Tuesday, 11 September 2012

यहाँ रूपये की तान सुन अबला नाचती है


BANKING जैसे Occupation से जुङे पर आम आदमी और जन्मभूमि मातृभूमि की वेदना को दिल से महसूस करने वाले उमाशंकर जी से आज आपको मिलवाते हैं ।
अक्सर ब्लागर about me यानी प्रोफ़ायल में मेरे बारे में ..अपना संक्षिप्त परिचय भी नहीं लिखते । इससे जुङने वाले पाठक को एक कमी सी खलती है । खैर..दुर्ग छत्तीसगढ के ब्लागर्स का देश प्रेम । सत्ता व्यवस्था के प्रति आक्रोश । और आम आदमी की वेदना । कुरीतियों पर प्रहार आदि ज्वलंत भावनायें ही उनका असली परिचय है । चलिये आज मिलते हैं । छत्तीसगढ के ऐसे ही ब्लागर उमाशंकर जी से । इनका शुभ नाम है - उमाशंकर मिश्रा UMA SHANKER MISHRA और इनकी Industry है - Banking और इनका Occupation भी है - BANKING और इनकी Location है - DURG, C.G., India और इनका Interests है -  WRESTLING, SWIMING और इनकी Favourite Films हैं - GANDHI, PUSHPAK, SHOLEY और इनका Favourite Music है - MUKESH, RAFI, LATA और इनकी Favourite Books हैं - RAMAYAN, SHANTI PATH DARSHAN, VAYAM RAKSHAAMI और ये हैं इनके ब्लाग -  उजबक गोठ ujbakgoth ब्लाग पर जाने हेतु नाम पर क्लिक करें ।
और ये हैं । इनके ब्लाग से कुछ रचनायें -

कुंडली
मुट्ठी में सूरज लिए । अंगारों में जान । क्रांति बीज है पल रहा । जाग रहा इंसान ।
जाग रहा इंसान । भृष्टता दूर भगाओ । जनगण हैं तैयार । अनल भर मुट्ठी लाओ । 
धुआँ हो रही आग । पिये हम विष की घुट्ठी । देंगे अब बलिदान । भींचते सब हैं मुट्ठी ।
- ओ.बी.ओ.चित्र काव्य प्रतियोगिता अंक 17 में प्रथम पुरस्कार प्राप्त रचना
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नयन
नयन भेद बृह्मास्त्र सम । महा भेद्य यह तीर । चोट हृदय पर धारती । नयन बहाये नीर ।
नयन करे प्रभु बंदगी । बना मनन को तार । दृश्य अलौकिक देखता । स्वर्ग नयन है द्वार ।
नयन देख पर जग लड़ा । नयन कराये प्रीत । काम नयन जो पी गया । कहें कामना जीत ।
तीन नयन शिव नेत्र हैं । बरसे आगी आँख । नयनों की चिंगारी से । किया काम को राख ।
नयन धार जो नास्तिक । अंधा सर्प समान । इधर उधर है भागते । जब तक न तजे प्रान ।
बंद नयन आलोकती । भीतर घटे प्रकाश । पदमासित विचरण करे । सत कोटी आकाश ।
- ओ.बी.ओ.लाईव महोत्सव में सम्मलित
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चन्द्रमा के चित्र पर आधारित
चंद्र शिव भाल लगाय ।
विष ज्वाला शीतल करन । शिव जी भाल लगाय । अर्ध चन्द्रमा सोहते । औघड़ रूप सजाय ।
औघड़ रूप सजाय । बने थे शिव जी जोगी । तब से वर्षा करे । चन्द्र बन अमृत डोंगी ।
चन्द्र किरण की आब । बने अमृत का प्याला । शरद पूर्णिमा रात । भसम हो विष की ज्वाला ।
- ओ.बी.ओ.महोत्सव में शामिल
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यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है ।
आदमी को आदमी कहता नहीं इंसान है । भेड़ बकरी की तरह चढ़ रहा परवान है ।
इस सियासत के मुताबिक राज अपना हो गया । हम ही कुचले जा रहे अलफास बे ईमान है ।
लालसा दौलत की लेके वो सियासि कर गये । वोट नोटों पर बिके वो बन गये धनवान है । 
घूस भृष्टाचार सह कर चुप खड़ा है आदमी । किस भरत के भारत को बोला गया महान है । 

नीतियाँ भी बिक गई ईमान भी है बिक गया । यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है ।                 
 संसद में भी भिं भोरा उस जहर के नाग का । जिस जहर की तड़प से माँ भारती हैरान है । 
अन्याय सह चुप बैठ कर मर गया इंसान है । अर्थियां ही अर्थियां है सब तरफ शमशान है ।
अब जुबां की चोट पर है उठ रही चिंगारियां । जल न जाये ये सियासत वो बड़े हैरान है ।
धर्म का फतवा हुआ उस नाखुदा के नाम पर । खून सडकों पर बहा हिंदू ना मुसलमान है| ।
है फकीरी में यहाँ हर पाक नगमागार है । यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है ।
देखते अखबार को क़त्ल सरे राह हुवा । सब तमाशाबीन नजरें क्यूं यहाँ अंजान है ।
बो फसल जो पेट भरता भूख से वह मर गया । सूदखोरी बेड़ियों में बंध गया किसान है । 

