Saturday, 1 March 2014

जिसका ईश्वर तम्बू में हो

केवल ध्यानी ही ईर्ष्या से मुक्त हो सकता है । 1 प्रेमी बनो । यह 1 शुभ प्रारंभ है । लेकिन अंत नहीं । अधिक और अधिक ध्यान मय होने में शक्ति लगाओ । और शीघ्रता करो । क्योंकि संभावना है कि तुम्हारा प्रेम तुम्हारे हनीमून पर ही समाप्त हो जाए । इसलिए ध्यान और प्रेम हाथ में हाथ लिए चलने चाहिए । यदि हम ऐसे जगत का निर्माण कर सकें । जहां प्रेमी ध्यानी भी हो । तब प्रताड़ना, दोषारोपण, ईर्ष्या, हरसंभव मार्ग से एक दूसरे को चोट पहुंचाने की 1 लंबी श्रंखला समाप्त हो जाएगी ।
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दर्पण के सामने खड़े होओ । अपनी आंखों में झांको । तो पता चले कि - भीतर कोई भी नहीं है । जहां तुम विसर्जित हो गए । वहीं निर्वाण है ।
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हमारा जीवन 1 दुर्घटना मात्र है । कब पैदा हुए । कब बड़े हुए । और कब मर गए ? इसका पता ही नहीं चलता । इस यांत्रिक और संताप से ग्रस्त यात्रा में हम जिन्हें महत्व देते हैं । वे हमारे तथाकथित 2 कोड़ी के विचार, भावनाएं और एक दूसरे को धोखा देने और खाने की प्रवृत्ति तथा अंधी दौड़ । स्वयं को महान समझना अच्छी बात है । लेकिन मुगालते पालना अच्छी बात नहीं । ओशो
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1 दिन ढब्बूजी केक खरीदने के लिए बाजार गए । मुश्किल से उन्होंने 1 केक पसंद किया । बेकरी का कर्मचारी बोला - हां तो ढब्बूजी ! आप केक कटा हुआ चाहेंगे । या पूरा ? कटा हुआ । ढब्बूजी ने कहा । कितने टुकड़े करूं । 4 या 8 ? 4 ही करो जी । 8 टुकड़े खाना जरा मुश्किल होता है ।
1 अध्यापक ने गीता के द्वंद्व शब्द की व्याख्या समझाते हुए कहा - द्वंद्व, ऐसे जोड़े को कहते हैं । जिसमें हमेशा विरोध रहता है । जैसे सुख-दुख । सर्दी-गर्मी । और धूप-छांव आदि आदि । अब तुममें से क्या कोई छात्र इसका उदाहरण दे सकता है ? 1 छात्र ने तपाक से बोला - जैसे पति-पत्नी ।
मुन्ना स्कूल जा रहा था । ढब्बूजी ने देखा । उसने बस्ता भी उठा रखा है । और सीढ़ी भी । उन्हें बड़ी हैरानी हुई । मुन्ने से पूछने लगे - यह सीढ़ी लेकर किधर जा रहे हो । साहब ? पापाजी, मास्टरजी ने कहा है कि मैं इम्तिहान में पास हो गया हूं । और आज से ऊपर की क्लास में बैठूंगा । मुन्ने ने जवाब दिया ।
ढब्बूजी रसोई में बैठे थे । चूल्हे पर रखा दूध उबल उबलकर बरतन से बाहर उफन रहा था । श्रीमती ढब्बूजी गुस्से में फनफनाती हुई रसोई में दाखिल हुईं । और बोलीं - क्या मैंने आपसे यह नहीं कहा था कि दूध उबलने के समय का खयाल रखना ? हां, कहा था । दूध ठीक 12 बजकर 12 मिनट पर उबला है । ढब्बूजी ने कलाई पर बंधी घड़ी दिखाते हुए कहा ।
पति - अरे, सुनती हो । डाक्टर का कहना है कि अधिक बोलने से उम्र काफी कम हो जाती है । पत्नी ने मुस्कुराकर कहा - अब तो तुमको विश्वास हो गया न कि मेरी उम्र 45 से घटकर 25 कैसे हो गयी ।
