े पर और रोगी के बिस्तर के चारो और नीम के पत्तों की टहनी लटका देनी चाहिए ।
ध्यान रखें कि बच्चा शरीर पर आए छालों या फोड़े को खरोंचे नहीं । वरना ये पूरे शरीर पर फैल सकते हैं । व दर्द भी हो सकता है । बच्चे के नाखून छोटे रखें । व फोड़ों को ढंके नहीं ।
रोगी के चारो तरफ साफ़ सफाई का विशेष ध्यान रखें ।
रोगी को जब भी नहलायें । उस पानी में नीम की पत्तियों को उबाले । 
आयुर्वेद में चेचक में नीम से ज़्यादा किसी पर भी भरोसा नहीं किया जाता । 
बच्चे को अन्य लोगों से दूर रखें ।
चेचक के रामबाण घरेलू उपाय - पीपल की 3 या 5 पत्तियां लें । पत्तियों की डंडी तोड़ दें । इन पत्तों को 1 गिलास पानी में उबालें । और एक चौथाई रहने पर इसको गुनगुना ही रोगी को पिलायें । ये प्रयोग 3 से 5 दिन तक हर रोज़ सुबह और शाम को करें । इससे चेचक, टाइफ़ायड और खसरा और आम बुखार में बेहद लाभ मिलता हैं ।
- तुलसी की 12-15 पत्तियों को 3 या 4 काली मिर्च के साथ पीसकर गुनगुने पानी के साथ दिन में 2 बार पिलायें ।
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साभार - एक फ़ेसबुक पोस्ट से ।

प्रचार या बिक्री षङयन्त्र ?

आईये समाज में फैले कुछ षडयन्त्रों के बारे में जाने कि अर्धसत्य और पूर्णसत्य है क्या ?
ये राय बदल भी सकती है ।

अर्धसत्य - फलां फलां तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता है ।
पूर्णसत्य -  किसी तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता । ये केवल यकृत में बनता है ।

अर्धसत्य - सोयाबीन में भरपूर प्रोटीन होता है ।
पूर्णसत्य - सोयाबीन सूअर का आहार है । मनुष्य के खाने लायक नहीं । भारत में अन्न की कमी नहीं है । इसे सूअर आसानी से पचा सकता है, मनुष्य नहीं । जिन देशों में 8-9 महीने ठण्ड रहती है । वहाँ सोयाबीन जैसे आहार चलते हैं ।

अर्धसत्य - घी पचने में भारी होता है ।
पूर्णसत्य - बुढ़ापे में मस्तिष्क आंतों और संधियों ( joints ) में रूखापन आने लगता है । इसलिए घी खाना बहुत जरुरी होता है । और भारत में घी का अर्थ देशी गाय के घी से है ।

अर्धसत्य - घी को खाने से मोटापा बढ़ता है ।
पूर्णसत्य - ( षङयंत्र प्रचार ) ताकि लोग घी खाना बंद कर दें । और अधिक से अधिक पशु मांस की मंडियों तक पहुंचे । जो व्यक्ति पहले पतला हो । और बाद में मोटा हो जाये । वह घी खाने से पतला हो जाता है ।

अर्धसत्य - घी ह्रदय के लिए हानिकारक है ।
पूर्णसत्य - देशी गाय का घी हृदय के लिए अमृत है । पंचगव्य में इसका स्थान है ।

अर्धसत्य - डेयरी उद्योग दुग्ध उद्योग है ।
पूर्णसत्य - डेयरी उद्योग मांस उद्योग है । यहाँ बछड़ों और बैलों को, कमजोर और बीमार गायों को और दूध देना बंद करने पर स्वस्थ गायों को कत्लखानों में भेज दिया जाता है । दूध डेयरी का गौण उत्पाद है ।

