Monday, 23 July 2012

लेकिन कबीर ने यह सब कहाँ कहा है ?

क्योंकि मैं भी आत्म ज्ञान अध्ययन शाखा का एक छोटा सा छात्र हूँ । अतः झारखण्ड की तनुजा जी के ब्लाग - तनुजा ठाकुर.. ने मुझे तुरन्त आकर्षित किया । लेकिन इनका ब्लाग देखने पढने के बाद मुझे एक कनफ़्यूजन सा हो गया कि कबीर ने यह सब कहाँ कहा है ? शायद किसी और किताब में कहा हो । जो खास तनुजा जी ने पढी हो । जैसे - गो मूत्र गंगाजल आदि से नहाना । तमाम धार्मिक आडम्बर टोटके करना । इनके फ़ेसबुक पेज पर दिये नम्बर पर फ़ोन करने से मालूम हुआ । कबीर वाले आत्मज्ञान ? क्के साधकों को रोज 11 कर माला भी फ़ेरना चाहिये ।  चलिये कबीर को फ़िर से पढूँगा । फ़िलहाल आप भी देखें । और इनके ब्लाग लिंक पर क्लिक करें ।
ये एक शुभ लक्षण है कि इंटरनेट पर तमाम मनोरंजक ज्ञानवर्धक और अश्लील साइटस के साथ साथ धर्म प्रसार और भक्ति प्रसार की साइटस ब्लाग भी हैं । ऐसा ही एक लिंक हमारे परिचित ने भेजा । तो मैंने आत्मज्ञान से जुङे इस ब्लाग का अध्ययन किया । भक्ति का ज्ञान और प्रेरणा देते हुये कई लेख तनुजा जी द्वारा इस पर पोस्ट किये गये हैं । अतः यदि आप भी धर्म कर्म में रुचि रखते हैं । तो फ़िर ये ब्लाग पढना आपके लिये फ़ायदेमन्द हो सकता है । बाकी तो वही बात है - अर्जी हमारी मर्जी  तुम्हारी । आईये अब इनके परिचय पर एक निगाह डालें । इनका शुभ नाम है - तनुजा ठाकुर । और इनका Occupation है - Hindu dharma prasarak और इनका Location है jharkhand India और इनका Introduction है - you can also join my page on facebook for more spiritual inputs and the page id is http://www.facebook.com/pages/Tanuja-Thakur/261125813842?ref=sgm और इनका सम्पर्क नम्बर - 0 99998 61908 है । और इनका ब्लाग है - तनुजा ठाकुर । ब्लाग नाम पर क्लिक करें ।
और ये इनके ब्लाग से एक रचना - 
’जैसे हो अधिकार वैसे करें उपदेश’’  इस कथन अनुसार संत मार्गदर्शन करते हैं । एक बार हमारे श्रीगुरु ने एक 

सत्संग में एक छोटी सी प्रेरक कथा सुनाई थी । वह आपको बताती हूँ ।
एक बार स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास एक भक्त आया । वह थोड़ा विचलित था ।  स्वामीजी ने पूछा - ‘क्या हुआ ? भक्त ने कहा - चौराहे पर एक व्यक्ति आपको अपशब्द कह रहा है । स्वामीजी ने कहा - वह तुम्हारे गुरु को अपशब्द कह रहा था । और तुम सुन कर आ गए । जाओ उसे रोको । और वह शांत न हो । तो एक थप्पड़ लगाना । अभी वह निकल कर गया था कि एक दूसरा भक्त आया । उसके सिर से  खून बह रहा था । स्वामीजी ने पूछा - क्या हुआ । यह खून कैसा ?  दूसरे भक्त ने कहा - चौराहे पर एक व्यक्ति आपको अपशब्द कह रहा था । मुझे सहन नहीं हुआ । और मैंने उसे मारा । और इसी हाथापाई में मुझे चोट लग गयी । स्वामीजी ने प्रेम से झिड़कते हुए कहा - कितनी बार कहा है तुम्हें कि सभी में काली माँ है । इस प्रकार किसी पर हाथ नहीं उठाते । शिष्य ने सिर झुका स्वामीजी से क्षमा मांगी । ऐसा स्वामीजी ने क्यों किया ?
पहले भक्त की  गुरू पर निष्ठा कम थी । अतः स्वामीजी ने उसे जो भी उसके गुरु का विरोध करे । उसका विरोध करने के प्रेरणा दी । दूसरे भक्त का प्रवास सगुण से निर्गुण की ओर हो रहा था । अतः स्वामीजी  ने उसे सर्वत्र काली के स्वरूप को देखने सीख दी । क्या इतना सूक्ष्म अभ्यास करने वाला अध्यात्म शास्त्र अन्य धर्मो में है ?
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