Monday, 26 September 2011

विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख छिपा होता है - लीना मल्होत्रा

मैं अपने जीवन में बहुत कम महिलाओं से प्रभावित हुआ हूँ । जहाँ मुझे महिलाओं का खामखाह की झाँसी की रानी बन जाना भी रुचिकर नहीं लगता । वहीं उनका अवला या दुखियारी रूप कतई नापसन्द है । इसके बजाय परिस्थितियों से जूझती हुयी पुरुष के झूठे अहम को टक्कर देकर चूर चूर करती हुयी हौसलामन्द नारी मुझे हमेशा विभिन्न रूपों में आकर्षित करती रही है । लीना जी ( मल्होत्रा ) उन्हीं में से एक हैं । इनकी एक ही कविता मानों सभी पुरुषों को चुनौती दे रही हैं । और ये सर्वकालिक है । यानी ये चुनौती सतयुग त्रेता द्वापर कलियुग में समान रूप से एक नारी के स्तर से उसकी आवाज है । जो कर्तव्य से भागे हुये मिथ्या अभिमानी पुरुषों को ललकार रही है ।  और सदियों से नारी स्वाभिमान की अखण्ड मशाल जलाये खङी है । ये कविता स्त्री पुरुष दोनों के लिये सबक है । जिन्दगी की शिक्षा है । बस और क्या कहूँ । ये कविता स्वयँ ही बहुत कुछ कह रही है । आप भी पढिये -
ओह बहुरूपिये पुरुष ! पति । एक दिन । तुम्हारा ही अनुगमन करते हुए । मैं उन घटाटोप अँधेरे रास्तो पर भटक गई । निष्ठा के गहरे गहवर  में छिपे आकर्षण के सांप ने मुझे भी डस लिया था । उसके  विष का गुणधर्म  वैसा ही था । जो पति पत्नी के बीच विरक्ति पैदा कर दे । इतनी । कि दोनों एक दूसरे के मरने की कामना करने लगें । तभी जान पाई मै कि क्या अर्थ होता है ज़ायका बदल लेने का । और विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख 


छिपा होता है । और तुम क्यों और कहाँ चले जाते हो बार बार मुझे छोड़कर
मैं तुम्हारे बच्चो की माँ थी । कुल बढ़ाने वाली बेल । और अर्धांगिनी । तुम लौट आये भीगे नैनों से हाथ जोड़ खड़े रहे द्वार । तुम जानते थे तुम्हारा लौटना मेरे लिए वरदान होगा । और मैं इसी की प्रतीक्षा में खड़ी मिलूँगी । मेरे और तुम्हारे बीच । फन फैलाये खड़ा था कालिया नाग । और इस बार । मैं चख चुकी थी स्वाद उसके विष का । यह जानने के  बाद ।
तुम । थे पशु । मैं वैश्या दुराचारिणी । ओ प्रेमी !
भटकते हुए जब मैं पहुंची तुम्हारे द्वार । तुमने फेंका फंदा । वृन्दावन की संकरी  गलियों के मोहपाश का । जिनकी आत्मीयता में  खोकर । मैंने  सपनो के  निधिवन को बस जाने दिया था घर की देहरी के बाहर । गर्वीली नई  धरती पर प्यार  की  फसलों का वैभव  फूट रहा था । तुमने कहा । राधा ! राधा ही  हो तुम । और । प्रेम पाप नही । जब जब । पति से प्रेमी बनता है  पुरुष । पाप पुन्य की परिभाषा बदल जाती है । देह आत्मा । और । स्त्री । वैश्या से राधा बन जाती है ।.. लीना मल्होत्रा ।
और ये है । लीना जी का परिचय -
हौजखास । दिल्ली । भारत में रह रही सरकारी नौकरी में सेवारत लीना मल्होत्रा जी का खास और बेबाक अन्दाज है । उनकी कविताओं में कल्पनाओं की मधुर उङान नहीं । बल्कि भोगा हुआ यथार्थ है । जो मानवीय दैहिक रिश्तों स्त्री पुरुष के सम्बन्धों में पैदा हुयी तल्खी का सटीक सचित्र

अहसास कराता है । देखिये इन मार्मिक पंक्तियों को - तभी जान पाई मै कि क्या अर्थ होता है ज़ायका बदल लेने का । और विवाह के बाद के प्रेम में कितना सुख छिपा होता है ।.. वैसे अक्सर मैं ब्लागर कवियों कवियित्रियों की कविता झेल नहीं पाता । और कविता में मेरी विशेष रुचि नहीं है । पर लीना जी की इस कविता को मैंने तीन बार पढा । ऐसा लगा । एक स्त्री को अवला का झूठा बनाबटी चोला । जो उसे जबरन पहनाया गया है को उतारकर एक चुनौती सी देती हुयी झूठे अहंकारी पुरुष को उसकी असली औकात बता रही हो । वास्तव में लीना जी की अभिव्यक्ति लाजबाब है । लीना जी अपने बारे में कहती हैं - संवेदनायें ही मेरी धरोहर हैं । और कविता मेरे लिए कोई चर्चा का विषय नहीं । बल्कि अनुभूतियाँ हैं । जो मेरी रूह में बसती हैं । इनका ब्लाग - अस्मिता
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