Sunday, 6 March 2011

दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?

ये राधिका भी ! जब देखो तब कहती है । " क्या दिव्या भारी भरकम पोस्ट लगा दी । पका देती हो तुम तो । तुम्हारे लेख पढ़कर तो नींद ही नहीं आती । Diazepam की गोली खाकर नींद बुलानी पड़ती है । "
तो समर्पित है । आज की हलकी फुलकी पोस्ट राधिका के नाम ।
जैसे जैसे उमृ बढती है । बुढापा घेर लेता है । लोग खाना कम कर देते है । सोचते हैं । पचा नहीं पाऊंगा । चटक मटक कपडे कम पहनता है । सोचता है । लोग क्या कहेंगे ? पार्टीज़ में कम जाता है । डरता है कहीं समाज हँसे न मुझ पर । घर में बूढी कुर्सी पर खुद ही बैठने लगता है । डरता है कहीं कोई टोक न दे । मुख्य सोफे पर बैठने से ।
न भाई ना । डरिये नहीं । जीने के यही चार दिना । जिंदगी न चले प्यार बिना । धन दौलत बिना चले मगर । जिंदगी ना चले यार बिना । इसलिए खुद को । खुद ही अकेला मत कीजिये । मिलकर रहिये । बुज़ुर्ग कम हों । तो युवाओं के साथ हाथ मिलाइए । फिर देखिये । ज़िन्दगी आप पर किस तरह मेहरबान होती है । उनकी ऊर्जा से खुद को चिरयुवा बनाइये । अपने अहम को ताक पर रखकर युवाओं और बच्चों की मस्ती भरी अटखेलियों का आनंद उठाइए । और निरंतर ऊर्जान्वित रहिये ।
अरे हम तो भटक गए । बात हो रही ब्लॉगर्स की । हाँ तो जनाब । जैसे जैसे एक ब्लॉगर बड़ा होता जाता है । उसकी टिप्पणियां छोटी हो जाती हैं । ऐसा क्यों ? अरे भाई वो डरने लगता है ।
क्योंकि..1 कहीं कुछ कम ज्यादा न लिख दे । 2 कहीं कोई विवाद न हो जाए । 3 कहीं कोई छुटके ब्लॉगर का मान न बढ़ जाए । 4 कहीं छुटंकू का TRP न बढ़ जाए । 5 कहीं छुटकू ज्यादा भाव न खाने लगे । 6 कहीं मेरी महिमा घटने न लगे । 7 सबको पता चल जाएगा कि मैं इसे पढता हूँ ।
मैं दूसरों को तो टिप्पणी करने से नहीं रोक सकता । लेकिन अपनी एक टिप्पणी से तो इसको वंचित कर ही डालूँ ।
बडके बिलागर की चार पोस्ट पर टिप्पणी करो । तब आयेंगे गरीबों की एक पोस्ट पर । 4 : 1 का रेशिओ । और छुटकू उसी में हो जायेंगे मगन कि तारनहार आये हमरे द्वार । लगेंगे गाने । आभार । आभार । आभार ।
कभी कभी तो राधिका जैसे बडके ब्लॉगर दांत भींचे लौट जाते हैं । और छुटकी टिप्पणी भी नहीं देते । धत तेरे की । ऐसा भी क्या गुमान ??
कभी कभी तो बडके ब्लॉगर इतनी microscopic टिप्पणी देते हैं कि हम उतने micro सूक्ष्म स्तर तक सोच ही नहीं पाते । और उनके monosyllable । इकलौते शब्द । में व्यक्त अनेकार्थों को समझ ही नहीं पाते ।
कभी कभी वो invisible ink में लिखते हैं । जो कमेन्ट बॉक्स में नज़र ही नहीं आती । वो आते हैं । पढ़ते हैं । होठों ही होठों में बुदबुदाते हैं । और बिना चाय पानी । दुआ सलाम के चले जाते हैं ।
कभी कभी बड़का ब्लॉगर घबराते हैं कि कहीं उनकी टिप्पणी भीडभाड़ में खुवाय न जाए । इसलिए भी खुद को अलग थलग ही रखते हैं ।
जाने कौन कौन से डर पाले हैं । मन में । डरिये मत । लिख डालिए । दर्दे दिल । हाले मन । मन की हलचल । या फिर भड़ास । टिप्पणी तो आखिर टिप्पणी है । लेखक का मनोबल ही बढ़ाएगी । घटाएगी नहीं । और यकीन मानिए । टिप्पणी लिखकर आप बडके से
छुटके ब्लॉगर कदापि नहीं बनेंगे । बल्कि आपकी शान में एक और feather बढ़ जाएगा ।
थोडा सा प्रवचन झेलेंगे क्या ?
Food chain का नाम तो सुना ही होगा । एक सीधा खड़ा हुआ शंकु upright pyramid होता है । जिसमें ढेरों टिड्डे एक साथ दल बनाकर जीवन का मज़ा लेते हैं । लेकिन शिखर पर बैठा शेर अकेला होता है । वो राजा है । उसकी जी हुजूरी करने वाले असंख्य होते हैं । लेकिन दोस्त कोई नहीं होता ।
corporate world की बात करें । तो शीर्ष पर बैठा CEO नितांत अकेला पड़ जाता है । जीवन की हलकी फुलकी बात किससे करे ? अरे बड़ा होने का खामियाजा तो बड़े लोग ही जानते है ।..तनहा तनहा हम रो लेंगे । महफ़िल महफ़िल गायेंगे ।
मुई राधिका मेरा पीछा नहीं छोड़ेगी । पूछती है । दिव्या तुम छुटकी हो या बडकी बिलागर ?
हमने कहा । अरी मूरख । इतनी बड़ी बड़ी टिपण्णी लिखती हूँ कि पढने वाला भी पक जाए । दिल से लिखती हूँ दिल से । एक हाथ से लेती हूँ । दोनों हाथ से देती हूँ । सौजन्य IDBI Bank । इसलिए छुटकी बिलागर हूँ छुटकी । और हमेशा छोटे ही बने रहना चाहती हूँ ।..कल और आयेंगे नगमों की । खिलती कलियाँ चुनने वाले । मुझसे बेहतर लिखने वाले । तुमसे बेहतर पढने वाले ।
इसलिए जी भर के लिखो । लेख भी । और टिपण्णी भी । आपके शब्द ही आपकी पहचान हैं ।
वैसे कोशिश करती हूँ । कम खर्च बालानशीं । की तर्ज पर संक्षेप में लिखकर काम चलाया करूँ । पर क्या करूँ ? ये निगोड़ी उंगलियाँ मानती ही नहीं । कहती हैं । ये दिल मांगे मोर । आभार ।
साभार । डा. दिव्या जी के ब्लाग " जील " से । आपके उत्तम विचारों के लिये धन्यवाद दिव्या जी
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