Sunday, 6 March 2011

सभी ब्लॉगर कुंठित frustrated होते हैं ।

मेरे पिछले लेख पर एक ब्लॉगर मित्र का वक्तव्य आया कि सभी ब्लॉगर कुंठित frustrated होते हैं । मानो या न मानो । उनके इसी वक्तव्य से ये लेख लिखने की प्रेरणा मिली ।
मेरे विचार से एक कवि या लेखक अपनी मूलभूत ज़रूरतों से बहुत ऊपर उठ चुका होता है । जिंदगी में उसने जो दुःख और सुख अनुभव किये होते हैं । उन्हें शब्दों द्वारा आकार देकर हज़ारों लाखों लोगों के साथ बांटता है । अपनी मुश्किलों को हँसकर पीता है । और नीलकंठ की तरह समाज के सामने एक समाधान रखता है ।
एक लेखक कुंठित नहीं होता । बल्कि वो एक ऐसे पड़ाव पर होता है । जहाँ वो अपनी समस्याओं से लड़ना सीख चुका होता है । वो एक जुझारू व्यक्तित्व का चिंतनशील व्यक्ति होता है । जो अपनी सशक्त लेखनी द्वारा बहुत से लोगों को कुंठा से लड़ने की ताकत देता है । लेखक और कवि तो कुंठा का इलाज हैं । और अनेक समस्याओं का एक बेहतरीन समाधान भी । कितने ही लेखकों और कवियों की ओजमयी रचनाएँ । आजादी मिलने में हथियार साबित हुई हैं । आज हर व्यक्ति के पास जो ज्ञान का भण्डार है । वो किसी न किसी लेखक द्वारा लिखा उसका अनुभूत ज्ञान ही होता है ।
कुंठित व्यक्ति अक्सर हिंसक होते हैं । जिद्दी होते हैं । उनमें सोचने समझने और तर्क करने की शक्ति का पूर्णतया अभाव होता है । उसकी सकारात्मक शक्ति का ह्रास हो जाता है । तथा वो कुछ लिख पाने की अवस्था में ही नहीं होता है । इसके विपरीत लेखक एक चिंतनशील व्यक्तित्व है । जो अपनी सकारात्मक ऊर्जा को शब्दों में ढालकर एक नया सृजन करता है । और अपनी स्वयं की विषम परिस्थियों को दरकिनार कर समाजोपयोगी चिंतन में सतत संलग्न रहता है । इसलिए कवि लेखक अथवा ब्लॉगर को कुंठित कहना या समझना उचित नहीं लगता ।
लेखक और उसकी प्रेरणा - हर जीवित प्राणी की कुछ मूलभूत ज़रूरतें होती हैं । यही ज़रूरतें ही हमारी प्रेरणास्रोत होती हैं । यही ज़रूरतें ख़तम हो जायेंगी । तो आगे बढ़ने के लिए आवश्यक प्रेरणा नहीं मिलेगी । और विकास रुक जाएगा ।
पेड़ पौधे आत्मनिर्भर होते हैं । भोजन बनाने और प्रजनन में वो सक्षम हैं । और यहीं उनकी ज़रूरतें ख़त्म हो जाती है । जरूरतों की आपूर्ति हो जाने के बाद प्रेरणा की समाप्ति हो जाती है ।
इसके बाद चौपायों की चर्चा करें । तो उनकी जरूरतें पादपों से थोड़ी ज्यादा हैं । क्यूँकि उनके पास मस्तिष्क है । वो अपने भोजन और आवास के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं । उनके अन्दर भावनाएं भी होती हैं । और वो हमारे साथ भावनात्मक सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं । लेकिन फिर भी वो चिंतनशील प्राणी नहीं है । उसकी जरूरतें सीमित हैं । और इस कारण उनके पास और आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा का अभाव है ।
मनुष्य एक चिंतनशील प्राणी है । उसकी मूलभूत ज़रूरतें भी सबसे ज्यादा होती हैं । ज़रूरतों का पूरा न होना उसे प्रेरित करता है । प्रयत्नशील रहने के लिए । जैसे जैसे उसकी ज़रूरतें पूरी होती जाती हैं । वो ज़रूरतें बढती जाती हैं । और एक अगली आवश्यकता आकार लेने लगती है । कभी न ख़त्म होने वाली परिस्थितिजन्य ज़रूरतें ही उसके आगे बढ़ने का प्रेरणास्रोत बनती हैं ।
मानवीय ज़रूरतें कुछ इस कृम में हैं ।
1 शारीरिक ज़रूरतें - हवा । पानी । भोजन । नींद । 2 सुरक्षात्मक - आवास । अच्छा स्वास्थ्य । रोजगार । धन संपत्ति । 3 सामाजिक ज़रूरतें - मित्रता । किसी समूह या समुदाय से जुड़ने का एहसास । प्यार देने और पाने की चाहत । 4 मन की ज़रूरतें - जब शरीर तृप्त और सुरक्षित हो जाता है । तो हमारी ग्यारहवीं इन्द्रिय मन की ज़रूरतें तीवृ हो जाती हैं । जिससे मन प्रेरणा पाता है । और निम्नलिखित ज़रूरतों को पूरा करने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है ।
1 एक समाज में पहचान चाहिए होती है । 2 दूसरों का ध्यानाकर्षण चाहिए होता है । 3 समाज में एक सम्मानित स्थान चाहिए होता है । 4 अपने कार्यों की सिद्धि । मंजिल को पाने की इच्छा । तथा उपलब्धियों को पाने की ललक । 5 आत्मसम्मान की बढती ज़रुरत ।
अंतिम तथा सबसे अहम ज़रुरत है । स्वयँ की पहचान । या Self actualization । इस अवस्था में पहुँचने पर मनुष्य अपने अन्दर के गुणों संभावनाओं तथा क्षमताओं को पहचानने की ज़रुरत तीवृता से महसूस करता है ।
यही अहम ज़रुरत मनुष्य को बेहतर से बेहतर करने की प्रेरणा देती है । जब एक मनुष्य ज़रूरतों के इस अंतिम चरण में पहुँचता है । तो उसके लिए सत्य । न्याय । ज्ञान और शब्दों के सच्चे अर्थों को सही सन्दर्भों में जानना ही सबसे अहम हो जाता है । और शेष सब गौण ।
प्रेरणा के इस अंतिम चरण में पहुंचकर ही एक लेखक हकीकत को आसानी से स्वीकार कर पाने की क्षमता पैदा कर पाता है । और अपने परिवेश तथा परिस्थितिजन्य सत्य को सरलता से स्वीकार कर लेता है । वो कठोर होकर अपनी कमियों को भी सहजता से आत्मसात कर लेता है । और खुद को पूर्वागृहों से मुक्त करके अपने विचारों को आयाम देता है । और अपने व्यक्तित्व को विस्तार देता है । यही असली विकास real growth है ।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा की बहुत ज़रुरत होती है । और एक लेखक मानवीय ज़रूरतों की अनेक सीढियां चढ़ते हुए Self actualization की उस अवस्था में पहुँचता है । जहाँ वो स्वयँ एक प्रेरणास्रोत बन जाता है ।
आज के युग में जहाँ हँस पाना दुश्वार हो गया है । वहीं एक कवि स्वयं का उपहास कर लाखों लोगों को हँसा देने की काबिलियत रखता है । नमन है । कवियों की इस जीवटता को ।
साभार । डा. दिव्या जी के ब्लाग " जील " से । आपके उत्तम विचारों के लिये धन्यवाद दिव्या जी

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