Friday, 5 October 2012

गमों का दौर भी आये तो मुस्करा के जियो


ब्लागर परिचय श्रंखला में आज आपका परिचय श्री पंकज राजपूत से ।
इनका शुभ नाम है - पंकज सिंह राजपूत । और इनकी  Industry है - Non-Profit और इनका Occupation है - Volunteer Bharat Swabhiman Trust और इनकी Location है - नजफगढ़ ।  नई दिल्ली India पंकज जी अपने Introduction में कहते हैं - ॐ असतो मा सदगमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय । ॐ शांति: । शांति: । शांति: । Lead us from unreal to Real. Lead us from darkness to Light. Lead us from the fear of death, To knowledge of Immortality. May all have peace अर्थशास्त्र परा स्नातक विद्यार्थी । इस बृह्माण्ड के कारण रुपी सत्य को जानने के लिए अति उत्सुक । अति उत्साही । और अति जिज्ञासु Bharat Swabhiman Volunteer, Student, B.Com from Delhi University in 2010 enrolled for Master in Economics ( MEC ) fully inspired by works of Swami Vivekananda and now Swami Ramdev और इनका Interests है - Social Work  बस 1 ही धुन जय जय भारत । और इनके ब्लाग हैं - सत्य की खोज और भारतीय दर्शन आध्यात्मिक राष्ट्रवादभारत स्वाभिमान आंदोलन । नाम पर क्लिक करें ।
और इनकी Favourite Films है - देशभक्ति । और इनका Favourite Music है  - ना सर झुका के जियो । और ना मुँह छुपा के जियो । गमों का दौर भी आये तो मुस्करा के जियो । और इनकी Favourite Books हैं - Philosophy

History Yoga Health International and Domestic Economics Politics, Business Opportunities. Much more Spiritual and Patriotic.
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और ये हैं । इनके ब्लाग से कुछ रचनायें । इन रचनाओं के सिर्फ़ अंश ही यहाँ दिये गये हैं । पूरे लेख के लिये ब्लाग पर जायें ।
ॐ असतो मा सदगमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय । ॐ शांति: । शांति: । शांति: ।
सत्य ! यह 1 ऐसा तथ्य है । जिसमें बड़े बड़े ज्ञानी भी भृमित हो जाते हैं । जीवन का आरम्भ क्यों होता है ? और उसका अंत क्यों होता है ? अर्थात मृत्यु क्यों होती है ? इसी तथ्य को जानना सांसारिक सत्य है । संसार के सभी धर्म इसी सत्य को जानने का प्रयास कर रहें हैं । भौतिक स्तर पर हमें जीवन मृत्यु और जीवन चक्र ही सत्य प्रतीत होता है । परन्तु आध्यात्मिक स्तर पर सत्य जीवन - मृत्यु से परे की वस्तु है । जिसे केवल अनुभव किया जा सकता है । सम्पूर्ण बृह्माण्ड में केवल हम पदार्थ ( भिन्न भिन्न अवस्थाओं में ) और ऊर्जा को ही प्रत्यक्ष रूप से और परोक्ष रूप से भी अनुभव करते हैं । परन्तु इस पदार्थ और ऊर्जा का नियंता । कारण कौन है ? मेरे मत से वही कारण ही सत्य है । आईये इस प्रार्थना से

