Thursday, 20 February 2014

मेरी बुद्धि को क्या हो गया

पत्नी पूजा स्तोत्र - जो भक्त पत्नी पूजा पद्धति का पाठ करते हैं । इसके
पाठ मात्र से स्त्री के देवी रूप रहस्यों के सम्बन्ध में पति के सभी जन्म जन्मान्तरो के भ्रम का निवारण हो जाता है । तथा वह देह त्यागने के पश्चात स्त्री लोकवासी बनकर अनंत काल तक सुखों का भोग करता है । लेकिन इसके लिए इहलोक में पत्नीचर्या का कठोर व्रत करना होता है ।
सर्वप्रथम प्रातः उठकर नित्यक्रिया से फारिग होकर विवाह कराने
वाले अगुवा ( मध्यस्थ ) कों स्मरण कर लें । उन्हें मानसिक रूप से अभिनन्दन करने के पश्चात अपने स्वसुर व सासजी को नमस्कार
करके ही इसका पाठ करना श्रेयस्कर है ।
अथ पत्नी पूजा स्तोत्र
अगर ईश्वर पर विश्वास ना हो । और उससे फ़ल की आस ना हो ।
तो अरे नास्तिको घर बैठे । साकार ब्रह्म को पहचानो ।
पत्नी को परमेश्वर मानो । ये अन्नपूर्णा जगजननी ।
माया है इनको अपनाओ । ये शिवा भवानी चन्डी है ।
तुम भक्ति करो कुछ भय खाओ । सीख़ो पत्नी - पूजन पद्धति ।
पत्नी चर्या पत्नी अर्चन । पत्नी व्रत पालन करे जाओ ।
पत्नीवत शास्त्र पढे जाओ । अब कृष्णचन्द्र के युग बीते ।
राधा के दिन बढती के है । यह सदी इक्कीसवी है भाई ।
नारी के ग्रह चढती के है । तुम उनसे पहले उठा करो ।
उठते ही चाय तैयार करो । उनके कमरे के कभी अचानक ।
खोला नहीं किवाड करो । उनकी पसन्द के कार्य करो ।
उनकी रूचियो को पहचानो । पत्नी को …………………।
तुन उनके प्यारे कुत्ते को । बस चूमो चाटो प्यार करो ।
तुम उनको टी वी देखने दो । आओ कुछ घर का काम करो ।
वे अगर इधर आ जाये कहीं । तो कहो - प्रिये आराम करो ।
उनकी भौंहे सिग्नल समझो । वे चढी कहीं तो खैर नही ।
तुम उन्हें नहीं डिस्टर्व करो । यूं हटो बजाने दो प्यानो ।
पत्नी को परमेश्वर मानो । तुम आफ़िस से आ गये ठीक  ।
उनको क्लब मे जाने दो । वे अगर देर से आती हैं ।
तो मत शंका को आने दो । तुम समझो एटीकेट सदा ।
उनके मित्रो से प्रेम करो । वे कहाँ किसलिये जाती हैं ?
कुछ मत पूछो शेम करो । पत्नी को परमेश्वर मानो ।
तुम समझ उन्हे स्टीम गैस । अपने डिब्बों को जोड चलो ।
जो छोटे स्टेशन आये तुम । उन सबको पीछे छोड चलो ।
जो सम्भल कदम तुम चले चलो । तो हिन्दू सदगति पाओगे ।
मरते ही हूरे घेरेंगी । तुम चूको नही मुसलमानों ।
पत्नी को परमेश्वर मानो ।
प्रेम से बोलिए - गृह लक्ष्मी की जय । साभार - श्री चक्रपाणि त्रिपाठी जी की वाल से ।
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महावीर को 1 तरफ तीर्थंकर का सम्मान मिलता है । वह भी सारे सुखों का इकट्ठा अनुभव है । और दूसरी तरफ असह्य पीड़ा भी झेलनी पड़ती है । वह भी सारे दुखों का इकट्ठा संघात है । रमण को 1 तरफ हजारों हजारों लोगों के मन में अपरिसीम सम्मान है । वह सारा सुख इकट्ठा हो गया । और फिर कैंसर जैसी बीमारी है । सारा दुख इकट्ठा हो गया । समय थोड़ा है । सब संगृहीत और जल्दी और शीघ्रता में पूरा होता है । इसलिए ऐसे व्यक्ति परम सुख और परम दुख दोनों को 1 साथ भोग लेते हैं । समय कम होने से सभी चीजें संगृहीत और एकाग्र हो जाती हैं । लेकिन भोगनी पड़ती हैं । भोगने के सिवाय कोई उपाय नहीं है ।
