Friday, 26 June 2015

पाचन शक्ति बढ़ाने के उपाय

पके अनार के 10 ग्राम रस में भुना हुआ जीरा और गुड़ समान मात्रा में मिलाकर दिन में 2 या 2 बार लें । पाचन शक्ति की दुर्बलता दूर होगी ।
- काली राई 2-4 ग्राम लेने से कब्ज से होने वाली बदहजमी मिट जाती है ।
- अनानास के पके फल के बारीक टुकड़ों में सेंधा नमक और काली मिर्च मिलाकर खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है ।
- भोजन करने के बाद बेचैनी महसूस हो । तो अनानास का रस पीएं ।
- पकाए हुए आंवले को घीयाकस करके स्वाद अनुसार काली मिर्च, सौंठ, सेंधा नमक, भुना जीरा और हींग मिलाकर बड़ी बनाकर छाया में सुखा लें । इसके सेवन से पाचन विकार दूर होता है । तथा भूख बढ़ती है ।
- अमरूद के कोमल पत्तों के 10 ग्राम रस में थोड़ी शक्कर मिलाकर प्रतिदिन केवल 1 बार प्रात:काल सेवन करने से बदहजमी दूर होकर पाचन शक्ति बढ़ती है ।
- खट्टे मीठे अनार का रस 1 ग्राम मुंह में लेकर धीरे धीरे पीएं । इस प्रकार 8-10 बार करने से मुख का स्वाद ठीक होकर आंत्र दोष दूर होता है । ज्वर के कारण हुई अरुचि दूर होती है । तथा पाचन शक्ति बढ़ जाती है ।
- हरड़ एवं गुड़ के 6 ग्राम चूर्ण को गर्म पानी से या हरड़ के चूर्ण में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से पाचन शक्ति तेज होती है ।
- हरड़ का मुरब्बा खाने से पाचन शक्ति में वृद्धि होती है ।
- 1-2 ग्राम लौंग का जौकूट करके 100 ग्राम पानी में उबालें । 20-25 ग्राम शेष बचने पर छान लें । और ठंडा होने पर पीएं । इससे पाचन संबंधी विकार दूर होते हैं । हैजे में भी यह लाभकारी है ।
- इलायची के बीजों के चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर दिन में 2-3 बार 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से गर्भवती स्त्री के पाचन विकार दूर हो जाते हैं । तथा खुलकर भूख लगती है ।
- 1 कप पानी में आधा नींबू निचोड़ कर 5-6 काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सुबह शाम भोजन के बाद पीने से पेट की वायु, उद्धवात, बदहजमी, विषमाग्नि जैसी शिकायतें दूर होकर पाचन शक्ति प्रबल होती है ।
- नींबू पर काला नमक लगाकर चाटने से बदहजमी और भोजन के प्रति अरुचि दूर होती है ।

श्री पद्धति से धान लगाने की सलाह

धान का मिलेगा अधिक उत्पादन । बालाघाट । 24 जून 2015 - श्री पद्धति धान की खेती करने का नया तरीका है । जो कि परम्परागत तरीके से करने वाली खेती की अपेक्षा धान की अधिक से अधिक उपज में सहायक है । यदि किसान धान श्री विधि से उगायें । तो 1 एकड़ जमीन पर 40 से 50 क्विंटल धान की पैदावार होती है । पानी की कम से कम आवश्यकता होती है । जिले में किसानों को कृषि विभाग द्वारा सलाह दी गई है कि वे खेती को लाभ का धंधा बनाने के लिए श्री पद्धति से धान की खेती करें ।
उप संचालक कृषि श्री राजेश त्रिपाठी ने किसानों को सलाह दी है कि श्री पद्धति से धान की खेती के लिए नर्सरी तैयार करने एक एकड़ धान की रोपाई के लिये 30 गुणा 5 फीट आकार में जमीन तैयार करें । सिंचाई या अतिरिक्त पानी हटाने के लिये प्लाट के बीच में लगभग 1.5 फीट का फसला रखें । हर एक प्लाट में 2 से 3 टोकरी अच्छी तरह पकी हुई कम्पोस्ट/गोबर की खाद डालें । उपचारित अकुंरित बीज को 6 हिस्सों में बराबर बराबर मात्रा में बांट लें । प्रत्येक हिस्से को इन 6 प्लाटों में समान रूप से छींटे ।
1 एकड़ जमीन के लिये 2 किग्रा बीज लें । आधा बाल्टी पानी में इतना नमक मिलाये कि मुर्गी का अंडा ऊपर आकर तैरने लगे । अंडे को निकाल कर उसमें बीज को डाल दें । जो बीज पानी में ऊपर की ओर तैरने लगे । उसे बाहर निकाल दें । क्योंकि वह खराब बीज है । स्वस्थ बीज से नमक हटाने साफ पानी से धो लें । धुले बीज को जूट की बोरी मे बांधकर 18 से 20 घंटे के लिये पानी में डाल दें । कार्बनडाजिम/बाविस्टीन मिले बीज को गीली बोरी में बांधकर 24 घंटे के लिये छायादार जगह या घर में अंकुरण के लिये रख दें । पौध को नर्सरी तक ले जाने के लिए 8 से 12 दिन की पौध रोपाई हेतु अच्छी मानी जाती है । पौध को जड़ की मिट्टी सहित सावधानी पूर्वक उखाड़कर नर्सरी से खेत तक 1 चौड़े बर्तन में रखकर ले जाते हैं । ध्यान रहे पौध को निकालने के आधे घंटे के अंदर रोप देना चाहियें । 10 इंच की दूरी पर 1-1 रोपा लाईन में लगाते हैं । 1 एकड़ जमीन में रोपने के लिये 2 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है ।
रोपाई के लिए खेत को परम्परागत तरीके से ही तैयार करें । 1 एकड़ खेत में 60 से 80 क्विंटल कम्पोस्ट/गोबर की खाद डालना चाहिये । लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी 10 इंच होनी चाहिये । हर 15वीं लाईन के बाद 16वीं लाईन में दूरी 12 इंच होनी चाहिये । खरपतवार नियंत्रण के लिए रोपाई के बाद 15 दिन के अंतर पर कम से कम 2 बार कोनोवीडर मशीन चलाना चाहिये । श्री विधि से 1 एकड़ में 40 से 50 क्विंटल धान पैदा होती है । किसानों को सलाह दी गई है कि वे श्री विधि को अपनाकर धान की अधिक से अधिक पैदावार प्राप्त कर लाभ कमायें ।