आरम्भ करते हुए मेरे साथ चलिए । उस सत्य की खोज में -  ॐ असतो मा सदगमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मामृतं गमय । ॐ शांति: । शांति: । शांति: ।
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भिखारी का ज्ञानोपदेश । ईशावास्योपनिषद - यह प्राचीन काल के 2 ऋषियों से सम्बंधित वृतांत है । उस प्राचीन युग में शौनक कापी और अभिद्रतारी 2 ऋषि थे । दोनों 1 ही आश्रम में रहते हुए बृह्मचारियों को शिक्षा दीक्षा दिया करते थे । दोनों ऋषियों के आराध्य देव वायु देवता थे । वे उन्हीं की उपासना करते थे । 1 बार दोनों ऋषि दोपहर का भोजन करने बैठे । तभी 1 भिक्षुक अपने हाथ में भिक्षा पात्र लिए उनके पास आया । और बोला - हे ऋषिवर ! मैं कई दिनों से भूखा हूँ । कृपा करके मुझे भी भोजन दे दीजिए । भिखारी की बात सुन कर दोनों ऋषियों ने उसे घूरकर देखा । और बोले - हमारे पास यहीं भोजन है । यदि हम अपने भोजन में से तुझे भी भोजन दे देंगें । तो हमारा पेट कैसे भरेगा । चल भाग यहाँ से । 
उनकी ऐसी बातें सुनकर उस भिखारी ने कहा - हे ऋषिवर ! आप लोग तो ज्ञानी हैं । और ज्ञानी होकर भी ये कैसी 

बातें करते हैं ? क्या आप जानते नहीं कि - दान श्रेष्ठ कर्म । भूखे को भोजन कराना । प्यासे को पानी देना महान पुण्य का कर्म है । इन कर्मों को करने से मनुष्य महान बन जाता है । यह शास्त्रों का कथन है ।  इसलिए कृपा करके मुझ भूखे को भी कुछ खाने को दीजिए । और पुण्य कमाईए ।
ऋषियों ने उसे विस्मित नजरों से देखते हुए सोचा । बड़ा ही विचित्र व्यक्ति है । हमारे मना करने पर भी भोजन मांग रहा है । दोनों ऋषि उसे कुछ पलों तक घूरते रहे । फिर स्पष्ट शब्दों में बोले - हम तुझे अन्न का 1 दाना भी नहीं देंगे । फिर भी वह भिखारी वहाँ से नहीं हिला । और बोला - किन्तु मेरे प्रश्नों का उत्तर देने में तो आपकों कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए ।
- हाँ हाँ पूछो पूछो ! दोनों ऋषियों ने सम्मिलित स्वर में उत्तर दिया ।  तब उसने पूछा - आपके आराध्य देव कौन हैं ? ऋषियों ने उत्तर दिया - वायु देवता हमारे आराध्य देव हैं । वही वायु देवता जिन्हें प्राण तथा श्वास भी कहते हैं । तब भिखारी ने कहा - तब तो तुम्हें यह भी ज्ञात होगा कि - वायु सृष्टि के कण कण में व्याप्त है । क्योंकि वही प्राण है ।  
- हम जानते हैं । दोनों ऋषियों ने 1 स्वर में कहा । फिर भिखारी ने पूछा - अच्छा ये बताओ कि तुम भोजन करने से पूर्व भोजन किस देवता को अर्पण करते हो ? बड़े अटपटे से भाव में ऋषियों ने कहा - यह भी कोई पूछने की

बात है । हम भोजन वायु देवता को अर्पित करते हैं । और हमने अब भी किया है । क्योंकि वायु ही प्राण हैं । जो सम्पूर्ण बृह्माण्ड में व्याप्त है ।
भिखारी ने लंबी गहरी श्वांस ली । और शांत भाव से बोला - यहीं मैं तुम्हारे मुँह से सुनने को उत्सुक था । जब तुम प्राण को भोजन अर्पित करते हो । और प्राण पूरे विश्व में समाये हैं । तो क्या मैं उस बृह्माण्ड ( विश्व ) से अलग हूँ ।  क्या मुझमें भी वही प्राण नहीं हैं ?
- हमें पता है । ऋषियों ने झल्लाकर कहा । इस पर भिखारी बोला - जब तुम्हें मालूम है । तो मुझे भोजन क्यों नहीं देते ।  संसार को पालने वाला ईश्वर ही है । वही सबका प्रलय रूप भी है ।  फिर भी तुम ईश्वर की कृपा क्यों नहीं समझते ? लगता है । तुम सर्व शक्तिमान से अनभिज्ञ हो ।  यदि तुम्हें ज्ञात होता कि - ईश्वर क्या है ? तो मुझे भोजन को मना न करते । 

