Sunday, 22 April 2012

वो आदमी के भेष में शैतान था हम समझे कि भगवान था

अब न आना इस तरफ उसने कहा था । और किसकी ओर मैं उंगली उठाता । मेरा साया ही मेरे पीछे पड़ा था । उमृ भर जिसके लिए तड़पा हूं गौतम । दो घडी पहलू में आ जाता तो क्या था । जी हाँ ! ये कहना है इनका । इनका शुभ नाम है - देवेन्द्र गौतम । और इनकी industry है - Communications or Media और इनका Occupation है -  journalism और इनकी Location है - ranchi, jharkhand, India देवेन्द्र जी अपने Introduction में कहते हैं - I have been just like a pendulum between creative writing and journalism since three decades. Thats all. और इनका Interests है - art  culture  literature, current events etc और इनकी Favourite Films हैं - guide, three idots, मेरा नाम जोकर, रजनीगंधा etc और इनका Favourite Music है - semi classical और इनकी Favourite Books हैं - वोल्गा से गंगा । राग दरबारी । चन्द्रकांता संतति etc. और इनके ब्लाग हैं - अरे भाई साधो । किताबों की दुनियाँ गजल गंगा । इनके ब्लाग पर जाने हेतु इन्हीं ब्लाग नाम पर क्लिक करें ।
देवेन्द्र जी की कुछ और रचनाओं को पढिये -
जाने किस उम्मीद के दर पे खड़ा था । बन्द दरवाज़े को दस्तक दे रहा था ।


कोई मंजिल थी  न कोई रास्ता था । उमृ भर यूं ही भटकता फिर रहा था ।
वो सितारों का चलन बतला रहे थे । मैं हथेली की लकीरों से खफा था ।
मेरे अंदर एक सुनामी उठ रही थी । फिर ज़मीं की तह में कोई ज़लज़ला था ।
इसलिए मैं लौटकर वापस न आया । अब न आना इस तरफ उसने कहा था ।
और किसकी ओर मैं उंगली उठाता । मेरा साया ही मेरे पीछे पड़ा था ।
हमने देखा था उसे सूली पे चढ़ते । झूठ की नगरी में जो सच बोलता था ।
उमृ भर जिसके लिए तड़पा हूं गौतम । दो घडी पहलू में आ जाता तो क्या था ।
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ख्वाहिशों के जिस्मो जां की । गिर्दाबे खौफ दिल की नदी से ।
आदमी के भेष में शैतान था । मेरी छत पर देर तक ।
खता क्या है मेरी इतना बता दे । फिर इसके बाद जो चाहे सजा दे ।
अगर जिन्दा हूँ तो जीने दे मुझको । अगर मुर्दा हूं तो कांधा लगा दे ।


हरेक जानिब है चट्टानों का घेरा । निकलने का कोई तो रास्ता दे ।
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ज़मीं से दूर..बहुत दूर । गिर्दाबे खौफ दिल की नदी से ।
ज़मीं की खाक में । हिसारे जां में सिमटा हूं मैं अब ।
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आदमी के भेष में शैतान था । हम समझते थे कि वो भगवान था ।
एक इक अक्षर का उसको ज्ञान था । उसके घर में वेद था  कुरआन था ।
सख्त था बाहर की दुनिया का सफ़र । घर की चौखट लांघना आसान था ।
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ग़मों के मोड़ पे वो बेक़रार । ख्वाहिशों के जिस्मो जां की ।

खून में डूबे हुए थे रास्ते सब इस नगर के । कैसे कैसे ख्वाब इन आंखों में ।
( एक ऐसे बच्चे के नाम जिसे छह माह पहले उसकी मां एक नर्सिंग होम में जन्म देकर फरार हो गयी थी । और जो बहुरूपिया ब्लॉग के संचालक पवन श्रीवास्तव के घर पर पल रहा है । पवन जी के भाई अशोक मानव ने उसे गोद लिया है )
अपने पाओं पे खड़ा होने दो । घर का बच्चा है  बड़ा होने दो ।
प्यास दुनिया की ये बुझाएगा । कच्ची मिटटी है घड़ा होने दो ।
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एक कत्ता । ज़मीं से दूर..बहुत दूर ।
हिसारे जां में सिमटा हूं मैं अब । ज़ख्म यादों का ।
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सिलसिले इस पार से उस पार थे । हम नदी थे या नदी की धार थे ?
क्या हवेली की बुलंदी ढूंढ़ते । हम सभी ढहती हुई दीवार थे ।

उसके चेहरे पर मुखौटे थे बहुत । मेरे अंदर भी कई किरदार थे ।
मैं अकेला तो नहीं था शहर में । मेरे जैसे और भी दो चार थे ।
खौफ दरिया का न तूफानों का था । नाव के अंदर कई पतवार थे ।
तुम इबारत थे पुराने दौर के । हम बदलते वक़्त के अखबार थे ।
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सिलसिला रुक जाये शायद । ग़मों के मोड़ पे वो बेक़रार ।
ज़मीं से दूर..बहुत दूर । हर मुसाफिर जुस्तजू की ।
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खून में डूबे हुए थे रास्ते सब इस नगर के । हम जो गलियों में छुपे थे घाट के थे और न घर के ।
ठीक था सब कुछ यहाँ तो लोग अपनी हांकते थे । खतरा मंडराने लगा तो चल दिए इक एक कर के ।
हादसा जब कोई गुज़रा या लुटा जब चैन दिल का । मैनें समझा कोई रावण ले गया सीता को हर के ।
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ग़मों के मोड़ पे वो बेक़रार । कैसे कैसे ख्वाब इन आंखों में ।
ख्वाहिशों के जिस्मो जां की । ज़मीं की खाक में ।
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नज़र के सामने जो कुछ है अब सिमट जाये । ग़मों की धुंध जो छाई हुई है छंट जाये ।
कुछ ऐसे ख्वाब दिखाओ कि रात कट जाये । गर आसमान न टूटे ज़मीं ही फट जाये ।
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हिसारे जां में सिमटा हूं मैं अब । ख्वाहिशों के जिस्मो जां की ।
ज़रूरत हर किसी की । ज़ख्म यादों का ।
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तमन्नाओं की नगरी को कहीं फिर से बसा लूंगा । यही दस्तूरे दुनिया है तो खुद को बेच डालूंगा ।
तुझे खंदक में जाने से मैं रोकूंगा नहीं लेकिन । जहां तक तू संभल पाए वहां तक तो संभालूंगा ।
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खून में डूबे हुए थे रास्ते सब इस नगर के । गिर्दाबे खौफ दिल की नदी से ।
ख्वाहिशों के जिस्मो जां की । ज़रूरत हर किसी की ।
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अपनी अपनी जिद पे अड़े थे । इसीलिए हम मिल न सके थे ।
एक अजायब घर था जिसमें । कुछ अंधे थे  कुछ बहरे थे ।
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सिलसिले इस पार से उस पार थे । आदमी के भेष में शैतान था ।
ग़मों के मोड़ पे वो बेक़रार । ख्वाहिशों के जिस्मो जां की ।
अब नहीं सूरते हालात बदलने वाली । फिर घनी हो गयी जो रात थी ढलने वाली ।
अपने अहसास को शोलों से बचाते क्यों हो । कागज़ी वक़्त की हर चीज है जलने वाली ।

- सभी जानकारी और देवेन्द्र जी का चित्र उनके ब्लाग से साभार । देवेन्द्र जी के ब्लाग पर जाने हेतु इसी लाइन पर क्लिक करें ।
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