भर मिलावट से यहाँ हर चीज क्यों है तरबतर । नोट के सौदागरों ने ली हजारों जान है ।
बिक रहा है आदमी रुपयों की झंकार पर । नाचती अबला यहाँ सुन रूपए की तान है ।
चोरियां जो कर रहा है कुर्सियों में बैठ कर । छोड़ दे नालायकी उठती वहाँ अजान है ।
इस शहर में भीड़ है मैय्यत वहीँ पे रोक दो । कब्र पर रहने लगे खाली नहीं शमशान है ।
इंसा  खाता था रोटी  खा रही हैं रोटियां । यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है ।
रेत पत्थर कंकडों को अब पचाना सीख लो । पेड़ कटते जा रहे बस मकान ही मकान है ।
 - तरही मुशायरा में प्रस्तुत रचना
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जागो जागो ....रे
जागो जागो भारतवासी ये कैसी मंहगाई है । चावल दाल में आग लगी है दीन हीन को खाई है ।
पी.एम.यहाँ विश्व बैंक के पुराने खिदमदगाई है । बढ़ते बढ़ते बढ़ती जाए जैसे मौत की खाई है ।
महंगाई की थाह नहीं है जाने कितना जायेगी । पूछे कौन समुद्र से तुझमें कितनी गहराई है ।
सब्जी भाजी से ना पूछो शर्म लिए कुम्हलाई है । पेट्रोल हुआ कंपनियों का शाह अरब ये भाई है ।
बिजली बिल भी रोता है क्यों शासन करे कमाई है । दैनिक जीवन की हर वस्तु ख्वाबों की परछाई है ।
आई एक दहाड़  मंच से शामत उनकी आई है । समझो समझो खद्दर धारी खुलने लगी कलई है ।

- ओ.बी.ओ.तरही मुशायरा में प्रस्तुत गज़ल
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उजबक वाणी
जन सेवा के नाम पर । वोट मांगने आय । चुनते ही सरकार में । लूट लूट सब खाय ।
मुस्काते  मनमोहने ।  सुरसा डालर आज । मतदाता घायल हुआ । फिर भी करते नाज ।
त्राहि त्राहि है देश में । कौन यहाँ बदनाम । एक ही थैली में घुसे । चट्टे बट्टे नाम । 
धीमा विष महंगाई का । धीमी हो गई साँस । नेतागण  बेफिकरा । जन गर्दन में फांस । 
डालर रुपया लड़ रहे । चौसर बिछी बिसात । जनता पांडव लुट गई । शकुनी दे रहा मात ।
माया बन पेट्रोल अब । ठगनी खेले खेल । आम आदमी पिस गया । जीवन ठेलम ठेल । 
उनकी कोठी भर गई । भृष्ट जीभ से चाट । आम आदमी मर गया । आँगन उलटी खाट ।
महंगाई मस्त है । आम आदमी पस्त है ।
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बस्तर की व्यथा -
बस्तर की व्यथा । कोई इतिहास के झरोखों से झांके । अंधेरों में भी दिखेंगी ।
भयातुर मेरी वेदना भरी आँखे । आदिम युग की  समेटे वह तस्वीर ।

दिखेगी रोती  बिलखती । भूखी अंजान रधिया की तक़दीर ।
मै बस्तरिया अबुझमाड़ की गाथा । वस्त्र विहीन आदिम संस्कृति ।
ढो रहा अभाव में डूबी नग्न पावनता । आते जाते सैलानियों के कैमरों में ।
समा जाता हूँ बन के - कला । मेरे वक्ष से लटकती - माँ ।
आँखों में सूखे उन आंसुओं की छाप । मेरा सब कुछ अजगर बन निगल रहा ।
नक्सली आतंकी सांप । विस्फोंटो में उड़ गया मेरा अभिमन्यु ।
निगल गया मेरे अर्जुन का गांडीव । हवाओं में गोलियों की फुहार ।
मर रहा है बिसेसर । मर रही है रधिया आज । उजड़ रहा है रोज परिवार ।
खामोश हैं सब देश संसद । मेरी निजता नहीं है ना - ताज ।
- मुंबई के होटल ताज पर आतंकी हमला हुआ था । पूरा देश प्रशासन संसद क्रियाशील हो गए थे । आतंकी चाहे बाहर का हो । या अंदर का । है तो आतंकी । जिसे देशद्रोही ही माना जाता है । मुंबई चूँकि संपन्न है । होटल ताज एक संपन्न व्यक्ति की धरोहर है । क्या इसीलिए तुरंत कार्यवाही की गई ?

आज बस्तर कई साल से आतंक से पीड़ित है । क्यों कोई सार्थक पहल अभी तक नहीं हो सकी । क्यों ? क्यों गरीब की मौत मौत नहीं है ?
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जन सेवा मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है । मुझे देश की भावी जनता से प्यार है ।
मुझे कुर्सी दिलाने में इनका हाथ है । मेरी झोपड़ी को महल बनाने में इनका साथ है ।
इनके अहसानों के बदले देता हूँ आश्वासन । बड़े मुश्किल में तैयार किये भाषण ।
कागज के पन्नों में बांटता हूँ राशन । इतने करने में भी ये जनता रोती है ।

किये कराये कर्मों को आसुओं से धोती है । अरे ! मैं मंत्री हूँ ....
कुछ कद्र करो मेरे आश्वासनों की । मेरे मुखार वृन्द से कहे सम्भाषणों की ।
क्या जनसेवक होना छोटी बात है ? तुम हो एक वोट जो तुम्हारी जात है ।
तुम्हारी दिलाई कुर्सी कल छीन जायेगी । हमारा आश्वाशन हमेशा जिन्दा रहेगा ।
अमर रहेगा.....
तुम्हारी रोतीं बिलखती आँखों को धिक्कार है । मुझे तुम्हारे खून के एक एक कतरे से प्यार है ।
जनसेवा मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है । जनसेवा मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है ।
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