जब ईश्वर ने वायु रूप प्राण से भी जीवों की रचना की है । तब तुम आचार्य होकर भी क्यों उसकी रचना में भेद कर रहे हो । जो प्राण तुममे समाये हैं । वही प्राण मुझमें भी हैं । फिर तुम्हारी तरह मुझे भोजन क्यों नहीं मिलना चाहिए ? क्यों तुम मुझे भोजन से वंचित रखना चाहते हो ?
1 भिखारी के द्वारा ऐसी ज्ञान भरी बातें सुनकर । दोनों ऋषि आश्चर्य चकित रह गए । और विस्मित दृष्टि से उसे देखने लगे ।  वे समझ गए कि - यह कोई बहुत ही ज्ञानवान पुरुष हमें उपदेश देने आया है । वे बोले - हे भद्र ! ऐसा नहीं है । कि हमें उस परम पिता परमेश्वर का ज्ञान नहीं है ।  हम जानते हैं कि - जिसने सृष्टि की रचना की है । वह ही प्रलय काल में स्व रचित सृष्टि को लील भी जाता है ।  साथ ही हमें यह भी मालूम है कि - स्थूल रूप से दृष्टि गोचर वस्तु । अंत में सूक्ष्म रूप से उसी परमात्मा में विलीन हो जाती है ।  किन्तु हे भद्र ! उस परम पिता को हमारी तरह भूख नहीं लगती है । और न ही वो हमारी तरह भोजन करता है । जब उसे भूख लगती है । तब वह इस सृष्टि को 

ही भोजन रूप में ग्रहण कर लेता है ।  विद्वान मनुष्य उसी परम पिता की आराधना करते हैं । इस संवाद के बाद ऋषियों ने भिखारी को अपने साथ बिठाया । और भोजन कराया । और बाद में उस भिखारी से शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया ।
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ईशावास्योपनिषद -
ईशा वास्यं इदं सर्वं यत किं च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद धनम ।
- संसार में ऐसा तो कुछ है ही नहीं । और न ही कोई ऐसा है । जिसमें ईश्वर का निवास न हो । तुम त्याग पूर्वक भोग करो । अपने पास अतिरिक्त संचय न करो । लोभ में अंधे न बनो । पैसा किसी का हुआ नहीं है । इसलिए धन से परोपकार करो । ओम शांति: शांति: शांति:
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होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से । छिन छिन पल पल घङी घड़ी होरी निसि दिन आठों जाम से । होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से ।
पंडित खेलै पोथी पत्रा से । मुल्ला किताब कुरान से । जोगी खेले जोग जुगत से । अभिमानी खेले अभिमान से । होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से । 
छिन छिन पल पल घङी घड़ी होरी निसि दिन आठों जाम से । होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से । 
कामी खेलै कामिनि के संग । लोभी खेलत दाम से । पतिवृता खेलै अपने पति संग । वैश्या सकल जहान से ।
होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से । छिन छिन पल पल घङी घड़ी होरी निसि दिन आठों जाम से । 
होरी खेलत संत सुजान । आत्मज्ञान से ।
अति प्रचंड तेज माया को । तकि तकि मारत बान से । कोटिन माहि बचे कोई बिरला । कहे कबीर गुरु ज्ञान से । होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से ।