मुलहठी के अनेक लाभ

मुलेठी बहुत गुणकारी औषधि है । मुलेठी के प्रयोग करने से न सिर्फ आमाशय के विकार बल्कि गैस्ट्रिक अल्सर के लिए फायदेमंद है । इसका पौधा 1 से 6 फुट तक होता है । यह मीठा होता है । इसलिए इसे ज्येष्ठीमधु भी कहा जाता है । असली मुलेठी अंदर से पीली, रेशेदार एवं हल्की गंध वाली होती है । यह सूखने पर अम्ल जैसे स्वाद की हो जाती है । मुलेठी की जड़ को उखाड़ने के बाद 2 वर्ष तक उसमें औषधीय गुण विद्यमान रहता है । ग्लिसराइजिक एसिड के होने के कारण इसका स्वाद साधारण शक्कर से 50 गुना अधिक मीठा होता है ।
मुलेठी के गुण - यह ठंडी प्रकृति की होती है । और पित्त का शमन करती है ।
- मुलेठी को काली मिर्च के साथ खाने से कफ ढीला होता है । सूखी खांसी आने पर मुलेठी खाने से फायदा होता है । इससे खांसी तथा गले की सूजन ठीक होती है ।
- अगर मुंह सूख रहा हो । तो मुलेठी बहुत फायदा करती है । इसमें पानी की मात्रा 50% तक होती है । मुंह सूखने पर बारबार इसे चूसें । इससे प्‍यास शांत होगी ।
- गले में खराश के लिए भी मुलेठी का प्रयोग किया जाता है । मुलेठी अच्‍छे स्‍वर के लिए भी प्रयोग की जाती है ।
- मुलेठी महिलाओं के लिए बहुत फायदेमंद है । मुलेठी का 1 ग्राम चूर्ण नियमित सेवन करने से वे अपनी सुंदरता को लंबे समय तक बनाये रख सकती हैं ।
- लगभग 1 महीने तक, आधा चम्मच मूलेठी का चूर्ण सुबह शाम शहद के साथ चाटने से मासिक सम्बन्धी सभी रोग दूर होते हैं ।
- फोड़े होने पर मुलेठी का लेप लगाने से जल्दी ठीक हो जाते हैं ।
- रोज़ 6 ग्राम मुलेठी चूर्ण 30 मिली दूध के साथ पीने से शरीर में ताकत आती है ।

- लगभग 4 ग्राम मुलेठी का चूर्ण घी या शहद के साथ लेने से ह्रदय रोगों में लाभ होता है ।
- इसके आधा ग्राम रोजाना सेवन से खून में वृद्धि होती है ।
- जलने पर मुलेठी और चन्दन के लेप से शीतलता मिलती है ।
- इसके चूर्ण को मुंह के छालों पर लगाने से आराम मिलता है ।
- मुलेठी का टुकड़ा मुंह में रखने से कान का दर्द और सूजन ठीक होता है ।
- उल्टी होने पर मुलेठी का टुकडा मुंह में रखने पर लाभ होता है ।
- मुलेठी की जड़ पेट के घावों को समाप्‍त करती है । इससे पेट के घाव जल्‍दी भर जाते हैं । पेट के घाव होने पर मुलेठी की जड़ का चूर्ण इस्‍तेमाल करना चाहिए ।
- मुलेठी पेट के अल्‍सर के लिए फायदेमंद है । इससे न केवल गैस्ट्रिक अल्सर वरन छोटी आंत के प्रारम्भिक भाग ड्यूओडनल अल्सर में भी पूरी तरह से फायदा करती है । जब मुलेठी का चूर्ण ड्यूओडनल अल्सर के अपच, हाइपर एसिडिटी आदि पर लाभदायक प्रभाव डालता है । साथ ही अल्सर के घावों को भी तेजी से भरता है ।
- खून की उल्टियां होने पर दूध के साथ मुलेठी का चूर्ण लेने से फायदा होता है । खूनी उल्‍टी होने पर मधु के साथ भी इसे लिया जा सकता है ।
- हिचकी होने पर मुलेठी के चूर्ण को शहद में मिलाकर नाक में टपकाने तथा 5 ग्राम चूर्ण को पानी के साथ खिला देने से लाभ होता है ।
- मुलेठी आंतों की टीबी के लिए भी फायदेमंद है ।
- ये 1 प्रकार की एंटीबायोटिक भी है । इसमें बैक्टीरिया से लड़ने की क्षमता पाई जाती है । यह शरीर के अन्‍दरूनी चोटों में भी लाभदायक होती है ।
- मुलेठी के चूर्ण से आँखों की शक्ति भी बढ़ती है । सुबह 3 या 4 ग्राम खाना चाहिये ।
- यदि भूख न लगती हो । तो 1 छोटा टुकड़ा मुलेठी कुछ देर चूसें । दिन में 3-4 बार इस प्रक्रिया को दोहरा लें । भूख खुल जाएगी ।
- कोई भी समस्या न हो । तो भी कभी कभी मुलेठी का सेवन कर लेना चाहिए । आँतों के अल्सर,  कैंसर का खतरा कम हो जाता है । तथा पाचन क्रिया भी एकदम ठीक रहती है ।

