Sunday, 6 March 2011

क्या गुटबाजी लोगों के खून में समा गयी है ?

ये एक मानवीय स्वभाव है कि अक्सर किसी को किसी की कोई बात बुरी लग जाती है । और दुःख पहुँचता है । फिर विवाद होता है । और फिर रंजिश । फिर दूसरों पर अभद्र और अशिष्ट लांछन लगाना । कभी कभी ये सिलसिला थमता ही नहीं । कुछ व्यक्ति बदले की भावना से कब इस मनोविकार से ग्रस्त हो जाते हैं । उन्हें पता ही नहीं चलता । ऐसे व्यक्तियों के जीवन का बस एक ही प्रयोजन रह जाता है । किसी भी तरह दुसरे व्यक्ति को नीचा दिखाना । लेकिन ऐसा करते समय वे ये भूल जाते हैं कि दुसरे का अपमान करते समय वे अपने ही संस्कारों और चरित्र का परिचय दे रहे होते हैं ।
ऐसे अवस्था में सबसे दुखद बात ये है कि कुछ गुट्बाज जो ऐसा मौक़ा तलाशते हैं कि पुरानी रंजिश कैसे निभाई जाए । वो इनके साथ हाथ मिलाकर इनके नफरत की आग को हवा देते हैं । विवाद में निष्पक्ष रह पाना । शायद बहुत बड़ा गुण है । फिर भी विद्वान पाठक अपने अनुभवों और समझ के अनुसार नीर छीर विभाजन कर ही लेता है ।
एक सप्ताह पूर्व एक विद्वान ब्लागर ने अपने ब्लॉग पर एक स्त्री के खिलाफ एक लेख लिखा । जहाँ रंजिश निकालने वाले दुसरे विद्वान ब्लागर ने आकर उस स्त्री पर अनेकों अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियां लिखीं । चूँकि लेखक और वो टिप्पणीकार एक ही गुट के थे । इसलिए उसकी टिप्पणियाँ वहां सजाकर रखी गयीं । लेकिन जिन सभ्रांत पाठकों ने इस अश्लीलता का विरोध किया । उनकी टिप्पणियाँ वहाँ से डिलीट कर दी गयीं ।
एक ब्लागर प्रवीण शाह जब उस लेख पर आये । तो उन्हें उस कीचड उछाल लेख से बहुत प्रेरणा मिली । तथा उन्होंने एक कविता लिखी । मुझे झगडे बहुत पसंद हैं । मैं अमन के पैगाम नहीं देता । इनकी पोस्ट पर जो टिप्पणियां आयीं । उनमें से सभ्य टिप्पणियों को छोड़कर अशिष्ट एवं अश्लील टिप्पणियां डिलीट कर दी गयीं । लेकिन दुखद बात ये है कि जिस लेख से उन्हें प्रेरणा मिली थी । उस लेख के ब्लागर तथा मित्र टिप्पणीकार । जो एक स्त्री का तिरस्कार कर रहे थे । उनकी टिप्पणियां प्रवीण शाह ने डिलीट नहीं की । तथा ट्रोफी की तरह सजाकर रखीं । क्या गुटबाजी लोगों के खून में समा गयी है ?
मैं कोशिश करती हूँ कि ऐसी टिप्पणी लिखूँ । जो किसी को दुःख न दे । पूर्वागृहों से रहित हो । ईर्ष्या से मुक्त हो । किसी के मन को दुःख न दे । भड़ास रहित हो । तथा लेखक अथवा लेखिका के लिए प्रोत्साहन युक्त हो । तथा विषय की सार्थकता भी बढाए ।
लेकिन शायद टिप्पणी लिखने में मुझसे कहीं कोई गलती हो रही है । इसलिए प्रवीण शाह जैसे विद्वान ब्लागर ने अशिष्ट टिप्पणियों के साथ मेरी टिपण्णी को डिलीट करना उचित समझा । मैं नीचे हरे रंग में अपनी उस टिप्पणी को यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ । कृपया उसे पढ़ें । और बताएं । क्या यह अभद्र है ? अश्लील है ? भड़ास है ? किसी का व्यक्तिगत अपमान है ? या ईमानदार विचार है ।
आपके विचारों से मुझे मदद मिलेगी । ये जानने में कि आपको कैसी टिप्पणी पसंद है ?? और फिर आपके ब्लॉग पर टिप्पणी करते समय जरूरी सावधानियां बरतने में मुझे मदद मिलेगी ।
----- प्रवीण जी । बहुत अच्छी लगी कविता एवं प्रेरणादायी भी लगी । क्रोध के वशीभूत होकर कुछ लोग अत्यंत अभद्र एवं अश्लील टिप्पणियां करते हैं । बदले की भावना के वशीभूत होकर वो अपने नैतिक मूल्यों को तिलांजलि दे देते हैं ।
किसी भी स्त्री को सरेआम बदनाम करने में कुछ पुरुष अपनी मर्दानगी समझते हैं । क्यूंकि जिस स्त्री का वो अपमान कर रहे होते हैं । वो उनकी अपनी माँ और बहन नहीं होती । इसलिए अश्लीलता से ओतप्रोत टिप्पणी एवं लेख लिखकर मर्दानगी का परिचय देते हैं ।
बहुत अफ़सोस होता है । ये देखकर कि आजकल के पुरुष माता पिता के दिए संस्कारों की तिलांजलि कैसे दे देते हैं । जिसके घर माँ बहन न हों । वो कैसे किसी अनजानी स्त्री को । साथी ब्लागर को । किसी अनजान पुरुष की पत्नी को । किसी की बेटी को । और छोटे-छोटे बच्चों की माँ पर अभद्र एवं अश्लील टिप्पणी लिख सकता है ?
परिवार से बाहर की स्त्री को अपमानित करने का license ये पुरुष कहाँ से लाते है ? स्त्री को अपमानित करते समय क्या ये अपने संस्कारों का परिचय नहीं दे रहे होते ?
बेहद खेदजनक है कि यदि कोई लेखक एक साथी ब्लागर पर अश्लील लेख लिखकर लोगों को अभद्र टिप्पणियां लिखकर अपमानित करवाता है । कलम का इतना दुरुपयोग पहले कभी नहीं देखा था ।
यदि आज के कुछ ब्लागर स्त्रियों का इस तरह से अपमान करेंगे । तो समाज के लिये इनका क्या योगदान होगा ? क्या इस विकृत मानसिकता के चलते हम समाज सुधार और विकास के बारे में कभी सोच भी सकेंगे ?
------आपके बहुमूल्य विचारों की अपेक्षा में ।
साभार । डा. दिव्या जी के ब्लाग " जील " से । आपके उत्तम विचारों के लिये धन्यवाद दिव्या जी
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