छिन छिन पल पल घङी घड़ी होरी निसि दिन आठों जाम से । होरी खेलत संत सुजान । आत्म ज्ञान से ।
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आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है । अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है ।
आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है । अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है । 
फूलों में जो सुवास  ईख में मिठास है । भगवान का तो  विश्व के  कण कण में वास है ।
आनंद स्रोत बह रहा पर तू उदास है । अचरज है जल में रह के भी मछली को प्यास है ।
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सर्व बंधनों और दुखों के मूल कारण - महर्षि पतंजलि के योग दर्शन के अनुसार सर्व बंधनों और दुखों के मूल कारण 5 क्लेश हैं - अविद्या । अस्मिता । राग । द्वेष । और अभिनिवेश । अब इन कारणों को समझते हैं ।
अविद्या - अनित्य में नित्य । अशुद्ध में शुद्ध । दुःख में सुख । अनात्म में आत्म समझना अविद्या है । इस अविद्या रुपी क्षेत्र में ही अन्य चारों कलेशों का जन्म होता है ।

अस्मिता - चित्त जड़ रूप है । और चेतन पुरूष चिति कहा जाता है । इस अविद्या के कारण जड़ चित्त और  चेतन पुरुष चिति में भेद नहीं रहता । यह अविद्या से उत्पन्न हुआ चित्त और चिति में अविवेक अस्मिता कलेश कहलाता है ।
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मानव से महा मानव बनने के लिए - जगत के मिथ्या होने का प्रतिपादन । पिछली पोस्ट में आपने जगत की भृम रूपता के विषय में पढ़ा कि - किस प्रकार यह संसार न होते हुए भी इन्द्रियों के द्वारा दृश्यमान होता है । और अनुभव में आता है । इस प्रकार 1 स्वाभाविक प्रश्न स्वतः ही जन्म ले लेता है कि - फिर यहाँ किया हुआ पाप पुण्य सब अच्छा बुरा आत्मा परमात्मा सब भृम रूप ही हैं ।
परन्तु संसार को मिथ्या समझने पर कर्म विहीनता और पलायन की स्थिति उत्पन्न होगी । जो समाज के लिए हितकर नहीं । भारतीय दर्शन पलायन का नहीं । अपितु कर्म का दर्शन है । ऐसे में महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित शास्त्र और श्रीराम को भगवान बनाने वाला संवाद भला पलायन की अनुमति कैसे दे सकता है ।

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जगत की भृम रूपता - यह जगत संकल्प के निर्माण । मनो राज्य के विलास । इंद्रजाल द्वारा रचित पुष्पहार । कथा कहानी के अर्थ के प्रतिभास । वात रोग के कारण प्रतीत होने वाले भूकंप । बालक को डराने के लिए कल्पित पिशाच । निर्मल आकाश में कल्पित मोतियों के ढेर । नाव के चलने से तथा प्रतीत होने वाली वृक्षों की गति । स्वपन में देखे गए नगर । अन्यत्र देखे गए फूलों के स्मरण से । आकाश से आकाश में कल्पित हुए पुष्प की भांति । भृम द्वारा निर्मित हुआ है । मृत्यु काल में पुरुष स्वयं अपने हृदय में इसका अनुभव करता है ( यहाँ मृत्यु से अभिप्राय शरीरांत नहीं है )
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खरबूजा - चाक़ू । चाक़ू  - खरबूजा । आज देश करवट ले रहा है । नई सोच का वक्त चल रहा है । चिंतन । मनन ।