कन्या बचाओ । गर्भपात महापाप

गर्भस्थ बच्ची की हत्या का आँखों देखा विवरण - अमेरिका में सन 1984 में एक सम्मेलन हुआ था नेशनल राइटस टू लाइफ कनवेन्शन ।
इस सम्मेलन के एक प्रतिनिधि ने डा. बर्नार्ड नेथेनसन के द्वारा गर्भपात की बनायी गयी एक
अल्ट्रासाउण्ड फिल्म ‘साइलेण्ट स्क्रीम’ ( गूँगी चीख ) का जो विवरण दिया था ।
वह इस प्रकार है - गर्भ की वह मासूम बच्ची अभी दस सप्ताह की थी । व काफी चुस्त थी ।
हम उसे अपनी माँ की कोख में खेलते । करवट बदलते व अंगूठा चूसते हुए देख रहे थे । उसके दिल की धड़कनों को भी हम देख पा रहे थे । और वह उस समय 120 की साधारण गति से धड़क रहा था । सब कुछ बिलकुल सामान्य था । किन्तु जैसे ही पहले औजार ( सक्सन पम्प ) ने गर्भाशय की दीवार को छुआ । वह मासूम बच्ची डर से एकदम घूमकर सिकुड़ गयी । और उसके दिल की धड़कन काफी बढ़ गयी ।
हालांकि अभी तक किसी औजार ने बच्ची को छुआ तक भी नहीं था । लेकिन उसे अनुभव हो गया था कि कोई चीज उसके आरामगाह उसके सुरक्षित क्षेत्र पर हमला करने का प्रयत्न कर रही है । हम
दहशत से भरे यह देख रहे थे कि किस तरह वह औजार उस नन्हीं मुन्नी मासूम गुड़िया सी बच्ची के टुकड़े टुकड़े कर रहा था । पहले कमर फिर पैर आदि के टुकड़े ऐसे काटे जा रहे थे । जैसे वह जीवित प्राणी न होकर कोई गाजर मूली हो । और वह बच्ची दर्द से छटपटाती हुई सिकुड़कर घूम घूमकर तड़पती हुई इस हत्यारे औजार से बचने का प्रयत्न कर रही थी । वह इस बुरी तरह डर गयी थी कि एक समय उसके दिल की धड़कन 200 तक पहुँच गयी । मैंने स्वयं अपनी आँखों से उसको अपना सिर पीछे झटकते व मुँह खोलकर चीखने का प्रयत्न करते हुए देखा । जिसे डा. नेथेनसन ने उचित ही ‘गूँगी चीख’ या ‘मूक पुकार’ कहा है । अंत में हमने वह नृशंस वीभत्स दृश्य भी देखा । जब संडसी उसकी खोपड़ी को तोड़ने के लिए तलाश रही थी । और फिर दबाकर उस कठोर खोपड़ी को तोड़ रही थी । क्योंकि सिर का वह भाग वगैर तोड़े सक्शन ट्यूब के माध्यम से बाहर नहीं निकाला जा सकता था ।
हत्या के इस वीभत्स खेल को सम्पन्न करने में करीब पन्द्रह मिनट का समय लगा । और इसके दर्दनाक दृश्य का अनुमान इससे अधिक और कैसे लगाया जा सकता है कि जिस डाक्टर ने यह गर्भपात किया था । और जिसने मात्र कौतूहलवश इसकी फिल्म बनवा ली थी । उसने जब स्वयं इस फिल्म को देखा । तो वह अपना क्लीनिक छोड़कर चला गया । और फिर वापस नहीं आया ।
आपका एक शेयर किसी अजन्मी बच्ची - लडकी की जान बचा सकता है ।
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Saturday, 20 June 2015

सुडौल स्तनों के लिये

अपने स्‍तनों के आकार और उनके सैगीनेस ( बिन कसाव के ) को लेकर महिलायें अक्‍सर खुलकर बात नहीं करतीं । हालांकि इस बात को लेकर वे काफी संशय में जरूर रहती हैं । कई महिलायें इसे आत्‍मसम्‍मान का मुद्दा भी बना लेती हैं ।
हालांकि उम्र और उसके प्रभावों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता । लेकिन कुछ तरीके हैं । जिन्‍हें आजमाकर सैगिंग का सामना किया जा सकता है । और वो भी‍ बिना सर्जरी के -
वजन रखें काबू में - जब आप सैगी ब्रेस्‍ट का सामना कर रही हों । तो सबसे जरूरी है कि आप वजन को काबू रखें । कड़ी डायटिंग आपकी सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकती है । इसके साथ ही इसका आपके लुक पर भी असर पड़ता है । तो बेहतर है कि वजन कम करने के अपने लक्ष्‍य की ओर धीरे धीरे बढ़ें । संयम रखें । और जितना हो सके । अतिरिक्‍त वजन से छुटकारा पाएं । जब आपका वजन जरूरत से ज्‍यादा अथवा कम हो जाता है । तो इसका असर आपके स्‍तनों के लुक पर भी पड़ता है । इससे आपकी त्‍वचा पर निशान भी आ सकते हैं ।
धूम्रपान छोड़ें - अगर आप ढीले स्‍तनों से परेशान हैं । और आप इसे दूर करना चाहती हैं । तो धूम्रपान से दूर रहें । अगर आप धूम्रपान नहीं करतीं । तो कोशिश करें कि परोक्ष धूम्रपान से दूर रहें । धूम्रपान से आपके चेहरे पर ही झुर्रियां नहीं आतीं । बल्कि इससे स्‍तनों को नुकसान पहुंचता है । धूम्रपान से समय के साथ साथ त्‍वचा अपना लचीलापन खो देती है । सिगरेट के प्रभाव फौरन नजर नहीं आते । लेकिन कुछ समय बाद आपकी त्‍वचा पर सिगरेट के दुष्‍प्रभाव नजर आने लगते हैं ।

