Friday, 7 March 2014

आपको कांटा कोई लग जाय

नाभि का खिसकना - योग में नाड़ियों की संख्या 72 000 से ज्यादा बताई गई है । और इसका मूल उदगम स्रोत नाभि स्थान है । आधुनिक जीवन शैली इस प्रकार की है कि भागदौड़ के साथ तनाव दबाव भरे प्रतिस्पर्धा पूर्ण वातावरण में काम करते रहने से व्यक्ति का नाभि चक्र निरंतर क्षुब्ध बना रहता है । इससे नाभि अव्यवस्थित हो जाती है । इसके अलावा खेलने के दौरान उछलने कूदने, असावधानी से दाएँ बाएँ झुकने, दोनों हाथों से या 1 हाथ से अचानक भारी बोझ उठाने, तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ने उतरने, सड़क पर चलते हुए गड्ढे, में अचानक पैर चले जाने या अन्य कारणों से किसी 1 पैर पर भार पड़ने या झटका लगने
से नाभि इधर उधर हो जाती है । कुछ लोगों की नाभि अनेक कारणों से बचपन में ही विकार ग्रस्त हो जाती है ।
- प्रातः खाली पेट ज़मीन पर शवासन में लेटें । फिर अंगूठे के पोर से नाभि में स्पंदन को महसूस करे । अगर यह नाभि में ही है । तो सही है । कई बार यह स्पंदन नाभि से थोड़ा हटकर महसूस होता है । जिसे नाभि टलना या खिसकना कहते हैं । यह अनुभव है कि आमतौर पर पुरुषों की नाभि बाईं ओर तथा स्त्रियों की नाभि दाईं ओर टला करती है ।
- नाभि में लंबे समय तक अव्यवस्था चलती रहती है । तो उदर विकार के अलावा व्यक्ति के दांतों, नेत्रों व बालों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है । दाँतों की स्वाभाविक चमक कम होने लगती है । यदा कदा दांतों में पीड़ा होने लगती है । नेत्रों की सुंदरता व ज्योति क्षीण होने लगती है । बाल असमय सफेद होने लगते हैं । आलस्य, थकान, चिड़चिड़ाहट, काम में मन न लगना, दुश्चिंता, निराशा, अकारण भय जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों की उपस्थिति नाभि चक्र की अव्यवस्था की उपज
होती है ।
- नाभि स्पंदन से रोग की पहचान का उल्लेख हमें हमारे आयुर्वेद व प्राकृतिक उपचार चिकित्सा पद्धतियों में मिल जाता है । परंतु इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम हमारी अमूल्य धरोहर को न संभाल सके । यदि नाभि का स्पंदन ऊपर की तरफ चल रहा है । याने छाती की तरफ तो अग्नाशय खराब होने लगता है । इससे फेफड़ों पर गलत प्रभाव होता है । मधुमेह, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ होने लगती हैं ।
- यदि यह स्पंदन नीचे की तरफ चली जाए । तो पतले दस्त होने
लगते हैं ।
- बाईं ओर खिसकने से शीतलता की कमी होने लगती है । सर्दी जुकाम, खाँसी, कफजनित रोग जल्दी जल्दी होते हैं ।
- दाहिनी तरफ हटने पर लीवर खराब होकर मंदाग्नि हो सकती है ।
पित्ताधिक्य, एसिड, जलन आदि की शिकायतें होने लगती हैं । इससे सूर्य चक्र निष्प्रभावी हो जाता है । गर्मी सर्दी का संतुलन शरीर में बिगड़ जाता है । मंदाग्नि, अपच, अफरा जैसी बीमारियां होने लगती हैं ।
- यदि नाभि पेट के ऊपर की तरफ आ जाए । यानी रीढ़ के विपरीत ।
तो मोटापा हो जाता है । वायु विकार हो जाता है । यदि नाभि नीचे
की ओर ( रीढ़ की हड्डी की तरफ ) चली जाए । तो व्यक्ति कुछ भी खाए । वह दुबला होता चला जाएगा । नाभि के खिसकने से मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताएँ कम हो जाती हैं ।
- नाभि को पाताल लोक भी कहा गया है । कहते हैं । मृत्यु के बाद भी प्राण नाभि में 6 मिनट तक रहते है ।
- यदि नाभि ठीक मध्यमा स्तर के बीच में चलती है । तब स्त्रियाँ गर्भ धारण योग्य होती हैं । यदि यही मध्यमा स्तर से खिसक कर नीचे रीढ़ की तरफ चली जाए । तो ऐसी स्त्रियाँ गर्भ धारण नहीं कर सकतीं ।
- अक्सर यदि नाभि बिलकुल नीचे रीढ़ की तरफ चली जाती है ।
तो फैलोपियन ट्यूब नहीं खुलती । और इस कारण स्त्रियाँ गर्भधारण नहीं कर सकतीं । कई वंध्या स्त्रियों पर प्रयोग कर नाभि को मध्यमा स्तर पर लाया गया । इससे वंध्या स्त्रियाँ भी गर्भधारण योग्य हो गईं । कुछ मामलों में उपचार वर्षों से चल रहा था । एवं चिकित्सकों ने यह कह
