Wednesday, 19 September 2012

मेरे 2 बङे गुनाह - शाहजहाँ की कैद और सरमद का क़त्ल


किसी जंगल में 1 लोमड़ी रहती थी । जो बहुत ही धूर्त और चालाक थी । जंगल के छोटे मोटे जानवरों को वह अपनी मीठी बातों में फंसा कर उन पर शिकार करने का प्रयत्न करती । कभी कभी तो उसकी चालाकी समझकर कुछ जानवर भाग निकलते । और कभी कभी कुछ बेचारे उसका शिकार बनते । 1 दिन 1 गदहा कहीं से घूमता फिरता उस जंगल में पहुँचा । लोमड़ी ने सोचा कि - कहीं ऐसा न हो । यह गदहा जंगल के छोटे मोटे जानवरों को मेरी चालाकियाँ समझा दे । तो हम कहीं के भी नहीं रहेंगे । अतः उसने सोचा कि - क्यों न गदहा से भी दोस्ती का हाथ बढ़ा कर फिर उसका शिकार कर दिया जाय । वह बहुत ही विनमृ भाव में बोली - भाई तुम्हारा नाम क्या है ? और कहाँ से । और किस प्रयोजन से यहाँ आना हुआ ? गदहे ने अपना परिचय बता दिया । लोमड़ी ने कहा - बड़ा अच्छा हुआ । तुम आ गए । अब हम तुम 1 मित्र की भांति रहेंगे । गधा बिचारा सीधा सादा था । उसे छल प्रपंच की बातें आती नहीं थी । वह क्या समझता कि - लोमड़ी के मन में क्या पक रहा है ? 
1 दिन लोमड़ी कुछ उदास होकर बैठी । गदहे ने उसे चिन्तित देखा । तो पूछा - लोमड़ी बहन ! तुम इतनी उदास क्यों हो ? लोमड़ी ने और भी उदास मुद्रा बनाकर कहा - क्या बताऊं भाई !  मैंने 1 पाप किया है । उसी की याद करके मुझे पश्चाताप हो रहा है ।

लोमड़ी ने आंखों में आंसू भरकर कहा - कुछ दिन पहले मैं और मेरा लोमड़ सुख से रहते थे । 1 दिन हम दोनों में 1 बात को लेकर बड़ी जोर से झगड़ा हो गया । लोमड़ क्रोध में घर से बाहर निकल गया । कुछ देर तो मैं घर में रही । मैंने सोचा कि क्रोध शांत होने पर लोमड़ घर लौट आएगा । किंतु वह तो नहीं लौटा । लेकिन शेर की दहाड़ सुनाई पड़ने लगी । मैं भाग कर गई कि - कहीं शेर मेरे लोमड़ को मार न डाले । किंतु मेरे जाते जाते शेर मेरे लोमड़ का शिकार कर चुका था । मुझे भी घर जाने की इच्छा नहीं हुई । तब से मैं यहीं पड़ी रहती हूँ । इतना कहकर लोमड़ी रोने लगी । मैं यही सोचती हूँ कि - मैंने लड़ाई क्यों की ? गदहे ने उसकी बातों पर विश्वास कर लिया । और बोला - मत दुखी हो बहन । गलती हो ही जाया करती है । तुमने जान बूझ कर तो कुछ किया नहीं ।
लोमड़ी ने कहा – भाई ! तुमने भी कोई पाप किया है कभी । तो मुझे बताओ ।
गदहे ने कहा – हाँ बहन ! 1 बार मुझसे भी गलती हो गई थी । मैं भी 1 धोबी का नौकर था । धोबी रोज कपड़ों की लादी मुझ पर लादता था । और घर से घाट । और घाट से घर ले जाया करता था । उसके एवज में मुझे घांस पानी मिलता था । 1 दिन धोबी के लड़के ने मुझ पर लादी लाद दी । और खुद भी बैठकर चला घात की ओर । उस दिन मेरी इच्छा चलने की नहीं हो

