Sunday, 13 March 2011

..आओ मेरे राम बसो । देवेन्द्र मिश्रा । परिचय पोस्ट

*** श्री देवेन्द्र मिश्रा जी ने अभी गत फ़रवरी से ही ब्लागिंग शुरू की है । और मुझे खुशी है कि वे जीवन की बारीकियों और संवेदनशील पक्षों को सूक्ष्मता से महसूस करते हैं । आध्यात्म की तरफ़ भी उनका रुझान है ।
तो आईये । श्री मिश्रा जी का भावभीना स्वागत करते हुये उनके चिंतन पर आधारित ये भक्ति रचना पढें..राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ।

आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

चरण रजों से तारी अहिल्या । केवट को गले लगाया ।
पिता वचन पालने हेतु । त्यागा मुकुट एक पल में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

निश्छल प्रेम भरत भाई से । विह्वल गले लगाया ।
चरण पादुका दे दी अपनी । भाई के मान मनौव्वल में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

निर्भय किया दारुकारण्य को । खर-दूषण का नाश किया ।
अभय किये यती सन्यासी । लेकर बाण-धनुष भुजदंडो में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

पर्णकुटी और कुश की शैय्या । भोजन कन्दमूल फल पाया ।
शबरी के जूठे फल खाये । प्रेम भक्ति वत्सलता में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।



रावण ने मायामृग छल से । सीता का अपहरण किया ।
नदी, नार, वन कहाँ न ढूँढा । प्रेम-विरह व्याकुलता में ।
आओ मेरे राम बसो ।   मेरे इस हृदयाँगन में ।

भक्त प्रवर हनुमत से मिलकर । सुग्रीव को गले लगाया ।
पत्थर भी पानी पर तैरा । रामनाम की शक्ति में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

वानरसेना संग करी चढाई । महायुद्ध का शंखनाद किया ।
अंत किया रावण सेना का । अभिषेक मित्र का लंका में ।
आओ मेरे राम बसो ।  मेरे इस हृदयाँगन में ।

लखन सहित, संग में सीता । निज घर को प्रस्थान किया ।
गदगद हुए अयोध्यावासी । रामराज की बधाई में ।
आओ मेरे राम बसो । मेरे इस हृदयाँगन में ।

साभार श्री देवेन्द्र मिश्रा जी के ब्लाग..
शिवमेवम सकलम जगत..से । ऐसी उत्तम भक्ति रचना के लिये आपका बहुत बहुत आभार मिश्रा जी ।

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