दिया था कि यह गर्भधारण नहीं कर सकती । किन्तु नाभि चिकित्सा के जानकारों ने इलाज किया ।
- दोनों हथेलियों को आपस में मिलाएं । हथेली के बीच की रेखा मिलने के बाद जो उंगली छोटी हो । यानी कि बाएं हाथ की उंगली छोटी है । तो बायीं हाथ को कोहनी से ऊपर दाएं हाथ से पकड़ लें । इसके बाद बाएं हाथ की मुठ्ठी को कसकर बंद कर हाथ को झटके से कंधे की ओर लाएं । ऐसा 8-10 बार करें । इससे नाभि सेट हो जाएगी ।
- पादांगुष्ठनासास्पर्शासन उत्तानपादासन, नौकासन, कन्धरासन, चक्रासन, धनुरासन आदि योगासनों से नाभि सही जगह आ सकती है ।
- 15 से 25 मिनट वायु मुद्रा करने से भी लाभ होता है ।
- 2 चम्मच पिसी सौंफ, ग़ुड में मिलाकर 1 सप्ताह तक रोज खाने से नाभि का अपनी जगह से खिसकना रुक जाता है ।
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आयुर्वेदिक दोहे
जहाँ कहीं भी आपको । कांटा कोई लग जाय । 
दूधी पीस लगाईये । कांटा बाहर आय । 
मिश्री कत्था तनिक सा । चूसें मुँह में डाल ।
मुँह में छाले हों अगर । दूर होय तत्काल । 
पोदीना औ इलायची । लीजै दो-दो ग्राम । 
खायें उसे उबाल कर । उल्टी से आराम ।
छिलका लेय इलायची । दो या तीन ग्राम । 
सिर दर्द मुँह सूजना । लगा होय आराम ।
अण्डी पत्ता वृंत पर । चूना तनिक मिलाय ।
बारबार तिल पर घिसे । तिल बाहर आ जाय ।
गाजर का रस पीजिये । आवश्कतानुसार ।
सभी जगह उपलब्ध यह । दूर करे अतिसार ।
खट्टा दामिड़ रस दही । गाजर शाक पकाय ।
दूर करेगा अर्श को । जो भी इसको खाय ।
रस अनार की कली का । नाक बूंद दो डाल ।
खून बहे जो नाक से । बंद होय तत्काल ।
भून मुनक्का शुद्ध घी । सैंधा नमक मिलाय ।
चक्कर आना बंद हों । जो भी इसको खाय ।
मूली की शाखों का रस । ले निकाल सौ ग्राम ।
तीन बार दिन में पियें । पथरी से आराम ।
दो चम्मच रस प्याज की । मिश्री संग पी जाय ।
पथरी केवल बीस दिन । में गल बाहर जाय ।
आधा कप अंगूर रस । केसर जरा मिलाय ।
पथरी से आराम हो । रोगी प्रतिदिन खाय ।
सदा करेला रस । पिये सुबह औ शाम । 
दो चम्मच की मात्रा । पथरी से आराम । 
एक डेढ़ अनुपात कप । पालक रस चौलाइ । 
चीनी सँग लें बीस दिन । पथरी दे न दिखाइ ।
खीरे का रस लीजिये । कुछ दिन तीस ग्राम । 
लगातार सेवन करें । पथरी से आराम ।
बैगन भुर्ता बीज बिन । पन्द्रह दिन गर खाय ।
गल गल करके आपकी । पथरी बाहर आय ।
लेकर कुलथी दाल को । पतली मगर बनाय ।
इसको नियमित खाय तो । पथरी बाहर आय ।
दामिड़ ( अनार) छिलका सुखाकर । पीसे चूर बनाय ।
सुबह शाम जल डाल कम । पी मुँह बदबू जाय ।
चूना घी और शहद को । ले सम भाग मिलाय ।
बिच्छू को विष दूर हो । इसको यदि लगाय ।
गरम नीर को कीजिये । उसमें शहद मिलाय ।
तीन बार दिन लीजिये । तो जुकाम मिट जाय ।
अदरक रस मधु ( शहद ) भाग सम । करें अगर उपयोग ।
दूर आपसे होयगा । कफ औ खाँसी रोग ।
ताजे तुलसी पत्र का । पीजे रस दस ग्राम ।
पेट दर्द से पायँगे । कुछ पल का आराम ।
बहुत सहज उपचार है । यदि आग जल जाय । 
मींगी पीस कपास की । फौरन जले लगाय ।
रुई जलाकर भस्म कर । वहाँ करें भुरकाव । 
जल्दी ही आराम हो । होय जहाँ पर घाव ।
नीम पत्र के चूर्ण में । अजवायन इक ग्राम । 
गुण संग पीजै पेट के । कीड़ों से आराम ।
दो दो चम्मच शहद औ । रस ले नीम का पात ।
रोग पीलिया दूर हो । उठे पिये जो प्रात ।
मिश्री के संग पीजिये । रस ये पत्ते नीम ।
पेंचिश के ये रोग में । काम न कोई हकीम ।
हरड बहेडा आँवला । चौथी नीम गिलोय ।
पंचम जीरा डालकर । सुमिरन काया होय ।
सावन में गुड खावै । सो मौहर बराबर पावै ।
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चिकित्सा पद्धतियां
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चरक संहिता

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