रही थी । मैं अड़ गया । लड़के ने पुचकारा । किंतु मैं अड़ा रहा । वह गुस्से में उतर कर मुझे मारने चला । मैंने वह पैर फटकारा कि - उसकी लादी भी गिर गई । और उसे भी चोट आ गई । और मैं वहां से चल दिया । मैं भी यही सोचता हूँ कि - मैंने वह गलती क्यों की ? लोमड़ी ने गुस्से में भर कर कहा - नमक हराम जिसका खाता रहा । उसी का काम करने में आनाकानी की । तेरी शक्ल भी देखना पाप है । कह कर वह झपटने को हुई । पहले तो गदहा यह न समझ पाया कि - लोमड़ी क्यों एकदम बदल गई । वह रेंकता हुआ भागा । लोमड़ी ने उसका पीछा किया ।
गदहे का रेंकना सुनकर जंगल के और जानवर आए । जब लोमड़ी और उसको भागते देखा । तो यह कहते हुए भागे कि - अरे ! आज लोमड़ी ने अपने लोमड़ की मनगढ़ंत कहानी सुना कर गदहे को अपना शिकार बना लिया ।

गदहे का क्या हुआ ? यह तो याद नहीं है । किंतु लोमड़ी पर से सभी जानवरों का विश्वास उठ गया । वह 1 अकेली और निरीह सी घूमने लगी । कहानी समझने की है । झूठ बोलकर धोखा दिया जा सकता है । किंतु यदि झूठ खुल गया । तो उस पर से सबका विश्वास सदा के लिए उठ जाता है ।
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घटना अकबर बादशाह के समय की है । 1 बार उसने बीरबल से कहा - बीरबल ! तुम कहते हो कि - तुम्हारा भगवान भक्तों की पुकार पर खुद दुनिया में चला आता है । तो मेरी समझ में यह नहीं आता कि - वह खुद क्यों आता है । उसके यहां तमाम नौकर चाकर होंगे । क्यों नहीं उनको भेज देता । बीरबल ने कहा - जहाँपनाह ! इसका जवाब मैं आपको दूँगा । जहांगीर अकबर का सबसे बड़ा पुत्र था । और बड़ी मन्नतें और पूजा के बाद वह पैदा हुआ था । इसलिए अकबर उसे बहुत प्यार करता था । वह उस समय गोद में था । बीरबल ने जहांगीर की शक्ल का 1 पुतला बनाया । और उसे वैसे ही वस्त्र पहनाए । जैसा

कि जहाँगीर पहनता था । दूर से देखने पर लगता था कि - वह सलीम ही है । बीरबल ने शाही बाग में तालाब के किनारे उस पुतले को रख दिया । और अपने 2-4 आदमियों को उस पुतले के पास नियुक्त किया । जिससे ऐसा मालुम होता था कि - वे लोग बच्चे को खिला रहे हैं । पुतले के नीचे से 1 पतले तार को जोड़कर कुछ दूर तक फैला दिया । जिससे तार के हिलते ही पुतला कूद कर तालाब में गिर पड़े ।
सब प्रबन्ध करने के बाद बीरबल अकबर के पास पहुँचा । और बोला - जहांपनाह ! बहुत दिनों से आपने शाही बाग की सैर नहीं की । चलिये । आज टहल आईये । अकबर तैयार हो गया । और दोनों शाही बाग में पहुँचे । अकबर ने तालाब के किनारे बैठे पुतले को देखा । उसने समझा कि - सलीम खेल रहा है । खैर.. कोई बात नहीं । वह घूमता रहा । इतने में बीरबल ने धीरे से तार को खींच लिया । और पुतला पानी में  उछल कर 

