Tuesday, 1 March 2011

हिन्दी ब्लागर्स में गुटबाजी ?


हिन्दी ब्लॉग जगत में एक शिकायत बडी आम है कि ब्लॉगर गुट बनाते हैं । और अपने गुट विशेष के सदस्यों की सराहना करते हैं । मैं स्वयं गिरोहबाजी का समर्थक नहीं । पर हमेशा जो दिखाई देता है । वास्तव में वह मात्र गुटबाजी ही नहीं होता ।
हिन्दी ब्लॉग जगत में सभी उच्च साहित्यकार नहीं आते । अधिसंख्य वे सामान्य से लेखक । सहज अभिव्यक्ति करने वाले ब्लॉगर ही होते है । ऐसे नव आगंतुको को प्रेरणा व प्रोत्साहन की नितांत आवश्यकता होती है । उनकी विशिष्ट सराहने योग्य कृतियों पर भी । बढिया पोस्ट । उम्दा पोस्ट । Nice post । मात्र जैसी टिप्पणियाँ भी उनके लिये बहुत मायने रखती है । उनके लिये तो यह भी बहुत होता है । लोगों ने उनका ब्लॉग देखा । स्थापित होने के संघर्ष में वे भी यथा प्रयत्न दूसरे ब्लॉगर के समर्थक बनते हैं । बिना लेख पढे ज्यादा से ज्यादा टिप्पणियाँ करते हैं । इसलिये कि उन्हे भी याद रखा जाय । और न्यूनाधिक महत्व दिया जाय ।
इस तरह लेनदेन के प्रयास में एक नियमितता आती है । जिसे हम अक्सर गुट समझने की भूल करते है । जब कि वह सहयोग मात्र होता है ।
कुछ प्रतिष्ठित प्रतिभावान साहित्यक ब्लॉगर्स के साथ भी यही दृष्टिगोचर होता है । किन्तु वहां भी उनकी आवश्यकताएँ होती हैं । साहित्यक प्रतिभावान ब्लॉगर भी अपेक्षा रखता है । उसे साहित्यक समझ वाले पाठक उपलब्ध हों । वह टिप्पणीकर्ता के अभिगम से भांप लेता है । पाठक भी साहित्यक समझ का योग्य पात्र है । और उसके साथ संवाद की निरंतरता बनाता है । और उसके लेखादि को सराहता है । जो कि सराहने योग्य ही होता है । ऐसी आपसी सराहना को हम गुट मान लेते हैं । हमारी दुविधा यह है कि इस विकासशील दौर में हर ब्लॉगर ही पाठक होता है । अतः आपस में जुडाव सहज है ।
स्थापित वरिष्ठ बलॉगर भी वर्षों से ब्लॉगिंग में है । प्रतिदिन के सम्पर्कों और अनुभव के आधार पर वे एक दूसरे को जानने समझने लगते हैं । ऐसे परिचित ब्लॉगर से सम्पर्क का स्थाई बनना आम बात है । इसे भी हम गुट मान लेते हैं ।
कोई भी व्यक्ति विचारधारा मुक्त नहीं होता । उसी प्रकार प्रत्येक ब्लॉगर की भी अपनी निर्धारित विचारधारा होती है । सम्पर्क में आने वाले दूसरे ब्लॉगर में जब वह उसी विचार को पाता है । तो उसके प्रति आकर्षण होना सामान्य है । ऐसे में निरंतर संवाद बनता है । समान विचारों पर समान प्रतिक्रिया देने वालों को भी एक गुट मान लिया जाता है ।
इस प्रकार के सम्पर्कों को यदि गुट भी कहें । तब भी यह गुट बनना प्राकृतिक है । और कुदरती रूप से यह केन्द्रियकरण अवश्यंभावी है । यह वर्ग विभाजन की तरह भी हो सकता है । जैसे बौद्धिक अभिजात्य वर्ग । सामान्य वर्ग । सहज अभिव्यक्ति वर्ग । स्थापित ब्लॉगर । साधारण ब्लॉगर । संघर्षशील ब्लॉगर ।
लेकिन इस वर्ग विभाजन से भय खाने की आवश्यकता नहीं । जैसे जैसे ब्लॉगिंग का विस्तार होता जायेगा । पाठक अपनी रूचि अनुसार पठन ढूंढेगा । विषयानुसार केटेगरी बनना तो निश्चित है । साथ ही सारे के सारे विभाजन हिन्दी ब्लॉग पाठकों की सुविधा में अभिवृद्धि ही करेंगे । इसलिये बस लिखते चलो । लिखते चलो ।
साभार श्री हँसराज जी के सुज्ञ ब्लाग से । आपका बेहद धन्यवाद सुज्ञ जी ।
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