सही ब्रा चुनें - आप एक और तरीका आजमा सकती हैं । व्‍यायाम के दौरान एक सही स्‍पोर्टस ब्रा पहनें । दौड़ने से आपके स्‍तनों को सहारा देने वाले स्‍नायुबंधों पर काफी जोर पड़ता है । ऐसे में आपको ऐसे कपड़े चुनने चाहिए । जिससे उनकी गति को नियंत्रित किया जा सके । इससे आप सैगिंग से बचा जा सकता है ।
सही पाश्‍चर जरूरी - सही पाश्‍चर आपमें आत्‍मसम्‍मान बढ़ाता है । इससे आप पतली भी नजर आती हैं । साथ ही आपके स्‍तन भी सही शेप और आकार में दिखायी देते हैं । जरूरी है कि सीधी खड़ी हों । कंधे और कमर न झुकायें । इससे भी काफी फर्क पड़ता है ।
मसाज - मसाज भी आपकी काफी मदद कर सकती है । अपने आप मसाज करने से आपके स्‍तनों को स्थिर रखने वाले द्रव का स्राव होता है । इससे आपके स्‍तन सही आकार में रहते हैं ।
पुश अप्‍स - अपनी अपर बॉडी को सही आकार में रखने के लिए पुश-अप्‍स काफी अच्‍छा व्‍यायाम माना जाता है । इससे आपके स्‍तन सही आकार में रहते हैं । अगर आपको पुश-अप्‍स करने की आदत नहीं है । तो यह काम आपके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है । शुरुआत में आप घुटने जमीन पर‍ टिकाकर भी पुश-अप्‍स कर सकती हैं । पुश-अप्‍स से स्‍तन के ऊतकों को अधिक शक्ति मिलती है ।
वेट ट्रेनिंग - स्‍तनों को सैगिंग से बचाने का एक और तरीका है कि आप वेट ट्रेनिंग करें । आप डंबल के साथ कुछ एक्‍सरसाइज कर सकती हैं । आप डंबल के साथ कुछ व्‍यायाम कर सकती हैं । अगर आप चाहें । तो अपने फिजिकल ट्रेनर से कुछ अन्‍य व्‍यायाम भी पूछ सकती हैं ।
अपने स्‍तनों को सही आकार में रखने के लिए आप सभी प्रयास करती ही हैं । पर जीवन में काफी कुछ होता रहता है । जिसका असर आपके स्‍तनों पर पड़ता है । तो ऐसे में घबराएं नहीं । 
आप अकेली इस समस्‍या से नहीं जूझ रहीं । खुद को फिट रखने का प्रयास कीजिए । और इस समस्‍या से कुछ हद तक छुटकारा पाइए ।

सूर्य नमस्कार

21 जून को प्रथम विश्व योग दिवस के अवसर पर 35 मिनट के पैकेज में पूरा विश्व योग करने वाला है । नरेंद्र मोदी के आह्वान पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 21 जून को ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ घोषित किया था । यह पहला मौका है । जब पूरा विश्व इस दिन योग दिवस मनाएगा ।
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सर्वप्रथम योग की शुरुआत प्रार्थना अर्थात तीन बार ॐ ध्वनि से होगी । सब प्रार्थना करेंगे कि ..
- हे मनुष्यो ! मिलकर चलो । मिलकर बोलो । और तुम्हारे मन मिलकर ज्ञान प्राप्त करें । अर्थात समान ज्ञान वाले हों ।
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सूर्य नमस्कार 12 स्थितियों से मिलकर बना है । सूर्य नमस्कार के एक पूर्ण चक्र में इन्हीं 12 स्थितियों को क्रम से दो बार दुहराया जाता है ।
12 स्थितियों में से प्रत्येक के साथ एक मंत्र जुड़ा है । मंत्र के दुहराने व निहित भावों का अनुभव करने पर मन पर शक्तिशाली प्रभाव पड़ता है । सुनाई देने वाली अथवा न सुनाई देने वाली ध्वनि तरंगों के द्वारा मन पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ने के कारण ऐसा होता है ।
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स्थिति अभ्यास 1 - प्रार्थना की मुद्रा
विधि - प्रार्थना की मुद्रा में पैर के दोनों पंजों को मिलाकर नमस्कार की मुद्रा में सीधे खड़े हो जाईये । पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दीजिये ।
श्वास - सामान्य । एकाग्रता - अनाहत चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ मित्राय नमः । 
लाभ - व्यायाम की तैयारी के रूप में एकाग्रता, स्थिरता व शांति प्रदान करता है ।
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स्थिति अभ्यास 2 - हस्त उत्तानासन
विधि - दोनों हाथों ( भुजाओं ) को सिर के ऊपर उठाईये । दोनों हाथ सीधे होंगे । कंधों की चौड़ाई के बराबर दोनों भुजाओं में फासला रखिये । सिर और ऊपरी धड़ को थोड़ा सा पीछे झुकाईये ।
श्वास - भुजाओं को उठाते समय स्वांस लीजिये ।
एकाग्रता - विशुद्ध चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ रवये नमः ( ॐ रविये नमः )
लाभ - आमाशय की अतिरिक्त चर्बी को हटाता है । और पाचन को सुधारता है । इसमें भुजाओं और कंधों की मांसपेशियों का व्यायाम होता है ।
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स्थिति अभ्यास 3 - पादहस्तासन
विधि - सामने दोनों हाथों को यथासंभव जितना हो सके । उतना सामने की ओर झुकाईये । एवं प्रयास करें कि अंगुलियां या हाथ जमीन को पैरों के पंजों के बगल में स्पर्श कर लें । मस्तक को घुटने से स्पर्श कराने की कोशिश करें । अत्यधिक जोर न लगायें । पैरों को सीधा रखें ।
श्वास - श्वास लीजिये । एवं सामने की ओर झुकते समय स्वांस छोड़िये । अधिक से अधिक सांस बाहर निकालने के लिए अन्तिम स्थिति में आमाशय को सिकोड़िये ।
एकाग्रता - स्वाधिष्ठान चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ सूर्याय नमः
लाभ - पेट व आमाशय की समस्याओं को दूर करता है । नष्ट करता है । आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी को कम करता है । कब्ज को हटाने में सहायक है । रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्त संचार में लाभ प्रदान करता है ।
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स्थिति अभ्यास 4 - अश्व संचालन आसन
विधि - बायें पैर को जितना सम्भव हो सके । पीछे तक ले जाईये । इसी के साथ दायें पैर को मोड़िये । लेकिन पंजा अपने स्थान पर ही रहे । भुजाएं अपने स्थान पर सीधी रहें । इसके बाद शरीर का भार दोनों हाथों, बायें पैर