गिर पड़ा । उसके पास खड़े कर्मचारी चीख पड़े । अकबर बादशाह ने भी न आव देखा न ताव । और पानी में कूद पड़ा । उसके मुख से चीख निकल पड़ी - हाय सलीम ।
पानी में उसके हाथ वही पुतला लगा । उसे देखकर वह क्रोधित हो गया । और बोला - बीरबल ! यह कैसा मज़ाक तुमने मेरे साथ किया है ? बीरबल ने शांत स्वर में जवाब दिया - जहाँपनाह ! तमाम नौकर चाकरों के रहते हुये आपको पानी में कूदने की क्या जरुरत थी ? अकबर को अपनी बातों का जवाब मिल चुका था । उसका क्रोध शाँत था । उसने कहा कि - बीरबल ठीक है । भक्तों की पुकार पर खुदा को खुद आना पड़ता है ।
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त्रेता के समय में सदन कसाई था । माँस बेचकर परिवार का पालन पोषण करता था । उसका नियम था कि - 1

बकरा रोज काटा जाय । और उसके माँस को बेचने पर जो कुछ पैसा मिलता था । उसमें उसे संतोष था । 1 दिन उसके नगर में 1 सरकारी अधिकारी आया । उसके सिपाही मांस लेने आये । शाम का समय था । सदन कसाई अपनी बिक्री समाप्त कर चुका था । और अपने नियम के अनुसार रोज 1 ही बकरा काटता है । सिपाही इस बात को सुनकर नाराज हुआ । सदन कसाई सोचने लगा कि - क्या किया जाय ? अंत में उसने सोचा कि - सामने जो बकरा कल के लिए बंधा रखा है । उसकी 1 टांग काट ली जाय । तो बात बन जायेगी । और हमारा उसूल भी नहीं बदलेगा । मांस पाकर सिपाही खुश हो जायेंगे । और बकरे को कल काट दूंगा ।
यह निर्णय करने के बाद सदन कसाई हाथ में गंडासा लेकर उठा । और बकरे के पास पहुंचा । ज्यों ही उसने बकरे की टांग का निशाना बनाया । त्यों ही बकरा हंस पड़ा । सदन कसाई का गंडासा रुक गया । और बकरे से पूछने लगा कि - भाई तुम हँसे क्यों ? बकरे ने जवाब दिया कि - तुम अपना काम करो ।

यह जानने से तुम्हें क्या काम ? सदन कसाई बोला कि - नहीं तुम्हें बताना पड़ेगा ।
बकरे ने हंस जवाब दिया कि - अब तक हम तुमको काटते रहे । और तुम हमको काटते रहे । यह अदला बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है । अब तुम यह नई रीति कैसी निकाल रहे हो कि मेरी 1 टांग काट दोगे । और मैं रात भर तड़पता रहूंगा । क्योंकि जिस तरह तुम मुझे तड़पाओगे । उसी तरह मैं भी तुमको तड़पाऊंगा ।
सदन कसाई ने हथियार रख दिया । और ये शब्द उसके मस्तिष्क में गूंजने लगे - यह अदला बदला हमारा तुम्हारा युगों युगों से चला आ रहा है । अंत में परेशान होकर उसने निश्चय किया कि - आज से यह काम बंद कर दूंगा । बकरे को उसने छोड़ दिया । और महात्माओं की तलाश में निकल पड़ा । ताकि उनसे क्षमा मांग कर अपने सारे पापों से मुक्त हो सके । भटकते भटकते अंत में राम भगवान का वह कृपा पात्र बना ।
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घटना बड़े स्वामी जी महाराज के समय की है । उनको लोग पंडित जी कहा करते थे । अलीगढ़ जिले में चिरौली गाँव में उनका घर था । हमारे बाबा जी ( जिनको लोग बाबा जय गुरुदेव के नाम से जानते हैं ) ने नामदान चिरौली में ही लिया था । उस समय उनकी 