अर्धसत्य - आयोडाईज नमक से आयोडीन की कमी पूरी होती है ।
पूर्णसत्य - आयोडाईज नमक का कोई इतिहास नहीं है । ये पश्चिम का कंपनी षडयंत्र है । आयोडाईज नमक में आयोडीन नहीं । पोटेशियम आयोडेत होता है । जो भोजन पकाने पर गर्म करते समय उड़ जाता है । स्वदेशी जागरण मंच के विरोध के फलस्वरूप सन 2000 में भाजपा सरकार ने ये प्रतिबन्ध हटा लिया था । लेकिन कांग्रेस ने सत्ता में आते ही इसे फिर से लगा दिया । ताकि लूट तंत्र चलता रहे । और विदेशी कम्पनियाँ पनपती रहें ।

अर्धसत्य - शक्कर ( चीनी ) का कारखाना ।
पूर्णसत्य - शक्कर ( चीनी ) का कारखाना इस नाम की आड़ में चलने वाला शराब का कारखाना । शक्कर इसका गौण उत्पाद है ।

अर्धसत्य - शक्कर ( चीनी ) सफ़ेद जहर है ।
पूर्णसत्य - रासायनिक प्रक्रिया के कारण कारखानों में बनी सफ़ेद शक्कर ( चीनी ) जहर है । पम्परागत शक्कर एकदम सफ़ेद नहीं होती । थोडा हल्का भूरा रंग लिए होती है ।

अर्धसत्य - फ्रिज में आहार ताज़ा होता है ।
पूर्णसत्य - फ्रिज में आहार ताज़ा दिखता है । पर होता नहीं है । जब फ्रिज का अविष्कार नहीं हुआ था । तो इतनी देर रखे हुए खाने को बासी या सङा हुआ खाना कहते थे ।

अर्धसत्य - चाय से ताजगी आती है ।
पूर्णसत्य - गरम पानी से आती है ताजगी । चाय तो केवल नशा ( निकोटिन ) है ।

अर्धसत्य - एलोपैथी स्वास्थ्य विज्ञान है ।
पूर्णसत्य - एलोपैथी स्वास्थ्य विज्ञान नहीं । चिकित्सा विज्ञान है ।

अर्धसत्य - एलोपैथी विज्ञान ने बहुत तरक्की की है ।
पूर्णसत्य - दवाई कंपनियों ने बहुत तरक्की की है । एलोपैथी में मूल दवाईयां 480-520 के लगभग हैं । जबकि बाज़ार में 1 00 000 से अधिक दवाईयां बिक रही हैं ।

अर्धसत्य - बैक्टीरिया वायरस के कारण रोग होते हैं ।
पूर्णसत्य - शरीर में बैक्टीरिया वायरस के लायक वातावरण तैयार होने पर रोग होते हैं ।

अर्धसत्य - भारत में लोकतंत्र है । जनता के हितों का ध्यान रखने वाली जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है ।
पूर्णसत्य - भारत में लोकतंत्र नहीं कंपनी तन्त्र है । बहुत से सांसद, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारी कंपनियों के दलाल हैं । उनकी भी नौकरियां करते हैं । उनके अनुसार नीतियां बनाते हैं । वे जनहित में नहीं कंपनी हित में निर्णय लेते हैं । भोपाल गैस कांड से बड़ा उदहारण क्या हो सकता है । जहाँ एक अपराधी मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के आदेशानुसार फरार हो सका लोकतंत्र होता । तो उसे पकड के वापस लेट ना ।

अर्धसत्य - आज के युग में मार्केटिंग का बहुत विकास हो गया है ।
पूर्णसत्य - मार्केटिंग का नहीं ठगी का विकास हो गया है । माल गुणवत्ता के आधार पर नहीं विभिन्न प्रलोभनों व जुए के द्वारा बेचा जाता है । जैसे क्रीम गोरा बनती है भाई । कोई भैंस को गोरा बना के दिखाओ ।

अर्धसत्य - टीवी मनोरंजन के लिए घर घर तक पहुँचाया गया है ।
पूर्णसत्य - जब टीवी नहीं था । तब लोगों का जीवन देखो । और आज देखो । जो आज इंटरनेट पर बैठे सुलभता से जीवन जी रहे हैं । उन्हें अहसास नहीं होगा । कंपनियों का माल बिकवाने और परिवार व्यवस्था को तोड़ने, ईसाईवाद का प्रचार करने के लिए टीवी घर घर तक पहुँचाया जाता है ।