राह चलते 1 व्यक्ति की पीठ पर जोर से धौल जमाते हुए ढब्बूजी बोले -अरे चंदूलाल ! कैसे हो ? उफ ! मैं...मैं...मैं...चंदूलाल नहीं हूं ।  वह व्यक्ति कराहकर पलटा । और आंखें फाड़ फाड़कर देखते हुआ बोला - अगर होता भी । तो इतने जोर से कोई मारता है । मैं चंदूलाल को कितने भी जोर से मारूं । तुमसे मतलब । ढब्बूजी बोले ।
2 मंत्री हेलीकाप्टर में बैठे बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का दौरा कर रहे थे । पहला मंत्री बोला - यदि मैं यहां 50 रुपए का नोट फेंक दूं । तो लोग कितने खुश होंगे ? दूसरा मंत्री बोला - यदि मैं यहां 100 रुपए का नोट फेंक दूं । तो लोग और भी खुश हो जाएंगे । उन दोनों की बेतुकी बातें सुनकर पायलट चुप न रह सका । वह झल्लाकर बोला - यदि मैं आप दोनों को उठाकर नीचे फेंक दूं । तो लोग सबसे ज्यादा खुश होंगे ।
1 बजाज की दुकान में आग लग गई । ढब्बूजी उसके मालिक से सांत्वना प्रकट करने गए । बोले - आपकी साडि़यों की दुकान जल जाने से आपको काफी नुकसान हुआ होगा । जी नहीं । सिर्फ आधा ही नुकसान हुआ । दुकानदार ने कहा । वह कैसे ? सेल के कारण साडि़यों पर 50% की छूट मिल रही थी । 
रात हो चुकी थी । श्रीमती ढब्बूजी बेलन लिये द्वार पर ही बैठी थीं । ढब्बूजी आए । तो दहाड़कर बोलीं - आज फिर देर से लौटे । कहां गए थे, महाशय ? देखो - ढब्बूजी ने संयत स्वर में कहा - 1 समझदार पत्नी अपने पति से कभी भी ऐसा सवाल नहीं करती । और 1 समझदार पति ? श्रीमतीजी ने गुस्से में पूछा - अब छोड़ो भी । ढब्बूजी बोले - समझदार पति की तो पत्नी ही नहीं होती ।
मुल्ला नसरुद्दीन अपने डॉक्टर के पास आया । और बोला - डॉक्टर, मेरी पत्नी 3 दिन से बिल्कुल चुप बैठी है । कुछ बोल नहीं रही । डॉक्टर बोला - मियां, आप मेरे पास क्यों आए । गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड वालों के पास जाओ ।
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हर पीर फकीर है कोठी में । और राम हमारे तम्बू में ।
आखिर अब तक क्यों प्राण तुम्हारे । हरे नहीं शिव शंभू ने ?
दशरथ की छाती फटती होगी । अपने लाल की हालत पर ।
हनुमान की शक्ति हार गयी । एक कुर्सी की चाहत पर ।
100 करोड़ की जनसंख्या । क्या बस भेड़ बकरियों जैसी है ?
ब्रह्मा को भी विश्वास न होगा । उनकी दुनियां अब ऐसी है ।
लक्ष्मण के प्रतिशोध की ज्वाला । आखिर क्या सह लोगे तुम ।
महादेव के महा कोप को । क्या खाकर झेलोगे तुम ?
तुम शीशे में खुद को देखो । और कहो कि - तुम पापी हो ।
जिसका ईश्वर तम्बू में हो । उस धर्म को कैसे माफ़ी हो ।
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MIND is rubbish ! It is not that you have rubbish and somebody else hasn’t. It is rubbish, and if you go on bringing rubbish out, you can go on and on; you can never bring it to a point where it ends. It is self-perpetuating rubbish, so it is not dead, it is dynamic. It grows and has a life of its own. So if you cut it, leaves will sprout again.
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