के पंजे, बायें घुटने व दायें पैर की अंगुलियों पर रहेगा । अंतिम स्थिति में सिर पीछे को उठाईये । कमर को धनुषाकार बनाने का प्रयास और दृष्टि ऊपर की तरफ रखिये ।
श्वास - बाएं पैर को पीछे ले जाते समय स्वांस लीजिये ।
एकाग्रता - आज्ञा चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ भानवे नमः
लाभ - आमाशय के अंगों की मालिश कर कार्यप्रणाली को सुधारता है । पैरों की मांसपेशियों को शक्ति मिलती है । मजबूती मिलती है ।
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स्थिति अभ्यास 5 - पर्वतासन
विधि - दाँयें पैर को सीधा करके बायें पंजे के पास रखिये । नितम्बों को ऊपर उठाईये । और सिर को भुजाओं के बीच में लाईये । अन्तिम स्थिति में पैर और भुजाएं सीधी रहें । इस स्थिति में एड़ियों को जमीन से स्पर्श कराने का प्रयास कीजिये ।
स्वांस - दायें पैर को सीधा करते एवं धड़ को उठाते समय स्वांस छोड़िये ।
एकाग्रता - विशुद्ध चक्र पर ।
मंत्र- ऊँ खगाय नमः
लाभ - भुजाओं एवं पैरों के स्नायुओं एवं मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है । अभ्यास 4 के विपरीत आसन के रूप में रीढ़ को उल्टी दिशा में झुकाकर उसे लचीला बनाता है । रीढ़ के स्नायुओं के दबाव को सामान्य बनाता है । तथा उनमें ताजे रक्त का संचार करने में सहायक है ।
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स्थिति अभ्यास 6 - अष्टांग नमस्कार
विधि - शरीर को भूमि पर इस प्रकार झुकाइये कि अन्तिम स्थिति में दोनों पैरों की अंगुलियां, दोनों घुटने, सीना, दोनों हाथ तथा ठुड्डी भूमि का स्पर्श करें । नितम्ब व आमाशय जमीन से थोड़े ऊपर उठे रहें ।
स्वांस - स्थिति 5 में छोड़ी हुई स्वांस को बाहर ही रोके रखिये ।
एकाग्रता - मणिपुर चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ पूष्णे नमः
लाभ - पैरों और भुजाओं की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है ।
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स्थिति अभ्यास 7 - भुजंगासन
विधि - हाथों को सीधे करते हुए शरीर को कमर से ऊपर उठाईये । सिर को पीछे की ओर झुकाईये । यह अवस्था भुजंगासन की अन्तिम स्थिति के समान ही है ।
स्वांस - कमर को धनुषाकार बनाकर उठते हुए स्वांस लीजिये ।
एकाग्रता - स्वाधिष्ठान चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ हिरण्यगर्भाय नमः
लाभ - आमाशय पर दबाव पड़ता है । यह आमाशय के अंगों में जमे हुए रक्त को हटाकर ताजा रक्त संचार करता है । बदहजमी व कब्ज सहित यह आसन पेट के सभी रोगों में उपयोगी है । रीढ़ को धनुषाकार बनाने से उसमें व उसकी मांसपेशियों में लचीलापन आता है । एवं रीढ़ के प्रमुख स्नायुओं को नयी शक्ति मिलती है ।
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स्थिति अभ्यास 8 - पर्वतासन
यह स्थिति 5 की आवृत्ति है ।
दायें पैर को सीधा करके बायें पंजे के पास रखिये । नितम्बों को ऊपर उठाईये । और सिर को भुजाओं के बीच में लाईये । अन्तिम स्थिति में पैर और भुजाएं सीधी रहें । इस स्थिति में एड़ियों को जमीन से स्पर्श कराने का प्रयास कीजिये ।
स्वांस - दायें पैर को सीधा करते एवं धड़ को उठाते समय श्वास छोड़िये ।
एकाग्रता - विशुध्दि चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ मरीचये नमः
लाभ - भुजाओं एवं पैरों के स्नायुओं एवं मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है ।
अभ्यास 4 के विपरीत आसन के रूप में रीढ़ को उल्टी दिशा में झुकाकर उसे लचीला बनाता है । रीढ़ के स्नायुओं के दबाव को सामान्य बनाता है । तथा उनमें ताजे रक्त का संचार करने में सहायक है ।
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स्थिति अभ्यास 9 - अश्व संचालनासन
यह स्थिति 4 की आवृत्ति है ।
विधि - बायें पैर को जितना सम्भव हो सके । पीछे फैलाईये । इसी के साथ दायें पैर को मोड़िये । लेकिन पंजा अपने स्थान पर ही रहे । भुजाएं अपने स्थान पर सीधी रहें । इसके बाद शरीर का भार दोनों हाथों, बायें पैर के पंजे, बायें घुटने व दायें पैर की अंगुलियों पर रहेगा । अंतिम स्थिति में सिर पीछे को उठाईये । कमर को धनुषाकार बनाईये । और दृष्टि ऊपर की तरफ रखिये ।
स्वांस - बाएं पैर को पीछे ले जाते समय स्वांस लीजिये ।
एकाग्रता - आज्ञा चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ आदित्याय नमः
लाभ - आमाशय के अंगों की मालिश कर कार्यप्रणाली को सुधारता है । पैरों की मांसपेशियों को शक्ति मिलती है ।
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स्थिति अभ्यास 10 - पादहस्तासन
यह स्थिति 3 की आवृत्ति है ।
सामने की ओर झुकते जाईये । जब तक कि अंगुलियां या हाथ जमीन को पैरों के सामने तथा बगल में स्पर्श न कर लें । मस्तक को घुटने से स्पर्श कराने की कोशिश कीजिये । जोर न लगायें । पैरों को सीधे रखिये ।
स्वांस - सामने की ओर झुकते समय स्वांस छोड़िये । अधिक से अधिक सांस बाहर निकालने के लिए अन्तिम स्थिति में आमाशय को सिकोड़िये ।
एकाग्रता - स्वाधिष्ठान चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ सवित्रे नमः
लाभ - पेट व आमाशय के दोषों को रोकता तथा नष्ट करता है । आमाशय प्रदेश की अतिरिक्त चर्बी को कम करता है । कब्ज को हटाने में सहायक है । रीढ़ को लचीला बनाता एवं रक्तसंचार में तेजी लाता है । रीढ़ के स्नायुओं के दबाव को सामान्य बनाता है ।
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स्थिति अभ्यास 11 - हस्त उत्तानासन
यह स्थिति 2 की आवृत्ति है ।
विधि - दोनों भुजाओं को सिर के ऊपर उठाईये । कंधों की चौड़ाई के बराबर दोनों भुजाओं में फासला रखिये । सिर और ऊपरी धड़ को थोड़ा सा पीछे झुकाईये ।
स्वांस - भुजाओं को उठाते समय स्वांस लीजिये ।
एकाग्रता - विशुद्ध चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ अर्काय नमः
लाभ - आमाशय की अतिरिक्त चर्बी को हटाता और पाचन को सुधारता है । इसमें भुजाओं और कंधों की मांसपेशियों का व्यायाम होता है ।
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स्थिति अभ्यास 12 - प्रार्थना की मुद्रा ( नमस्कार मुद्रा )
यह अन्तिम स्थिति प्रथम स्थिति की आवृत्ति है ।
विधि - प्रार्थना की मुद्रा में पंजों को मिलाकर सीधे खड़े हो जाईये । पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दीजिये ।
स्वांस - सामान्य ।
एकाग्रता - अनाहत चक्र पर ।
मंत्र - ऊँ भास्कराय नमः
लाभ - पुन- एकाग्र एवं शान्त अवस्था में लाता है ।
साभार - Balweer Lodha 