विचार । विमर्श न जाने और भी क्या क्या हो रहा है । क्या क्या ? से मतलब जानने से पहले । यह समझना अत्यावश्यक है । इतिहास गवाह है । जब भी बड़े अत्याचार का खात्मा हुआ है । बड़े ने अपने स्वयं के अंत से पहले मातहतों का अंत कराया है । रावण । कंस । कौरव । किसी भी वंश के इतिहास को पढ़ लें । लगभग 1 सी कहानी नज़र आयेगी । पुनः लेख की पहली पंक्ति पर आता हूँ । वर्तमान भी ऊहापोह मचा रहा है । वर्तमान " वंश " के कई मातहत भी हवा हवाई हो रहे हैं । हाँ मातहतों की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है ( रावण के कुल जमा 2 भाई और थे । उनमें से भी 1 शरणागत हो गया । परन्तु दुर्योधन के 99 भाई और थे । इनमें से भी 1 ही शरणागत हुआ था ) वर्तमान वंश या यूं कहें - कुनबा । बहुत बहुत बहुत लम्बा है । समय तो लगेगा ही । चिल - पौं भी कुछ ज्यादा भी होगी । होनी भी चाहिए । कुनबा जो बड़ा है । हाँ इनकी ताक झांक से क्षणिक परेशानियां भी आयेंगी । हंसी भी आयेगी । गुस्सा भी आयेगा । रोना सब कुछ होगा । लेकिन याद रखें । रात अंधेरी बाद चांदनी आती है । धूप निकलते देख नींद उड़ जाती है । ध्यान रखें । वर्तमान कुनबे में से कोई " शरणागत " न आ जाय । अभी कई " हिसार " पार करने हैं । कई हरियाणा । बिहार । आंध्र । महाराष्ट्र फतह करने हैं । देखिये फतह तो करने ही पड़ेंगे । क्योंकि साफ़ नज़र आ रहा है कि - वर्तमान कहीं भी सुधरता नहीं दिख रहा । जब बिगाड़ आता है । तो सागर के हिलोरे की तरह सब तरफ एकमेक ही हो जाता है । अब इसमें मीडिया हो । या आम जन । हिलोरे तो 1 जैसे ही लगते हैं । भृमित करना ही तो एकमात्र लक्ष्य है । भृम जाल से निकालना भी " वर्तमान " का ही तो काम है ।

हाँ शीर्षक की बात । चाकू के अवतार में तो हमेशा हमेशा " जनता " ही अवतरित होगी । और खरबूजा रूपी रावण का ही अंत होगा । वैसे कुनबे का सपरिवार जाना न केवल श्रेयकर है । बल्कि भविष्य के लिए हितकर भी है । और ठीक उसी तरह जा भी रहा है । लिखने वाले का नाम -  जुगल किशोर सोमाणी । जयपुर । ईमेल -  jugalkishoresomani@yahoo.co.in
स्थान - जयपुर । समय - Thursday October 20, 2011 2:2
http://www.bharatswabhimantrust.org/bharatswa/DailyBlog.aspx
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मैं खुदा हूँ । इस्लाम और वैदिक अद्वैत वाद ( सूफीवाद के परिपेक्ष्य में )
सूफीवाद में समय समय पर कुछ हिला देने वाले विचारक भी पैदा हुए । जिन्होंने इस्लाम में वैदिक अद्वैत को

पुष्ट करने की कोशिश की । सूफी परम्परा का आरम्भ हसन ( 642-728 ) जो कि बसरा ( इराक ) में हुए । उनके द्वारा हुआ । हसन उम्मया शासकों के खिलाफ थे । और उनकी शान शौकत भरी जीवन शैली से नफ़रत करते थे । हसन के बाद 1 मशहूर नाम अबू हाशिम ( मृत्यु 776 ) का है । जो कूफा ( इराक ) में रहते थे । बायजीद बिस्तामी ( मृत्यु  874 ) ने इस्लामिक नेताओं को । और पैगम्बर के नाम पर मौज करने वालों को खुली चुनौती दे दी । उन्होंने तौहीद Monotheism एकेश्वरवाद को 1 क्रांतिकारी रूप दे दिया । उनके तौहीद के सिद्धांत में प्रेमी और प्रेमिका दोनों 1 हो गए । उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि - इब्राहीम । मूसा । और मुहम्मद मैं हूँ । और जो भी ईश्वर के प्रेम में डूब कर फना ( मिट ) हो गया । वही ईश्वर है । 
इस प्रकार बायजीद ने उपनिषदों के सार को इस्लाम के सम्मुख रखा । परन्तु डरे हुए और लोभी इस्लामिक नेताओं ने उनकी बातों को सिरे से नकार दिया । इस विषय पर कबीर का भी मत है कि - यदि आप उस अलख ( जो दीखता नहीं है ) उसे देखना चाहते हो । तो उसे संतों के रूप में देखो । क्योंकि वह अपने भक्तों के ह्रदय में

