Thursday, 29 September 2011

हर अक्स को खुद में समा लूँ । उस दर्पण की तरह हूँ मैं - कनु

बङी अजीव चीज है । ये ब्लागिंग भी । फ़िर मुझे तो ये किसी लाइब्रेरी । किसी मूबी । किसी बुक । किसी प्रत्यक्ष मेलजोल से बढकर लगती है । कभी मन नहीं लगता । तब कोई ब्लाग खोलता हूँ । फ़िर टिप्पणी प्रोफ़ायल से कभी इस ब्लाग कभी उस ब्लाग एक उदासीन सैर सपाटा सा होता है । तब ऐसे लम्हों में कोई ब्लाग अचानक आकर्षित करता है । फ़िर हम उसे पढते ही चले जाते हैं । नये विचार । नयी भावनायें । तब इससे आगे जिज्ञासा होती है । उस ब्लागर इंसान को जानने की । पूरी साफ़गोई से कहूँ । तो मेरे साथ यही होता है ।  इसीलिये मैंने ब्लागिंग को सबसे अजीव कहा है । क्योंकि हम दूसरे को जान रहे होते हैं । और तब वह हमसे अनभिज्ञ होता है । अब अजीव वाली बात यूँ है कि तुरन्त ही हम कमेंट या मेल से अपनी भावना विचार शेयर कर सकते हैं । हालांकि सोशल नेटवर्किंग की फ़ेसबुक जैसी साइटों पर भी ये संभव है । पर वहाँ ब्लाग की तरह विस्त्रत विचार नहीं हो सकते । अपने ऐसे ही सफ़र में मेरी अप्रत्यक्ष मुलाकात दिलचस्प कनु जी से हुयी ।
और ये है कनु जी का परिचय -
भोपाल । मध्यप्रदेश । भारत की रहने वालीं और मुम्बई से भी संबन्धित कनु जी की सरलता का क्या कहना । एकदम सादगी से सरल और साफ़ शब्दों में ऐसी बात । जो सीधी किसी के भी दिल को छू जाये । वास्तव में मुझे लगता है । कविता कभी लिखी नहीं जा सकती । ये जब निकलती है । दिल की भावनाओं को सुन्दर शब्दों द्वारा मूर्त रूप देती हुयी निकलती है । और किसी भी व्यक्तित्व के आंतरिक स्वरूप का साकार चित्रण करती हैं । कनु जी अपने वारे में कहती हैं - क्या 


लिखूँ । अपने विषय में । शब्द कैसे मैं चुनूँ ? मैं कनु....।  कुछ वर्षों पहले कॉलेज की रेगिंग में ये अपने बारे में कविता लिखने को बोला गया था । और तभी ये मेरी कविता की पहली पंक्ति थी । और आज भी यही आलम है । क्या लिखूँ ? लिखने का शौक है मुझे । और इसी शौक ने मुझे ब्लॉग लिखने के लिए प्रेरित किया । जब जब मन करता है । अपने मन के कोने से कुछ भावनाओं को यहाँ उकेर देती हूँ । शब्दों की चित्रकारी से प्यार है मुझे । पर अभी मेरे शब्द चित्रकारी जैसे दिल को लगने वाले नहीं बन पड़ते । बस इसी अनंत प्रयास में हूँ कि कुछ अच्छा पढने लायक लिख सकूँ । इनके ब्लाग -  पोरवाल चौपाल । परवाज
और ये पढिये । कनु जी की पहली कविता । जिसमें सादगी और सरलता की खुशबू आपको भी निसंदेह महसूस होगी ।
मैं क्या हूँ ? बस कनु हूँ ।
बहते हुये सागर की लहर की तरह हूँ । मस्ताने से मौसम में सहर की तरह हूँ ।
जितना दर्द दोगे उतनी ज्यादा महकूँगी । फ़ूलों के बिखरे हुये परिमल की तरह हूँ ।
जिन्दगी में नये नये दौर से गुजरकर । हर मोङ पर जैसे किसी पत्थर की तरह हूँ ।
अपनी खूबियों और खामियों के हिसाब से ही पाओगे मुझसे ।
सागर मंथन में निकले अमृत और गरल की तरह हूँ मैं ।
खुद का चेहरा मुझमें देखना चाहो तो देख लो । हर अक्स को खुद में समा लूँ । उस दर्पण की तरह हूँ मैं ।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Follow by Email