Friday, 19 June 2015

असली अशोक का वृक्ष

अशोक का वृक्ष आम के पेड़ के बराबर होता है । यह दो प्रकार का होता है । एक तो असली अशोक वृक्ष । और दूसरा उससे मिलता जुलता नकली अशोक वृक्ष ।
भाषा भेद से नाम भेद ~ संस्कृत - अशोक । हिन्दी - अशोक । मराठी - अशोपक । गुजराती - आसोपालव । बंगाली - अस्पाल, अशोक । तेलुगू - अशोकम । तमिल - अशोघम । लैटिन - जोनेसिया अशोका ।
गुण ~ यह शीतल, कड़वा, ग्राही, वर्ण को उत्तम करने वाला, कसैला और वात पित्त आदि दोष, अपच, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, विष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है । यह रसायन और उत्तेजक है । इसका क्वाथ गर्भाशय के रोगों का नाश करता है । विशेषकर रजोविकार को नष्ट करता है । इसकी छाल रक्त प्रदर रोग को नष्ट करने में उपयोगी होती है ।
परिचय ~ असली अशोक के वृक्ष को लैटिन भाषा में 'जोनेसिया अशोका' कहते हैं । यह आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है । इसके पत्ते 8-9 इंच लम्बे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं । इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं । इसीलिए इसे 'ताम्रपल्लव' भी कहते हैं । इसके नारंगी रंग के फूल वसन्त ऋतु में आते हैं । जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं । सुनहरी लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे 'हेमपुष्पा' भी कहा जाता है ।
दूसरा नकली वृक्ष आम के पत्तों जैसे पत्तों वाला होता है । इसके फूल सफेद पीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं । यह देवदार जाति का वृक्ष होता है । यह दवाई के काम का नहीं होता ।
रासायनिक संघटन ~ इसकी छाल में हीमैटाक्सिलिन, टेनिन, केटोस्टेरॉल, ग्लाइकोसाइड, सैपोनिन, कार्बनिक कैल्शियम तथा लौह के यौगिक पाए गए हैं । पर अल्कलॉइड और एसेन्शियल ऑइल की मात्रा बिलकुल नहीं पाई गई । टेनिन एसिड के कारण इसकी छाल सख्त ग्राही होती है । बहुत तेज और संकोचक प्रभाव करने वाली होती है । अतः रक्त प्रदर में होने वाले अत्यधिक रजस्राव पर बहुत अच्छा नियन्त्रण होता है ।
अशोकारिष्ट - अशोक वृक्ष की छाल का मुख्य रूप से उपयोग कर प्रसिद्ध आयुर्वेदिक योग 'अशोकारिष्ट' बनाया जाता है । देश के अनेक आयुर्वेदिक निर्माता संस्थान अशोकारिष्ट बनाते हैं । जो सर्वत्र दुकानों पर उपलब्ध रहता है । यह अशोकारिष्ट रक्त प्रदर, ज्वर, रक्तपित्त, रक्तार्श ( खूनी बवासीर ) मन्दाग्नि, अरुचि, प्रमेह, शोथ आदि रोगों को नष्ट करता है ।
अशोकारिष्ट श्वेत प्रदर, अधिक मात्रा में रक्त स्राव होना, कष्टार्तव, गर्भाशय व योनि-भ्रंश, डिम्बकोष प्रदाह, हिस्टीरिया, बन्ध्यापन तथा अन्य रोग जैसे पाण्डु, ज्वर, रक्त पित्त, अर्श, मन्दाग्नि, शोथ ( सूजन ) और अरुचि आदि को नष्ट करता है । तथा गर्भाशय को बलवान बनाता है ।
सेवन विधि ~ भोजन के तुरन्त बाद पाव कप पानी में दो बड़े चम्मच ( लगभग 20-25 मिली ) भर अशोकारिष्ट डालकर दोनों वक्त पीना चाहिए । लाभ होने तक सेवन करना उचित है ।