बसता है । सबसे अधिक चौंका देने वाला । साहस की सीमायें तोडने वाला । और इस्लामी क़ानून को चुनौती देने वाला । 1 प्रसिद्ध नाम है - हुसैन बिन मनसूर अल-हल्लाज AL-HALLAJ का ।
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वेदों में गूढ़ विज्ञान सम्बन्धी सामग्री विस्तृत मात्रा में संचित है । जिसमें से बहुत ही अल्प मात्रा में अब तक जानकारी हो सकी है । कारण यह है कि वैज्ञानिक सामग्री ऋचाओं में अलंकारिक भाषा में है । जिसका शाब्दिक अर्थ या तो सामान्य सा दिखाई पड़ता है । या वर्तमान सभ्यता के संदर्भ में प्रथम दृष्टतया कुछ तर्क संगत नहीं दिखलाई पड़ता । जबकि उसी पर गहन विचार करनें के पश्चात उसका कुछ अंश जब समझ में आता है । तो बहुत ही आश्चर्य होता है कि - वेद की छोटी छोटी ऋचाओं ( सूत्रों ) के रूप में कितने गूढ़ एवं कितने उच्च स्तर के वैज्ञानिक रहस्य छिपे हुए हैं । कुछ ही समय पूर्व साइंस रिपोर्टर नामक अंग्रेजी पत्रिका जो नेशनल इंस्टीटयूट आफ साइंस कम्युनिकेशन्स एण्ड इन्फार्मेशन रिसोर्सेज NISCAIR /CSIR डा. के. यस. कृष्णन मार्ग नई दिल्ली 110012 द्वारा प्रकाशित हुई थी । में माह मई 2007 के अंक में 1 लेख ANTIMATTER The ultimate fuel के नाम के शीर्षक से छपा था । इस लेख के लेखक श्री डी. पी. सिह एवं सुखमनी कौर ने यह लिखा है कि - सर्वाधिक कीमती वस्तु संसार में - हीरा । यूरेनियम । प्लैटिनम । यहाँ तक कि कोई पदार्थ भी नहीं है । बल्कि अपदार्थ । या प्रति पदार्थ अर्थात ANTIMATTER है । वैज्ञानिकों ने लम्बे समय तक किये गये अनुसंधानों एवं सिद्धांतों के आधार यह माना है कि - बृह्मांड में पदार्थ के साथ साथ अपदार्थ या प्रति पदार्थ भी समान रूप से मौजूद है । इस सम्बन्ध में वेदों में ऋग्वेद के अन्तर्गत नासदीय सूक्त जो संसार

में वैज्ञानिक चिंतन में उच्चतम श्रेणी का माना जाता कि - 1 ऋचा में लिखा है कि -
तम आसीत्तमसा गू हमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम । 
तुच्छेच्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम । ऋग्वेद 10 ।129 ।3
अर्थात सृष्टि से पूर्व प्रलय काल में सम्पूर्ण विश्व मायावी अज्ञान ( अन्धकार ) से ग्रस्त था । सभी अव्यक्त और सर्वत्र 1 ही प्रवाह था । वह चारो ओर से सत असत MATTER AND ANTIMATTER से आच्छादित था । वही 1 अविनाशी तत्व तपश्चर्या के प्रभाव से उत्पन्न हुआ । वेद की उक्त ऋचा से यह स्पष्ट हो जाता है कि - बृह्मांड के प्रारम्भ में सत के साथ साथ असत भी मौजूद था ( सत का अर्थ है पदार्थ )