अवस्था 17 वर्ष की थी । नामदान लेने के 1 वर्ष के अन्दर ही उन्होंने परमात्मा को प्राप्त कर लिया ?
खैर.. पंडित जी का जीवन बहुत सादा था । गांव वाले भी उन्हें न समझ सके कि - यह महापुरुष अपने अन्दर इतनी बड़ी दौलत को छिपाये हुये हैं । पंडित जी के पास दूर दूर से लोग मिलने आते थे । और दर्शन करके अपने जीवन को धन्य समझते थे । गाँव का जमींदार हैरान रहता था कि - इस गरीब पंडित के पास कौन सी चीज है कि अंग्रेज भी आते हैं । और पढ़े लिखे लोग भी आते हैं ।
1 दिन उसने अपने नाई से कहा कि - पंडित जी के घर जाना । तो इस बात का पता लगाना कि उनके पास लोग क्यों जाते हैं ? और क्या बात होती है । नाई ने कहा - सरकार अच्छी बात है । मैं पूरा पता लगाऊँगा ।
दूसरे दिन नाई पंडित जी के घर गया । और साबुन लगा कर दाढ़ी बनाने लगा । बातचीत के दौरान में उसने पूछा - पंडित जी ! आप क्या धर्म की बात बताते हैं ? मुझे भी कुछ सुनाईये । पंडित जी की 1 तरफ की दाढ़ी नाई बना चुका था । और दूसरी तरफ बनाना

बाकी था । पंडित जी ने नाई से कहा - रुक जाओ । और बोले - क्या जानना चाहते हो ? नाई ने बड़ी खुशी से कहा - हाँ पंडित जी ।
पंडित जी ने नाई को बैठकर परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बता दिया । उसने आँख बंद करके दिव्य लोकों का जलवा देखा । तो अपने को धन्य धन्य समझने लगा । लाख लाख शुकराना वह पंडित जी का करने लगा ।
दूसरे दिन प्रातः काल जब वह जमींदार के घर गया । तो जमींदार ने पूछा - क्यों भाई कुछ पता लगा ? यह सुनकर नाई ने कहा - ऐ जमींदार साहब ! जमींदार होंगे । आप अपने घर के । अगर आपको कुछ जानना हो । तो आप वहीं चले जाईये । मैं कुछ न बता पाऊँगा ।
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जिस समय दिल्ली की गद्दी पर औरंगजेब बैठा था । उसी समय में 1 सूफी फकीर सरमद । अपनी फकीरी मस्ती में दिल्ली की सड़कों पर आया जाया करते थे । जब और जहाँ उनकी इच्छा हुई । वहीं वो बैठ जाते । लोग उन्हें

देखते । तो कोई हँसता । कोई उन पर फिकरे कसता । परन्तु उन पर किसी के कहने सुनने का कोई असर नहीं था ।          
औरंगजेब के दरबारियों ने औरंगजेब से इस मस्त फकीर की चर्चा की । दरबारियों  ने कहा - जहाँपनाह ! वह इतना गरीब है कि उसके पास कपडे भी ठीक नहीं हैं । और वह ऐसे ही पड़ा रहता है । औरंगजेब ने आदेश दिया कि - उस गरीब फकीर को कपडे दिए जायें । दरबार का 1 कर्मचारी वस्त्र लेकर सरमद साहब के पास पहुंचा । उस समय वे मोती मस्जिद के फाटक के पास बैठे हुए थे । दरबारी ने जाकर कहा - ऐ  फकीर ! इन कपड़ों को कबूल करो । शहंशाह औरंगजेब ने तुम्हारी मुफलिसी पर रहम  खाकर इसे भेजा है । सरमद साहब सुनी अनसुनी कर गए । दरबारी ने पुनः अपने  वाक्य को दुहराया । सरमद ने कहा - ले जा उस कपडे को । औरंगजेब को दे दे । उससे कहना कि - पहले अपनी मुफलिसी दूर करे । फिर रहम करे । दरबारी वापस लौट गया ।