दाँतो का पीलापन

अक्सर आत्मविश्वास न होने के कारण कुछ लोग खुल कर नहीं मुस्कुराते । इसका कारण उनके दांतों का पीलापन होता है । सही ढंग से केयर न करने या प्लाक जमने के कारण दांत पीले हो जाते हैं । इसके अलावा खाने की कुछ चीजों के लगातार उपयोग, बढ़ती उम्र या अधिक दवाइयों का सेवन भी दांतों के पीलेपन के कारण हो सकते हैं । हममें से अधिकतर लोग चेहरे की खूबसूरती पर बहुत ध्यान देते हैं । लेकिन समय रहते दांतों की खूबसूरती पर ध्यान नहीं देते ।
ऐसे में जब दांत बहुत अधिक पीले या बदरंग हो जाते हैं । तो ये अच्छा नहीं लगता । यदि आपके साथ भी यह समस्या है । तो दांतों को सफेद बनाने के लिए अपनाएं ये - 10 तरीके ।
तुलसी - तुलसी में दांतों का पीलपन दूर करने की अदभुत क्षमता पाई जाती है । साथ ही तुलसी मुंह और दांत के रोगों से भी बचाती है । तुलसी के पत्तों को धूप में सुखा लें । इसके पाउडर को टूथपेस्ट में मिलाकर ब्रश करने से दांत चमकने लगते हैं ।
नमक - नमक दांतों को साफ करने का सदियों पुराना नुस्खा है । नमक में थोड़ा सा चारकोल मिलाकर दांत साफ करने से पीलापन दूर हो जाता है । और दांत चमकने लगते हैं ।
संतरे के छिलके - संतरे के छिलके और तुलसी के पत्तों को सुखाकर पाउडर बना लें । ब्रश करने के बाद इस पाउडर से दांतों पर हल्के से रोजाना मसाज करें । संतरे में मौजूद विटामिन C और कैल्शियम के कारण दांत मोती जैसे चमकने लगते हैं ।
गाजर - रोजाना गाजर खाने से भी दांतों का पीलापन कम हो जाता है । दरअसल, भोजन करने के बाद गाजर खाने से इसमे मौजूद रेशे दांतों की अच्छे से सफाई कर देते हैं ।
नीम - नीम का उपयोग प्राचीनकाल से ही दांत साफ करने के लिए किया जाता रहा है । नीम में दांतों को सफेद बनाने व बैक्टीरिया को खत्म करने के गुण पाए जाते हैं । यह नेचुरल एंटीबैक्टिीरियल और एंटीसेप्टिक है । रोजाना नीम के दातुन से मुंह धोने पर दांतों के रोग नहीं होते हैं ।
बेकिंग सोडा - बेकिंग सोडा पीले दांतों को सफेद बनाने का सबसे अच्छा घरेलू तरीका है । ब्रश करने के बाद थोड़ा सा बेकिंग सोडा लेकर दांतों को साफ करें । इससे दांतों पर जमी पीली पर्त धीरे धीरे साफ हो जाती है । बेकिंग सोडा और थोड़ा नमक टूथपेस्ट में मिलाकर ब्रश करने से भी दांत साफ हो जाते हैं ।
नींबू - नींबू एक ऐसा फल है जो मुंह की लार में वृद्धि करता है । इसलिए यह दांतों और मसूड़ों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है । एक नींबू का रस निकालकर उसमें उतनी ही मात्रा में पानी मिला लें । खाने के बाद इस पानी से कुल्ला करें । इस नुस्खे को अपनाने से दांत सफेद हो जाते हैं । और सांसों की दुर्गंध भी दूर हो जाती है ।
स्ट्रॉबेरी - स्ट्रॉबेरी दांतों को चमकदार बनाने का सबसे टेस्टी उपाय है । स्ट्रॉबेरी में पाया जाने वाला मैलिक एसिड दांतों को सफेद और चमकदार बनाता है । स्ट्रॉबेरी को पीस लें । इसके पल्प में थोड़ा बेकिंग सोडा मिलाएं । ब्रश करने के बाद इस मिश्रण को उंगली से दांतों पर लगाएं । दांत चमकने लगेंगे ।
केला - केला पीस लें । इसके पेस्ट से दांतों को रोज 1 मिनट तक मसाज करें । उसके बाद दांतों को ब्रश करें । रोजाना ये उपाय करने से धीरे धीरे दांतों का पीलापन खत्म हो जाएगा ।
विनेगर - 1 चम्मच जैतून के तेल में एप्पल विनेगर मिला लें । इस मिश्रण में अपना टूथब्रश डुबाएं । और दांतों पर हल्के हल्के घुमाएं । ये प्रक्रिया तब तक दोहराएं । जब तक मिश्रण खत्म न हो जाएं । इस नुस्खे को अपनाने से दांतों का पीलापन मिट जाता है । साथ ही सांसों की दुर्गंध की समस्या भी नहीं रहती है ।