अर्धसत्य - टूथपेस्ट से दांत साफ होते हैं ।
पूर्णसत्य - टूथपेस्ट करने वाले यूरोप में हर 3 में से 1 के दांत ख़राब हैं । दंत मंजन करने से दांत साफ होते हैं । मंजन - मांजना । क्या बर्तन ब्रश से साफ होते हैं ?
मसूड़ों की मालिश करने से दांतों की जड़ें मजबूत भी होती हैं ।

अर्धसत्य - साबुन मैल साफ कर त्वचा की रक्षा करता है ।
पूर्णसत्य - साबुन में स्थित केमिकल ( कास्टिक सोडा, एस.एल.एस. ) और चर्बी त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं । और डाक्टर इसीलिए चर्म रोग होने पर साबुन लगाने से मना करते हैं । साबुन में गौ की चर्बी पाए जाने पर विरोध होने से पहले हिंदुस्तान लीवर हर साबुन में गाय की चर्बी का उपयोग करती थी ।
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साभार - कौशल किशोर जी

Tuesday, 19 May 2015

चाय पीना याने जीवन सर्वनाश करना

चाय के बारे में सबसे पहली बात ये कि चाय हमारे देश भारत का उत्पादन नहीं है । अंग्रेज जब भारत आए थे । तो अपने साथ चाय का पौधा लेकर आए थे । और भारत के कुछ ऐसे स्थान जो अंग्रेजों के लिए अनुकूल ( जहाँ ठंड बहुत होती है ) वहाँ पहाड़ियों में चाय के पौधे लगवाए । और उसमें से चाय होने लगी ।
तो अंग्रेज़ अपने साथ चाय लेकर आए । भारत में कभी चाय हुई नहीं । 1750 से पहले भारत में कहीं भी चाय का नामोनिशान नहीं था । अंग्रेज आए east india company लेकर तो उन्होंने चाय के बागान लगाए । और उन्होंने ये अपने लिए लगाए ।
क्यों लगाए ?
चाय एक medicine है । लेकिन सिर्फ उन लोगों के लिए । जिनका blood pressure low रहता है । और जिनका blood pressure normal और high रहता है । चाय उनके लिए जहर है ।
low blood pressure वालों के लिए चाय अमृत है । और जिनका high और normal रहता है । चाय उनके लिए जहर है ।
अब अंग्रेज़ों की एक समस्या है । वो आज भी है । और हजारों साल से है । सभी अंग्रेज़ों का BP low रहता है । सिर्फ अंग्रेज़ो का नहीं । अमरीकियों का भी, कैनेडियन लोगों का भी, फ्रेंच लोगों भी और जर्मन्स का भी, स्वीडिश का भी । इन सबका BP LOW रहता है ।
कारण क्या है ?
कारण ये है कि बहुत ठंडे इलाके में रहते हैं । बहुत ही अधिक ठंडे इलाके में । उनकी ठंड का तो हम अंदाजा नहीं लगा सकते । अंग्रेज और उनके आसपास के लोग जिन इलाको में रहते हैं । वहाँ साल के 6 से 8 महीने तो सूरज ही नहीं निकलता । और आप उनके तापमान का अनुमान लगाएंगे । तो -40 तो उनकी lowest range है । मतलब 0 से भी 40 डिग्री नीचे 30 डिग्री 20 डिग्री । ये तापमान उनके वहाँ सामान्य रूप से रहता है । क्योंकि सूर्य निकलता ही नहीं । 6 महीने धुंध ही धुंध रहती है आसमान में । ये इन अंग्रेज़ों की सबसे बड़ी तकलीफ है ।
ज्यादा ठंडे इलाके में जो भी रहेगा । उनका BP low हो जाएगा । आप भी करके देख सकते हैं । बर्फ की दो सिल्लियों को खड़ा कर बीच में लेट जायें । 2 से 3 मिनट में ही BP लो होना शुरू हो जाएगा । और 5 से 8 मिनट तक तो इतना low हो जाएगा । जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी । फिर आपको शायद समझ आए । ये अंग्रेज़ कैसे इतनी ठंड में रहते हैं । घरों के ऊपर बर्फ, सड़क पर बर्फ, गाड़िया बर्फ में धंस जाती हैं । बजट का बड़ा हिस्सा सरकारें बर्फ हटाने में प्रयोग करती हैं । तो वो लोग बहुत बर्फ में रहते हैं । ठंड बहुत है blood pressure बहुत low रहता है ।