औरंगजेब का क्रोध प्रसिद्ध था । सब जानते थे । उसके तलवार की धार बराबर पैनी  रहती है । दरबारी डर गया कि - कहीं फकीर की बात सुनकर औरंगजेब क्रोधित न हो उठे । वह दरबार में वस्त्रों को लेकर हाज़िर हुआ । औरंगजेब ने पूछा - फकीर  ने कपडे नहीं लिए । उत्तर मिला - नहीं । क्यों क्या कहा उसने ? औरंगजेब का दूसरा प्रश्न था । दरबारी ने कहा - लेने से इंकार कर दिया । फकीर की बात कहने का साहस वह न कर सका ।    
औरंगजेब ने सोचा । अजीब फकीर है । नंगे रहना पसंद करता है । किन्तु कपडे नहीं लेता । उसने निश्चय किया कि - वह खुद जाकर उसे कपडे देगा । वह जानता था कि - फकीर निडर होते हैं । और जो चाहे वह कर भी सकते 

हैं । दुसरे दिन औरंगजेब खुद ही कपडे लेकर सरमद साहब के पास चला गया । मोती  मस्जिद के पास ही सरमद लेटे हुए थे । औरंगजेब ने कहा - फकीर साहब ! तुमने कपड़ों को क्यों लौटा दिया ? मैं हिन्दुस्तान का बादशाह औरंगजेब । खुद तुम्हारी खिदमत में आया हूँ । कपडे ले लो । सरमद ने बगल में इशारा करते हुए कहा - औरंगजेब ! पहले इसको ढँक दे । जो मुझसे भी अधिक शर्मनाक है । औरंगजेब सरमद की बात न समझ सका । उसने चादर जमीन पर फैला दिया । फिर बोला - और कपडे न लो । अपने ऊपर चादर ही डाल लो । फकीर ने कहा - चादर उठाने की बात मत कह । बादशाह तू लौट जा । चादर के नीचे तुने क्या ढका है ? उसे देख नहीं सकेगा ।
औरंगजेब के लिए फकीर की बातें 1 पहेली बन रही थी । वह कुछ न समझा । तो उसका  क्रोध भड़कने लगा । उसने गुस्से में कहा - सरमद तुझे चादर ओढनी ही पड़ेगी । तू नहीं समझ रहा है कि - तेरे सामने बादशाह औरंगजेब खड़ा है ।  सरमद मुस्करा कर 

बोले - तू नहीं मानता है । तो उठा ले चादर । और मुझे ढक दे । औरंगजेब ने ज्यों ही चादर उठाया । तो एकदम घबरा गया । चादर उठाते ही उसे लगा कि - दारा की भोली आँखे उसे घूर रही है । शुजा और मुराद का खून से लथपथ धड तड़प रहा है । शाहजहाँ की आह उठकर उसके कानों को परेशान करने लगी । ये वही लोग थे । जिन्हें औरंगजेब ने पहले क़त्ल कर दिया था । 
आखिर में घबरा कर उसने चादर छोड़ दिया । सरमद ने कहा - बता औरंगजेब ! तेरे पापों को ढकना अधिक जरुरी है । या  इस शरीर को ? औरंगजेब की बहुत बड़ी पराजय हुई थी । वह चुपचाप किला वापस लौट आया । कुछ दिन तो उसे वह भयानक दृश्य और वे आवाजें बेचैन करती रहीं । अपने ही कर्मों से और अन्दर की आवाज से औरंगजेब घबरा उठा । और उसने सरमद का क़त्ल करवा दिया । कहते हैं । औरंगजेब अंतिम दिनों में अपनी डायरी लिख रहा था । तो उसने लिखा कि - मैंने जीवन में बहुत से गुनाह किये हैं ।  किन्तु उन सबमें सबसे बड़े 2 गुनाह हैं । जिसके लिए मैं अपने को माफ़ नहीं कर सकूँगा । 1 शाहजहाँ की कैद । 2 सरमद का क़त्ल ।
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