हाइड्रोसिल का इलाज

आँख की गुहेरी - इमली के बीजों को 3 दिन तक पानी में भिगोकर रख दें । फिर उसका छिलका उतार कर पत्थर पर चंदन जैसा घिसकर गुहेरी पर लगा दें । ऐसा करने से तत्काल ही गुहेरी मुरझा जाती है । तथा कुछ ही दिनों में पूर्णतः समाप्त हो जाती है ।
बबासीर - 8-10 जायफल को देशी घी में अच्छी तरह भून कर पीसकर पाउडर बना लें । फिर 100 ग्राम आटा डालकर फिर से भून लें । तथा शक्कर मिलाकर रख लें । 1-1 चम्मच रोज खाली पेट सेवन करें । तो बवासीर में लाभ होता है ।
हाइड्रोसिल - छोटी कटेरी की जड़ को 10 ग्राम तथा 7 काली मिर्च को पीसकर पानी के साथ पियें । इस प्रकार 7 दिन तक सेवन करने से हाइड्रोसिल जड़ से समाप्त हो जाता है । तथा 20 ग्राम माजूफल, 5 ग्राम फिटकरी दोनों को पीसकर लेप करें ।
काली खाँसी - सुहागा, यवक्षार, कलमी शोरा, फिटकरी तथा सेंधा नमक बराबर मात्रा में मिलाकर पीस लें । फिर तवे में ड़ालकर पका लें । इस प्रकार तीन बार करें । फिर चूर्ण बनाकर रख लें । 2 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से काली खाँसी में लाभ होता है ।
अस्थमा - अडूसा के पत्तों के रस में तुलसी के पत्ते का रस मिलाकर गरम कर शहद के साथ सेवन करें । तो अस्थमा रोग समाप्त हो जाता है ।
हाई ब्लड प्रेशर - सर्पगंधा, अश्वगंधा, गिलोय, शंखपुष्पी, ब्राह्मी सबको बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लें । 1-1 चम्मच चूर्ण पानी के साथ खाली पेट सेवन करने से ब्लड प्रेशर में लाभ होता है ।
मोटापा - बायबिडंग, चव्य,  सोंठ, सौंफ तथा काला नमक समान भाग में मिलाकर चूर्ण बना लें । 2-2 ग्राम चूर्ण गाय के मट्ठे के साथ सेवन करने से मोटापा समाप्त हो जाता है ।
टीबी - सतगिलोय, छोटी पीपल, दाल चीनी तथा मुलैठी समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से टीबी रोग समाप्त हो जाता है ।
मिरगी - बादाम, बड़ी इलायची, अमरूद और अनार के 17 पत्ते सबको कूटकर दो गिलास पानी में उबालें । जब पानी आधा रह जाये । तो नमक मिलाकर पिला दें । इस तरह दिन में 2 बार पिलायें । कुछ ही दिनों में मिरगी रोग समाप्त हो जाता है ।
पथरी - पाषाणभेद, इलायची के दाने, पीपल और शुद्ध शिलाजीत सबको बराबर मिलाकर चूर्ण बना लें । आधा चम्मच चूर्ण को कुरथी के पानी के साथ सेवन करें । तो पथरी गल कर निकल जाती है ।
हृदय रोग - अर्जुन की छाल 10 ग्राम को पीसकर दूध में पकाकर थोड़ा सा गुड़ मिलाकर सेवन करने से हृदय रोग समाप्त हो जाता है ।  
पीलिया का आसान और कारगर इलाज - सूखे आलूबुखारे आपको पंसारी से मिल जाएंगे । 4 सूखे आलूबुखारे एक चम्मच इमली और 1 चम्मच मिश्री को एक गिलास पानी के साथ किसी मिटटी के बर्तन में भिगो कर रख दें । सुबह इस मिश्रण को हाथों से मसल लें । और अब इस पानी को मलमल के कपडे से छान लें । और घूँट घूँट कर पी लें । 
ये प्रयोग सुबह शाम करें ।
2 अगर मूली मिले । तो मूली के पत्तों का रास भी हर रोज़ पिएं ।
3 पीपल के ५ कोमल पत्तो को थोड़ी सी मिश्री के साथ 250 मिली पानी में बारीक कूट पीसकर छान लें । ये रोगी को सुबह शाम दें ।
3-4 दिन में रोगी बिलकुल स्वस्थ हो जायेगा ।
ये सारे प्रयोग ही करने हैं ।

मीठा नीम के लाभ

जय गुरुदेव, प्रिय भाई बहनों, आज मैं आपको ( मीठे नीम ) के बारे में जानकारी दूँगा । आशा करता हूँ कि आप इस जानकारी का पूरा लाभ लेंगे ।
अक्सर हम भोजन में से कढ़ी पत्ता निकाल कर अलग कर देते हैं । इससे हमें उसकी खुशबू तो मिलती है । पर उसके गुणों का लाभ नहीं मिल पाता । कढ़ी पत्ते को धोकर छाया में सुखाकर उसका पाउडर इस्तेमाल करने से बच्चे और बड़े भी इसे आसानी से खा लेते हैं । इस पाउडर को हम छाछ और नीबू पानी में भी मिला सकते हैं । इसे हम मसालों में, भेल में भी डाल सकते हैं । इसकी छाल भी औषधि है । हमें अपने घरों में इसका पौधा लगाना चाहिए ।
- कढ़ी पत्ता पाचन के लिए अच्छा होता है । यह डायरिया, डिसेंट्री, पाइल्स, मन्दाग्नि में लाभकारी होता है । यह मृदु रेचक होता है ।
- यह बालों के लिए बहुत उत्तम टानिक है । कढ़ी पत्ता बालों को सफ़ेद होने से और झड़ने से रोकता है ।
- इसके पत्तों का पेस्ट बालों में लगाने से जुओं से छुटकारा मिलता है ।
- कढ़ी पत्ता पेंक्रियाज़ के बीटा सेल्स को एक्टिवेट कर मधुमेह को नियंत्रित करता है ।
- हरे पत्ते होने से आयरन, जिंक, कॉपर, कैल्शियम, विटामिन ए और बी, अमीनो एसिड, फोलिक एसिड आदि तो इसमें होता ही है ।
- इसमें एंटी आक्सीडेंट होते हैं । जो बुढापे को दूर रखते हैं । और कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने नहीं देते ।
- जले और कटे स्थान पर इसके पत्ते पीस कर लगाने से लाभ होता है ।
- जहरीले कीड़े काटने पर इसके फलों के रस को नीबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से लाभ होता है ।
- यह किडनी के लिए लाभकारी होता है ।
- यह आँखों की बीमारियों में लाभकारी होता है । इसमें मौजूद एंटी आक्सीडेंट केटरेक्ट को शुरू होने से रोकते हैं । यह नेत्र ज्योति को बढाता है ।
- यह कोलेस्ट्रोल कम करता है । 
- यह इन्फेक्शन से लड़ने में मदद करता है ।
- वजन कम करने के लिए रोजाना कुछ मीठी नीम की पत्तियाँ चबायें ।
प्रतिदिन भोजन में कढ़ी पत्ते को दाल, सब्ज़ी में डालकर या चटनी बनाकर प्रयोग किया जा सकता है । जिस प्रकार दक्षिण भारत में किया जाता है ।
वैद्य बाबाजी ।
गुरुकृपा आयुर्वेद आश्रम । नजदीक काहलो डेयरी डीएवी स्कूल,
रूपनगर पंजाब - 0 94171 66756, 0 99153 35687
साभार - वैद्य धर्मपाल जी 
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