यह कितने आश्चर्य का विषय है कि - वर्तमान युग में वैज्ञानिकों द्वारा अनुसंधान पर अनुसंधान करने के पश्चात कई वर्षों में यह अनुमान लगाया गया कि - विश्व में पदार्थ एवं अपदार्थ । प्रति पदार्थ Matter and Antimatter समान रूप से उपलब्ध है । जबकि ऋग्वेद में 1 छोटी सी ऋचा में यह वैज्ञानिक सूत्र पहले से ही अंकित है । उक्त लेख में यह भी कहा गया है कि Matter and Antimatter जब पूर्ण रूप से मिल जाते हैं । तो पूर्ण ऊर्जा में बदल जाते है । वेदों में भी यही कहा गया है कि - सत और असत का विलय होने के पश्चात केवल परमात्मा की सत्ता या चेतना बचती है । जिससे कालान्तर में पुनः सृष्टि ( बृह्मांड ) का निर्माण होता है । छान्दोग्योपनषद में भी बृह्म एवं सृष्टि के बारे में यह उल्लेख आता है कि - आदित्य ( केवल वर्तमान अर्थ सूर्य नहीं । बल्कि व्यापक अर्थ में ) बृह्म है । उसी की व्याख्या की जाती है । तत्सदासीत - वह असत शब्द से कहा जाने वाला तत्व । उत्पत्ति से पूर्व स्तब्ध । स्पन्दन रहित । और असत के समान था । सत यानी कार्याभिमुख होकर कुछ प्रवृति पैदा होने से सत हो गया । फिर उसमें भी कुछ स्पन्दन प्राप्त कर वह अकुरित हुआ । वह 1 अण्डे में परणित हो गया । वह कुछ समय पर्यन्त फूटा । वह अण्डे के दोनों खण्ड रजत एवं सुवर्ण रूप हो गये । फिर उससे जो 

उत्पन्न हुआ । वह यह आदित्य है । उससे उत्पन्न होते ही बड़े जोरों का शब्द हुआ । तथा उसी से सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग पैदा हुए हैं । इसी से उसका उदय और अस्त होने पर दीर्घ शब्द युक्त घोष उत्पन्न होते हैं । तथा सम्पूर्ण प्राणी और सारे भोग भी उत्पन्न होते हैं ।
अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्ततं जायमानं घोषा । उलूलवोऽनुदतिष्ठन्त्सर्वाणि च भूतानि सर्वे च । 
कामास्तस्मात्तस्योदयं प्रति प्रत्या यनं प्रति घोषा । उलूलवोऽनुत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामाः ।
छान्दग्योपनिषद शंकर भाष्यार्थ खण्ड 19 । 3 ।
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1 सैल ( कोशिका ) से लेकर पूरा पिण्ड ( शरीर ) व 1-1 परमाणु से लेकर पूरा बृह्माण्ड एनर्जी ( ऊर्जा ) के सिद्धांत पर कार्य करता है । योग । प्राणायाम । ध्यान । यज्ञ । जड़ी बूटियों के सेवन से हमारे भीतर 1 सकारात्मक शक्ति का सृजन होता है । तथा रोग । नशा । समस्त अशुभ विचार । अज्ञान । अविद्या । कलेश । शरीर । इन्द्रियों व मन आदि के सब दोष नष्ट हो जाते हैं । और मानव महा मानव बन जाता है । जैसे मोबायल की बैटरी 30 मिनट में चार्ज होने के बाद । हम पूरा दिन मोबायल पर बात कर सकते हैं । वैसे ही प्रतिदिन - योग । प्राणयाम । ध्यान द्वारा शरीर । मन व आत्मा को चार्ज कर सकते हैं ।
Contact  09717119022 Email - pankajomsatya@gmail.com
Facebook - http://www.facebook.com/pankajomsatya
- सभी जानकारी पंकज सिंह राजपूत के ब्लाग - सत्य की खोज और भारतीय दर्शन.. से साभार । इसी लाइन पर क्लिक करें ।
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