अब तुरंत blood को stimulant चाहिए । मतलब ठंड से BP बहुत low हो गया । एकदम BP बढ़ाना है । तो चाय उसमें सबसे अच्छी है । और दूसरे नम्बर पर कॉफी । तो चाय उन सब लोगों के लिए बहुत अच्छी है । जो बहुत ही अधिक ठंडे इलाके में रहते हैं । अगर भारत में कश्मीर की बात करें । तो उन लोगों के लिए चाय, काफी अच्छी । क्योंकि ठंड बहुत ही अधिक है ।
लेकिन बाकी भारत के इलाके जहाँ तापमान सामान्य रहता है । और मुश्किल से साल के 15 से 20 दिन की ठंड है । वो भी तब जब कोहरा बहुत पड़ता है । हाथ पैर कांपने लगते हैं । तापमान 0 से 1 डिग्री के आसपास होता है । तब आपके यहाँ कुछ दिन ऐसे आते हैं । जब आप चाय पी लो । या काफी पी लो ।
लेकिन पूरे साल चाय पीना और every time is tea time ये बहुत खतरनाक है । और कुछ लोग तो कहते हैं - बिना चाय पीए तो सुबह toilet भी नहीं जा सकते । ये तो बहुत ही अधिक खतरनाक है ।
इसलिए उठते ही अगर चाय पीने की आपकी आदत है । तो इसको बदलिये ।
नहीं तो क्या होने वाला है सुनिए । अगर normal BP आपका है । और आप ऐसे ही चाय पीने की आदत जारी रखते हैं । तो धीरे धीरे BP high होना शुरू होगा । और ये high BP फिर आपको गोलियों तक लेकर जाएगा । तो डाक्टर कहेगा - BP low करने के लिए गोलियां खाओ । और ज़िंदगी भर चाय भी पियो । जिंदगी भर गोलियां भी खाओ । डाक्टर ये नहीं कहेगा - चाय छोड़ दो । वो कहेगा - जिंदगी भर गोलियां खाओ । क्योंकि गोलियां बिकेंगी । तो उसको भी कमीशन मिलता रहेगा ।
तो आप अब निर्णय ले लो । जिंदगी भर BP की गोलियां खाकर जिंदा रहना है । तो चाय पीते रहो । और अगर नहीं खानी है । तो चाय पहले छोड़ दो ।
एक जानकारी और -
आप जानते हैं । गर्म देश में रहने वाले लोगों का पेट पहले से ही अम्लीय ( acidic ) होता । और ठंडे देश में रहने वाले लोगों का पेट पहले से ही क्षारीय ( alkaline ) होता है । और गर्म देश में रहने वाले लोगों का पेट normal acidity से ऊपर होता है । और ठंड वाले लोगों का normal acidity से भी बहुत अधिक कम । मतलब उनके blood की acidity हम मापें । और अपने देश के लोगों की मापें । तो दोनों में काफी अंतर रहता है ।
अगर आप ph स्केल को जानते हैं । तो हमारा blood की acidity 7.4, 7.3, 7.2 और कभी कभी 6.8 के आसपास तक चला जाता है । लेकिन यूरोप और अमेरिका के लोगों का +8 और +8 से भी आगे तक रहता है ।
तो चाय पहले से ही acidic ( अम्लीय ) है । और उनके क्षारीय ( alkaline ) blood को थोड़ा अम्लीय करने में चाय कुछ मदद करती है । लेकिन हम लोगों का blood पहले से ही acidic है । और पेट भी acidic है । ऊपर हम चाय पी रहे हैं । तो जीवन का सर्वनाश कर रहे हैं । तो चाय हमारे रक्त ( blood ) में acidity को और ज्यादा बढ़ायेगी । और जैसा आपने राजीव भाई की पहली post में पढ़ा होगा ( heart attack का आयुर्वेदिक इलाज में ) 