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मैं 1 घर में अभी मेहमान था । रात लौटा । तो घर के बच्चे मोनोपाली खेल रहे थे । व्यापार खेल रहे थे । बच्चे हैं । बूढ़े भी व्यापार खेलते हैं । तो बच्चे खेलते हों । तो हर्ज क्या है ? मैं जब पहुंचा । तो बड़ा तेज तनाव था वहाँ । किसी ने किसी का स्टेशन चालबाजी से ले लिया था । अब बड़े बड़े ले रहें है स्टेशन चालबाजियों से । तो छोटो की क्या । बड़ा तनाव था । बड़ा झगड़ा था । एक दूसरे पर लांछन लगाया जा रहा था । बच्चे बड़े नाराज थे । मैं जब वहां पहुंचा । तो मुझे देखकर वे थोड़े सहम गए । फिर कोई हंसा । फिर दूसरा हंसने लगा । मैंने कहा - बात क्या है ? तुम बड़े क्रोध में थे । तुम बड़े नाराज थे । तुम हंसने क्यों लगे ? उन्होंने कहा कि - आप आए । तो हमें ख़याल आया कि अरे, खेल में और इतने परेशान हुए जा रहे हैं । फिर उन्होंने वे सब गिर गए । और उन्होंने सब बंद करके जल्दी से डब्बा बंद कर दिया । मैंने उनसे कहा - इतनी जल्दी ? तुम इतने नाराज थे । इतने परेशान थे । इतना धोखाधड़ी का इल्जाम लगा रहे थे । ऐसा लग रहा था कि कोई भरी झगड़ा हो गया है । उन्होंने कहा - नहीं । कुछ भी नहीं । हम बस खेल रहे थे - ओशो
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रामकृष्ण भी मरते वक्त कैंसर से मरे । गले का कैंसर था । पानी भी भीतर जाना मुश्किल हो गया । भोजन भी जाना मुश्किल हो गया । तो विवेकानंद ने 1 दिन रामकृष्ण को कहा कि - आप, आप कह क्यों नहीं देते काली को । मां को ? 1 क्षण की बात है । आप कह दें । और गला ठीक हो जाएगा । तो रामकृष्ण हंसते । कुछ बोलते नहीं । 1 दिन बहुत आग्रह किया । तो रामकृष्ण ने कहा - तू समझता नहीं । जो अपना किया है । उसका निपटारा कर लेना जरूरी है । नहीं तो उसके निपटारे के लिए फिर आना पड़ेगा । तो जो हो रहा है । उसे हो जाने देना उचित है । उसमें कोई भी बाधा डालनी उचित नहीं है । तो विवेकानंद ने कहा कि - न इतना कहें । इतना ही कह दें कम से कम कि गला इस योग्य तो रहे जीते जी कि पानी जा सके । भोजन जा सके । हमें बड़ा असह्य कष्ट होता है । तो रामकृष्ण ने कहा - आज मैं कहूंगा । और सुबह जब वे उठे । तो बहुत हंसने लगे । और उन्होंने कहा -  बड़ी मजाक रही । मैंने मां को कहा । तो मां ने कहा कि - इसी गले से कोई ठेका है ? दूसरों के गलों से भोजन करने में तुझे क्या तकलीफ है ? तो रामकृष्ण ने कहा कि तेरी बात में आकर मुझे तक बुद्धू बनना पड़ा है । नाहक तू मेरे पीछे पड़ा था । और यह बात सच है । जाहिर है । इसी गले का क्या ठेका है ? तो आज से जब तू भोजन करे । समझना कि मैं तेरे गले से भोजन कर रहा हूं । फिर रामकृष्ण बहुत हंसते थे उस दिन । दिन भर । डाक्टर आए । और उन्होंने कहा - आप हंस रहे हैं ? और शरीर की अवस्था ऐसी है कि इससे ज्यादा पीड़ा की स्थिति नहीं हो सकती । रामकृष्ण ने कहा - हंस रहा हूं इससे कि मेरी बुद्धि को क्या हो गया कि मुझे खुद खयाल न आया कि सभी गले अपने हैं । सभी गलों से अब मैं भोजन करूंगा । अब इस 1 गले की क्या जिद करनी है ।
व्यक्ति कैसी ही परम स्थिति को उपलब्ध हो जाए । शरीर के साथ अतीत बंधा हुआ है । वह पूरा होगा । सुख दुख आते रहेंगे । लेकिन जीवन मुक्त जानेगा । वह प्रारब्ध है । और ऐसा जानकर उनसे भी दूर खड़ा रहेगा । और उसके साक्षीपन में उनसे कोई अंतर नहीं पड़ेगा । उसका साक्षी भाव थिर है । और जिस प्रकार जग जाने से स्वप्न की क्रिया नाश को प्राप्त होती है । वैसे ही मैं ब्रह्म हूं । ऐसा ज्ञान होने से करोड़ों और अरबों जन्मों से इकट्ठा किया हुआ संचित कर्म नाश पाता है ।
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अब गधे इंसान की भूख मिटा रहे हैं । चीन में गधे के मांस की मांग देखते हुए कीनिया में पहली बार बूचड़खाना खोला गया है । पढ़िए क्या होगा इस बूचड़खाने में
http://bbc.in/NcWpMF

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