आयुर्वेद के अनुसार रक्त ( blood ) में जब अम्लता ( acidity ) बढ़ती है । तो 48 रोग शरीर में उत्पन्न होते हैं । उसमें से सबसे पहला रोग है - कोलस्ट्रोल का बढ़ना । कोलस्ट्रोल को आम आदमी की भाषा में बोलें । तो मतलब रक्त में कचरा बढ़ना । और जैसे ही रक्त में ये कोलस्ट्रोल बढ़ता है । तो हमारा रक्त दिल के वाहिका ( नालियो ) में से निकलता हुआ blockage करना शुरू कर देता है । और फिर blockage धीरे धीरे इतनी बढ़ जाती है कि पूरी वाहिका ( नली ) भर जाती है । और मनुष्य को heart attack होता है ।
तो सोचिए - ये चाय आपको धीरे धीरे कहाँ तक लेकर जा सकती है ?
इसलिए कृपया इसे छोड़ दें ।
अब आपने इतनी अम्लीय चाय पी पीकर जो आज तक पेट बहुत ज्यादा अम्लीय कर लिया है । इसकी अम्लता को फिर कम करिए । 
कम कैसे करेंगे ?
सीधी सी बात पेट अम्लीय ( acidic ) है । तो क्षारीय चीजें अधिक खाओ ।
क्योंकि अम्‍ल ( acidic ) और क्षार ( alkaline ) दोनों को मिला दो । तो nautral हो जाएगा ।
तो क्षारीय चीजों में आप जीरे का पानी पी सकते हैं । पानी में जीरा डालें । बहुत अधिक गर्म करें । थोड़ा ठंडा होने पर पियें । दालचीनी को ऐसे ही पानी में डालकर गर्म करें । ठंडा कर पियें ।
और एक बहुत अधिक क्षारीय चीज आती है । वो है अर्जुन की छाल का काढ़ा 40-45 रुपए किलो कहीं भी मिल जाता है । इसको आप गर्म दूध में डालकर पी सकते हैं । बहुत जल्दी heart की blockage और high bp कालस्ट्रोल आदि को ठीक करता है ।
एक और बात आप ध्यान दें । इंसान को छोड़कर कोई जानवर चाय नहीं पीता । कुत्ते को पिलाकर देखो । कभी नहीं पियेगा । सूंघकर इधर उधर हो जाएगा । दूध पिलाओ । एकदम पियेगा । कुत्ता, बिल्ली, गाय, चिड़िया जिस मर्जी जानवर को पिलाकर देखो । कभी नहीं पियेगा । 
और एक बात आपके शरीर के अनुकूल जो चीजें हैं । वो आपके 20 किमी के दायरे में ही होंगी । आपके गर्म इलाके से सैंकड़ों मील दूर ठंडी पहाड़ियों में होने वाली चाय या काफी आपके लिए अनुकूल नहीं है । वो उन्‍हीं लोगों के लिए है । आजकल ट्रांसपोटेशन इतना बढ़ गया है कि हमें हर चीज आसानी से मिल जाती है । वरना शरीर के अनुकूल चीजें प्रत्‍येक इलाके के आसपास ही पैदा हो पायेंगी ।
तो आप चाय छोड़ें । अपने अम्लीय पेट और रक्त को क्षारीय चीजों का अधिक से अधिक सेवन कर शरीर स्वस्थ रखें ।
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साभार - राजीव दीक्षित..चित्र का लिंक चित्र में ही है ।
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